श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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में फैलता है, वही दीपक घर में रखने पर प्रकाश घर भर में फैलता है। उसी प्रकार जब तक शरीर में है तभी
तक यह जीव है अन्यथा यह साक्षात् सदाशिव ही है। अब इस सम्बन्ध में अधिक कुछ कहने की आवश्यकता
नहीं है। जीव का और शिव का अनुभव इस प्रकार का है। दर्पण का सूर्य मानों हाथ में दिखायी देता है, उसी
प्रकार शरीर में भी जीव की प्रसूति (जन्म) हुई है। उस जीव की स्थिति उत्कर्ष के कारण रहती है इसलिये उसे
'प्रसूति' कहते हैं। दर्पण बहुत छोटा रहता है लेकिन उसमें सूर्य का पूरा प्रतिबिम्ब दिखायी देता है। उसी प्रकार
विदेह को देह धारण करना पड़ता है। उसे 'विवरप्रवेशन' अर्थात् बिल में प्रवेश करना कहते हैं। कुण्ड में चन्द्र
की स्थिति आकाश के चन्द्र की अधोगति मालूम होती है। उसी प्रकार शरीर में जीव की प्रसूति होती है। अर्थात्
जो अव्यक्त है वह व्यक्त में प्रवेश करता है। जल में प्रतिबिम्बित होने पर भी सूर्य गीला नहीं होता। उसी प्रकार
देह में कार्य करते हुए भी आत्मा अलिप्त ही रहता है। जल का प्रतिबिम्ब जिस प्रकार जल के हिलने से हिलता
है उसी प्रकार जीव को जन्म और मरण प्राप्त होता है। कुण्ड में जिस प्रकार पूर्ण चन्द्र प्रतिबिम्ब के रूप में फँस
जाता है उसी प्रकार जीव को भी कर्म का बन्धन प्राप्त होता है। कुण्ड का पानी सूख जाने पर और प्रतिबिम्ब
अदृश्य हो जाने पर क्या चन्द्रबिम्ब अदृश्य हो जाता है ? चन्द्र का बिम्ब जैसा था, वैसा ही वह रहा। कुण्ड के
पानी में जो उत्पन्न हुआ और पानी सूख जाने पर अदृश्य हो गया वे दोनों मिथ्या थे। कुण्ड से बाहर निकालने
का प्रयत्न करने पर भी वे हाथ नहीं आते। उसी प्रकार देह में जीवत्व मिथ्या ही रहता है। उसे सच मान लेने पर
अत्यन्त दुःख सहना पड़ता है। दर्पण बड़ा हो या छोटा हो लेकिन उसमें सूर्य का पूर्ण प्रतिबिम्ब दिखायी पड़ता
है। उसी प्रकार अंतःकरण में रहने वाला मैं समस्त प्राणिमात्र में समान रूप से और सम्पूर्णता से व्याप्त रहता हूँ।
सूर्य कुण्ड में फँसा हुआ दिखाई देता है, उसी प्रकार मूर्ख लोग जीव के लिये कर्म का बन्धन मानते हैं। आकाश
के सूर्य को नहीं देखते और वह कुण्ड में फँसा हुआ है यही मानते हैं। उसी प्रकार जिन्हें निर्गुणों का अनुभव
नहीं है वे ही जीव को बद्ध समझते हैं। आग की ज्वालाओं को जाल में फँसाने का प्रयत्न करने में, जाल ही जल
जाता है। उसी प्रकार आत्मा को कर्म में बांधने के प्रयास में कर्म ही निःसत्त्व हो जाता है। आवाज उत्पन्न होने के
लिये आवश्यक है वायु और प्रत्याघात। लेकिन इन दोनों के विना ही जो आवाज सदा घूमती रहती है वह है
'अनाहतध्वनि'। उस अनाहत ध्वनि का मूल शब्द जिसे परा और अपरा वाणी में 'परा का नाद' कहते हैं और
योगी जिसे बहुत चाहते हैं उसका अनुवाद शब्दों में व्यक्त होने वाला नहीं है। जिस ध्वनि की आनन्ददायक
माधुरी शंकर ही जानते हैं अथवा उस सुन्दर मिठास को सनकादिक ने ही यथेच्छ चखा है। वायु का सत्त्व खोजने
पर तथा शब्दतत्त्व को उससे मिलाने पर उन दोनों के चैतन्य से जो सजीवता उत्पन्न होती है, उसी को मन का
स्वरूप प्राप्त होता है। जो चेतना का चैतन्य है वही वायु का शुद्ध सत्त्व है। शब्द का मूलतत्त्व वही है और उसी
के योग से जीव मनोरूप होता है। जीव का शरीर के साथ संयोग किस प्रकार होता है इसे श्रीकृष्ण स्वयं बताने
लगे तो आधारादि चक्र से घटने वाले सभी संस्कारों का क्रमानुसार वर्णन किया। 'मैं' इस पहले ही भ्रम से जीव
को जीवत्व का आभास होने लगता है और वह जिस भी तत्त्व में प्रवेश करता है, उस तत्त्व को वह 'स्वयं' ही
कहने लगता है। 'मैं देह' उसने कहते ही तत्काल उसकी पूर्णता होकर उसी समय उसे एकदेशीय तथा अंशभूत
देहात्मबुद्धि प्राप्त होती है। वह सूक्ष्म नाद और अतिसूक्ष्म प्राण मिलकर प्रथमतः आधारचक्र में प्रवेश कर प्रारम्भ
में ही अत्यन्त सूक्ष्म स्फुरण पाकर परा नामक वाचा उत्पन्न होती है। आधारचक्र में प्राण का निवास रहता है और
परा नाम की वाणी वहीं रहती है। इसीलिये मन में अत्यन्त सूक्ष्म एवं कोमल स्फुरण उत्पन्न होता है और
स्वाधिष्ठान चक्र में मन का पोषण होने लगता है। वहाँ पश्यंति वाचा बोलने का प्रयत्न करती रहती है किन्तु वह