श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय ३५१
अभिव्यक्त हुआ है। जिस प्रकार एक होने पर निद्रा के वश में होने पर हम अपने अनेक रूप देखते हैं, उसी
प्रकार मैं भी विश्वात्मा हूँ ऐसा समझ लो। वट का बीज बहुत छोटा होता है और उसे उपयुक्त जमीन और पानी
मिलने पर उसका अंकुर बढ़कर अत्यन्त मजबूत और असीम विस्तार वाला वृक्ष खड़ा दिखायी देता है। उस
समय उसका नाम, रूप, पुष्प इन सारे रूपों में वह मूल बीज ही वास्तविक लगने लगता है, उसी प्रकार विश्व के
आकार से केवल चिदात्मा का ही आभास होता है। मूल बीज में जो मिठास होती है वही बढ़ते-बढ़ते बड़े
आकार में आ गयी। गन्ने के हर कांड में जो मिठास होती है, वही गन्ने की मूल अधिकृत मिठास है। उसी प्रकार
मूल कारण चिदात्मा ही है। उससे जो भी तत्त्व निकलते हैं वे सब शुद्ध चैतन्य से भरे हुए हैं। सारा संसार
चित्स्वरूप ही है। ईश सर्वांग से पूरा का पूरा बीजरूप रहता है। बीजरूप में ही ईख सफल होता है। उसी प्रकार
चिन्मात्र ही संसार का मूल है और सारा संसार चित्स्वरूप है। बीज और ईख दोनों एकरूप रहते हैं, उसी प्रकार
प्रपंच चित्स्वरूप है। यही बात श्रीकृष्ण अत्यन्त आग्रह और कृपापूर्वक बता रहे हैं।
यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटो यथा तन्तुवितानसंस्थः।
य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥
इसलिये संसार नाम से जो भी कुछ है वह सब मुझ में ही भरा हुआ है। मुझसे अलग अणुमात्र भी कुछ
नहीं है। इसी अर्थ का दृष्टांत भगवान् उद्धव को बताते हैं। जिस प्रकार रुई के महीन धागे कात कर उनसे वस्त्र
तैयार किया जाता है अर्थात् उसमें आड़े-तिरछे बुने हुए तन्तु ही होते हैं, उन्हें वस्त्र यह नाम भी व्यर्थ है, उसी
प्रकार संसार यह नाम भी व्यर्थ ही है। वास्तव में देखा जाय तो उसके रूप में मैं भगवान ही स्फुटद्रूप होता रहता
हूँ। सूत स्पष्ट दिखाई देता है फिर भी उसे 'साड़ी' कहा जाता है। इस प्रकार हमारे सामने साक्षात चैतन्य दिखायी
देते हुए भी पागल लोग उसे संसार कहते हैं। जिस प्रकार सूत के बिना वस्त्र नहीं होता उसी प्रकार मेरे बिना
प्रपंच दिखाई नहीं देता। ऐसा होते हुए हे उद्धव! जिन्हें मैं प्राप्त नहीं हुआ उनका जरा भाग्य तो देखो! वे मुझे ही
नकारते हैं। इस प्रकार मैं सर्वव्यापी विश्वात्मा हूँ और विश्व में भरा हुआ हूँ यह बात मैंने वृक्ष का दृष्टांत देकर
तुम्हें बतायी। मुझे देखने का जिसका निश्चय हो चुका है उसके लिये मैं सर्वेश्वर हूँ। जो मनुष्य मुझे प्राप्त नहीं
कर पाता उसे संसार का ही आभास होता है। भ्रम में पड़ा हुआ व्यक्ति मुझ सर्वात्मा, सर्वेश्वर को ही संसाररूपी
विशाल वृक्ष समझ लेता है। उसी संसार वृक्ष का विस्तार भगवान बताते हैं।
भ्रान्ति के कारण ही संसारवृक्ष उत्पन्न होकर कर्माकर्मरूपी जल से फला फूला है। वह जीर्ण, पुराना तथा
अत्यन्त विस्तीर्ण होकर फल और पुष्पों से लदा हुआ है। उसका बीज क्या है, मूल क्या है, रस क्या है? फल
क्या है? आदि प्रश्नों से योगी आदि सभी भ्रम में पड़े हुए हैं उनके बारे में विस्तार से बताऊँगा।
द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः ।
दशैकशाखो द्विसुपर्णनीडस्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्टः ॥ २२ ॥
भ्रमरूपी उर्वर भूमि में पाप पुण्य का बीज पड़ते ही यह वृक्ष उत्पन्न होता है और उसके सीरे पर कल्पना
का विस्तार होता है। जिस प्रकार पत्ते, फूल अथवा फल न दीखने पर भी डोरे में पिरोये बेल की तरह केवल तंतु
ही भरे रहते हैं और उन तंतुओं से ही बेल की बाढ़ होती है, उसी प्रकार कल्पना मात्र से संसार इतना शक्तिशाली
हुआ है। कर्माकर्म रूपी बाँध के जल से अविद्यारूपी क्यारी भरती है और अनंत वासनाओं के मूल जमीन में धँस
कर मजबूत हो जाते हैं जिससे इस वृक्ष का आधार ठोस हो जाता है और वह अपनी जगह से नहीं हिलता। सूक्ष्म