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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 869 में से

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पृष्ठ 370

३५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विनाश करने वाली केवल एक गुरुभक्ति ही है यह जान लो। पापों का नाश करने में जिस प्रकार गंगाजल समर्थ
है उसी प्रकार गुरुभक्ति ही संसारभय को भस्म करती है इसे निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। सत्यव्रत ग्रहण करने से
पाप अपने आप भाग जाते हैं, उसी प्रकार गुरु का भजन करने से संसार का अपने आप क्षय हो जाता है। मारुति
दिखायी देते ही भूत चारों दिशाओं में भागने लगते हैं, उसी प्रकार गुरुभजन शुरु होते ही संसार का भय अपने
आप भागने लगता है। मरते समय अमृतपान करने से मरण की ही मृत्यु हो जाती है, उसी प्रकार गुरुभजन करने
से जन्ममरण की ही मृत्यु हो जाती है। अंतकाल में अकस्मात् 'हरि' कहने से यमदूत भी भाग जाते हैं, उसी
प्रकार सद्गुरु का भजन करने से संसार भय भी भाग जाता है। गुरुभक्त अत्यन्त भाग्यवान होता है। सद्गुरु कौन
है? भक्ति कैसे की जाय ? यदि तुम्हारे मन में इस प्रकार का विचार आ रहा है तो उसके सम्बन्ध में यथार्थ रूप
से बता ही चुका हूँ। हे उद्धव ! तो जो वेद और ब्रह्मज्ञान में निष्णात होते हुए शिष्य को ज्ञान देने में समर्थ हो,
वही सद्गुरु है। जो स्वस्वरूप में ही समाधान करता है, वही सचमुच सद्गुरु है। सद्गुरु बनने के लिये इसके
सिवा कोई कारण नहीं है। उस सद्गुरु के भजन का ढंग मैं तुम्हें बताता हूँ। जो गुरुभजन करता है वह सभी
कर्मों और धर्मों से भी महान है। गुरु को पिता के समान मानना चाहिये, पिता एक ही जन्म के लिये होता है
किन्तु सद्गुरु सनातन माता-पिता है। वह समस्त संसार का पिता है। गुरु को माता के समान मानना चाहिये। गर्भ
में रहने के कारण माता का उससे प्रेम रहता है किन्तु गुरुराज गर्भवास का ही निवारण करता है और पुत्र से भी
अधिक प्रेम करता है। गर्भ से बाहर आने पर माता पुत्रस्नेह के कारण उससे प्रेम करती है लेकिन गुरुमाता बाह्य
सारी बातों को पेट में छिपा कर स्नेह से अधिक प्रेम करती है। गुरु को स्वामी की तरह मानना चाहिये, स्वामी
जन्म-मरण से छुटकारा नहीं दिला पाता, लेकिन सद्गुरु जन्म-मरण से छुटकारा दिलाता है इसलिये सद्गुरु ही
सबसे बड़ा स्वामी है। गुरु को यदि कुलदेवता कहें तो कुलदेवता की पूजा केवल कुलधर्म में होती है किन्तु गुरु
कुलदेवता का भी देवता है। अपने प्रत्येक कर्म में वह पूजनीय है। गुरु को यदि कल्पतरु मानें तो कल्पतरु
कल्पना करने पर ही दान देता है किन्तु सद्गुरु निर्विकल्पता का ही दान देता है। वह निर्लोभता किसी बड़े दान
की तरह होती है। चिन्तामणि जिस बात की चिन्ता करो वही वस्तु देता है लेकिन सद्गुरु चिन्ता का ही नाश
करता है और मन को मार कर शाश्वत का निजदान करता है। कामधेनु दूध देती है लेकिन केवल इच्छा के
अनुसार लेकिन सद्गुरु स्वानन्द का ही रस देता है और इच्छा का नाश करता है। समुद्र को गुरु जैसा कहें तो वह
है तो गम्भीर किन्तु स्वभाव से गुस्सैल। किन्तु गुरु सदा स्वानंद से ओत-प्रोत होने के कारण आत्मबोध से अत्यन्त
मधुर रहता है। गुरु के लिये ब्रह्मा की उपमा भी कम है क्योंकि गुरु के उपदेश से ही ब्रह्मा को सत्यत्त्व प्राप्त
होता है। अन्यथा ब्रह्म तो केवल शाब्दिक ही है। शब्दार्थ को शब्दों में ही नष्ट कर गुरु ज्ञानमय अर्थ का बोध
कराता है इसलिये त्रैलोक्य में उससे अधिक श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। इसलिये गुरु ही माता, गुरु ही पिता, गुरु ही
स्वामी तथा गुरु ही कुलदेवता है। गुरु के सिवा किसी अन्य देवता का स्मरण ही नहीं होता। अत्यन्त कठिन
संकट आने पर अथवा जब आसमान टूट पड़ा हो उस समय भी जो अन्य कहीं झाँक कर नहीं देखता, केवल गुरु
का ही नामस्मरण करता रहता है, शरीर, वाणी, मन और प्राण से जो गुरु के सिवा किसी को नहीं जानता और
उसी प्रकार जो अनन्यभाव से गुरु का भजन करता है, उसकी उस भक्ति को गुरुभक्ति कहते हैं। चिड़िया के बच्चे
जिसके पंख भी नहीं निकले होते वे सदा उसी का ध्यान करते हैं। उसी प्रकार वह जागृति में, स्वप्न में अथवा
सुषुप्तावस्था में भी गुरु के सिवा किसी का स्मरण नहीं करता। पहले तुमने भगवद्भजन की बात की और अब
गुरु सेवा की बात करते हो। तुम्हारे इस निरूपण में सुसंगति नहीं है। ''ऐसी बात न सोचो। जो वास्तव में सद्गुरु