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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 869 में से

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पृष्ठ 378

३६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
काल में उत्पन्न नहीं होता। किन्तु अकेले सत्त्वगुण की ही वृद्धि कैसे हो? क्योंकि गुण ही गुणों की रक्षा करते हैं।
सत्त्वगुण के पीछे-पीछे तमोगुण रहता है, आगे परिपूर्ण रजोगुण रहता है और उन दोनों के बीच सत्त्वगुण फँसा
रहता है। तब वह कैसे बढ़ेगा? वह तो पूरी तरह फँसा रहता है। ऐसी शंका मन में आकर तुम सोचोगे कि
सत्त्वगुण कैसे बढ़ेगा? तो उसी सत्त्ववृद्धि का लक्षण बताता हूँ, सुनो।
सत्त्वाद् धर्मो भवेद् वृद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः ।
सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥
इन श्लोकों का निरूपण करते समय प्रथम उत्तरार्ध का व्याख्यान सुनाता हूँ। उसमें सत्त्ववृद्धि का कारण
सात्त्विक वस्तुओं का ही सेवन बताया गया है। सात्त्विक पदार्थ ही सेवन करने से सत्त्व की ही वृद्धि होती है और
सत्त्ववृद्धि से ही आचरण करने के कारण जीवों में भी पवित्रता आती है। सत्त्व के उत्कर्ष का लक्षण है धर्मनिष्ठा
एवं स्वधर्म का आचरण। उसी प्रकार वहाँ की वासनाओं का बन्धन वह इहलोक तथा परलोक में भी नहीं चाहता।
अंतःकरण शुद्ध हो जाने पर सत्त्वगुण असीम बढ़ जाता है और पुरुषों में मेरी भक्ति का लक्षण धर्म उत्पन्न होता है।
सत्त्व से धर्म की प्रवृत्ति बढ़ने पर गुरुभजन के प्रति प्रेम स्थापित होता है। अथवा जहाँ मेरी सात्त्विक मूर्ति रहती है,
वहीं भक्ति का विकास होता है। कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म वही मुझे सहज ही अर्पण करता है। मेरे
सिवा किसी और की भक्ति उनमें उत्पन्न ही नहीं होती। तब स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगता है कि गुरु और
भगवान भिन्न नहीं हैं। वही अत्यन्त महान सत्त्व का लक्षण है। यह धर्म पूर्ण सात्त्विक ही है।
धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिरनुत्तमः।
आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते॥ ३ ॥
ऐसे सात्त्विक धर्मों की वृद्धि होने पर, जिन सत्त्वों में मुमुक्षुओं का विश्रामस्थल पुरुषोत्तम प्रकट होता है,
उस सर्वोत्तम सत्त्व की वृद्धि होती है। इस प्रकार सत्त्ववृत्ति में जो धर्म बढ़ता है वही तत्काल अधर्म का नाश
करता है क्योंकि अधर्म के मूल रजोगुण और तमोगुण हैं। उनका नाम भी वह नहीं रहने देता। सात्त्विक पदार्थों के
सेवन से सत्त्व की वृद्धि होती है। उस सत्त्ववृद्धि के कारण सद्विद्या प्राप्त होती है। कृपानिधि श्रीकृष्ण ने सद्विद्या
प्राप्ति का यह साधन बतलाया। अब सात्त्विक पदार्थों के सेवन के सम्बन्ध में जो बताया है वे सात्त्विक पदार्थ
क्या हैं? उनका निरूपण भी इन लक्षणों में करता हूँ।
आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।
ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥ ४ ॥
गुणवृद्धि का कारण आगम अर्थात् शास्त्र है यह ध्यान में रखो। आपका अर्थ है जल और मनपसन्द स्थान
है देश। अब प्रजा का लक्षण सुनो। प्रजा का अर्थ है तीन प्रकार के लोग। जिसकी जैसी संगत होती है वैसा
लक्षण उसे प्राप्त होता है। काल का अर्थ है दिन के भाग। कर्म का अर्थ है वह क्रिया जो शरीर करता है। जन्म
का अर्थ है अच्छे प्रकार की दीक्षा। मंत्र का लक्षण अपनी रुचि के अनुसार। कर्त्ता को जिसमें आदरभाव दिखायी
देता है वह है संस्कार। इसके दस लक्षण हैं। अब गुणवृद्धि सम्बन्धी विचार सुनो। यहाँ प्रस्तुत सत्त्ववृद्धि के
साधकों के लिये निवृत्तिशास्त्र (वेदांत शास्त्र) प्रमुख है। वेदांत के उपनिषद शास्त्र का मथितार्थ ग्रहण करना
चाहिये। आपका अर्थ है जल की पवित्रता। गोदावरी, भागीरथी आदि जो पवित्र नदियाँ हैं उनका एक छींटा भी