सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

बारहवाँ अध्याय ३५५
है वही मेरी मूर्ति है यह निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। इसके सम्बन्ध में सन्देह न करो। इसी का नाम है
अनन्यभक्ति। एकाग्र होकर गुरु का जो भजन किया जाता है वही मेरी पूजा है। गुरु और मैं इन दो में कल्पांत में
भी कभी बिलगाव नहीं होता। गुरु और भगवान दोनों एक ही हैं इस भावना से जो भजन करता है वही गुरु का
सेवक है। इसके अतिरिक्त कोई और होगा तो उसके बारे में सन्देह है। मुझसे एकत्व प्राप्त करने के लिये जिसने
अत्यन्त प्रेम से गुरुभक्ति को स्वीकार किया वह त्रैलोक्य में धन्य है। अब भजन के स्वरूप के बारे में सुनो। गुरु
की सेवा करने के लिये उसका देह मन से भी आगे रहता है और सारी सेवा मैं अकेला ही करूँ इस महत्त्वाकांक्षा
से वह तैयार रहता है। सेवा का क्रम जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे यह अधिक उत्साह से सेवा के लिये
तैयार रहता है। पूरी देह वह सेवा के लिये अर्पित कर देता है। गुरुसेवा में ही उसे विश्राम मिलता है। सेवा की
चाह के कारण वह घड़ी भर के लिये भी विश्राम नहीं करता। जैसे-जैसे चाह बढ़ती जाती है वैसे-वैसे गुरुभजन
की माधुरी बढ़ने लगती है। नित्य गुरु की सेवा करते हुए प्रेम का नया दौर ही शुरू हो जाता है। सद्‌भक्ति की
इच्छा से उसने गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित किया रहता है। आलस्य उसके पास आना ही भूल जाता है,
विश्राम का स्थान ही नष्ट हो जाता है। गुरुसेवा के संभ्रम में भूलने के कारण वह अन्य विषयों का सेवन ही भूल
जाता है। प्यास जल को भूल जाती है, क्षुधा पकवान भूल जाती है और गुरु चरणों की सेवा में वह निद्रा भी भूल
जाता है। जम्हाई लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती, वहाँ निद्रा को कहाँ स्थान मिलेगा? मुख में सद्गुरु का नाम,
हृदय में सद्गुरु का प्रेम और देह में सद्गुरु का कर्म यही रात-दिन अविश्रांत चलते रहना चाहिये। मन गुरुसेवा
में व्यस्त रहने के कारण उसे पत्नी बच्चे तथा धन का भी विस्मरण होता है। मन का भी विस्मरण होता है और
वह अपने अस्तित्व का भी स्फुरण भूल जाता है। उसके भजन का उत्साह आश्चर्यजनक होता है। भजन करते
समय देह का भी स्मरण नहीं रह जाता। इस प्रकार गुरुसेवा की महिमा विलक्षण है क्योंकि सारा आत्मभाव
गुरुचरणों में ही लगा रहता है। ऐसा होते हुए भी यदाकदा किसी समय गुरु से बिछोह भी हो जाय तो प्रेम का
बन्धन नहीं टूटता, उलटे भजन में भक्ति बढ़ जाती है। जहाँ गुरु का गाँव है वहीं सारा मनोधर्म बस जाता है। गुरु
के ध्यान को ही धर्म कर्म समझ कर वह सेवा का प्रयास नहीं छोड़ता। गुरु के मूर्ति की ही आदत हो जाने के
कारण वह उसी मूर्ति को हृदयाकाश में स्थापित करता है और फिर अनेक प्रकार के भजनरंग में उसके भजन प्रेम
का क्या वर्णन किया जाय? चित्स्वरूप यही उसकी पूर्णिमा और गुरु यही उसका पूर्णचन्द्र है और वह स्वयं
उसके नीचे तृषित चकोर बनकर बैठ जाता है। फिर वह स्वयं स्वानंद बोधरूपी चन्द्रकिरणों का निरन्तर सेवन
करता रहता है अथवा चिदाकाश में सद्गुरु को सूर्य बनाकर स्वयं सूर्यकांतमणि बन जाता है और उसके दिव्य
तेज से देदीप्यमान होकर वह अपने प्रभाव से मायारूपी वन की होली जलाता है अथवा सद्गुरु के कृपामृतरूपी
सागर में लहर बन जाता है और अंतर्बाह्य गुरु का ही स्वरूप है यह मानकर हृदय में वही भावना धारण करता
है। अपना वास्तविक स्वामी जो सद्गुरु है वह सचमुच निर्विकल्प कल्पतरु ही है यह मानता है और उसकी
छाया में बैठकर गुरुभक्ति का ही वर माँगता है अथवा सद्गुरु को कामधेनु बनाकर स्वयं उसके बछड़े की
कल्पना करता है और ज्ञानरूप जिह्वा से स्वानंद का दुग्ध सेवन करता है। हे गुरुदेव तुम्हारी सभी वृत्तियों की
सेवा मैं ही करूँ इस सद्‌भक्ति से मैं उसकी प्रार्थना करता हूँ और कहता हूँ, हे कृपानिधे! मुझे यही वर दीजिये।
तब गुरुनाथ ने प्रसन्न होकर मस्तक पर वरदहस्त रखकर वैसा वर देते ही उसका मन आनन्द से मचल उठता है
और वह कहता है, "मुझे वर मिल गया, मैं धन्य हो गया।'' ऐसा वर प्राप्त कर वह वही सेवा प्रेम और आदर
से करने लगता है। गुरुभजन के असंख्य प्रकार हैं। सद्गुरु का मन, बुद्धि, अंतःकरण आदि जो दशेन्द्रिय हैं उन