श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सान लगाकर चमकाने से अत्यन्त तेज शस्त्र तैयार हो जाता है। अपने सामने शस्त्र तैयार कर उसे ऐक्यभाव की
मुट्ठी में इस प्रकार पकड़ना चाहिये कि शस्त्र और शस्त्रधर दोनों एकजुट हो जाएँ। तब वह संसार पर प्रहार
करने के लिये सिद्ध हो जाता है। ठीक से निशाना साध कर प्रबल प्रहार करने से के लिये तत्पर होते ही
संसारवृक्ष का नाश होता है और प्रहार करने पहले ही टूट जाता है। लिंग वासना निज कल्पना का नाश करती है
उसे धैर्यपूर्वक तथा सावधान होकर नष्ट करने से संसाररूपी वृक्ष का नाश होता है। आत्मसाक्षात्कार होने पर सभी
साधन अपने आप नष्ट हो जाते हैं। भोजन से परितृप्ति हो जाने के बाद शेष पकवान वैसे ही रह जाते हैं। जिस
प्रकार क्षुधा शान्त हो जाने के बाद कोई अमृत भी मुँह से नहीं लगाता, उसी प्रकार ब्रह्मपद की प्राप्ति के बाद इन
साधनों का प्रयास नहीं करना चाहिये। यही भाव मन में रख कर मैंने तुम्हें पहले भी बताया था कि साधनों का
प्रयास प्रवृत्ति निवृत्ति के साथ छोड़ देना चाहिये। परब्रह्म तक पहुँचने के बाद सारे वेदोक्त कर्म भी मिथ्या हो जाते
हैं और आश्रमादि वर्णधर्म भी मिथ्या हो जाते हैं। यह कर्मत्याग का मर्म है। स्वप्न में गड़बड़ी में चलते समय
लड़खड़ा कर जो कुएँ में गिर पड़ता है वह जागृत होने पर खुद को उसमें से निकालता है। उसी प्रकार साधन का
अट्टहास व्यर्थ है। खेत जब फसल से भर जाता है तो उसे कौन जीतेगा? जब गजान्तलक्ष्मी ही घर में आयी तो
दरवाजे दरवाजे भीख कौन माँगेगा? जब निधि ही हाथ लग जाये तो आँख में अंजन कौन डालेगा? उसी प्रकार
आत्मज्ञान प्राप्त हो जाने पर साधनों का बोझ कौन ढोयेगा? हे उद्धव! ज्ञानसामर्थ्य को स्वीकार करने के बाद
सचमुच अपनी वृत्ति का ही त्याग करना चाहिये। अग्नि से अन्न पक कर तैयार होता है, लेकिन जब तक उसकी
भाप निकल नहीं जाती तो उसकी जो गरमी शेष रह जाती है, उससे खानेवाले का मुँह जलता है और खाना
बनाने वाले को भी उसका स्वाद समझ में नहीं आता। पेड़ से आम गिरता है, फिर भी उसमें खटास रहती है।
उसी आम को पाल में डाल दिया जाय तो पक जाने पर उसकी सुगन्ध से ही उसकी मिठास का पता चल जाता
है। लेकिन आम को पाल में रखने में भी खूबी है और वह यह कि एक आम का दूसरे से सम्पर्क नहीं होना
चाहिये क्योंकि ऐसा होने से दोनों में दाग लग जाता है और उनके संसर्ग से अन्य आम भी खराब हो जाते हैं।
समरभूमि में विजयध्वज फहराने से भी, जब तक शरीर के कवच नहीं उतारे जाते तब तक सच्चा विश्राम नहीं
मिल पाता। गर्भवती स्त्री प्रसूत होती है और पुत्र की प्राप्ति से आनन्दित होती है लेकिन जब उसका बारहवें दिन
नामकरण होता है तभी उसे पुत्र होने का सच्चा सुख प्राप्त होता है। कोई पुरुष मर जाता है तो उसके शरीर का
दहन होता है लेकिन सुतक तो रहता ही है। वह जब समाप्त हो जाता है तभी देह की शुद्धि होती है। उसी प्रकार
अज्ञान जाकर जो ज्ञानाभिमान बच रहता है उसका भी त्याग करने पर स्वानंद से आत्म समाधान होता है। खैर का
शूल सचमुच मारता है तो चन्दन का क्या कुछ अलग करता है? उसी प्रकार ज्ञान अथवा अज्ञान दोनों ही प्रकार
का अभिमान बाधक ही होता है। लोहे की बेड़ी तोड़ कर शौक से सोने की बेड़ी पहनने से पीड़ा कम नहीं
होती। 'ब्रह्मादिक' 'ब्रह्म मैं ही हूँ' यह अभिमान कोई शुद्ध ब्रह्म नहीं है। अहंता के कारण वह भी कठिन है।
उसका लक्षण भी सुनो। पानी से नमक तैयार होता है और वह पानी में ही मिल जाता है। लेकिन मोती पानी से
ही तैयार होता है किन्तु वह कठिन रहता है इसलिये वह पानी में घुल नहीं जाता। मोती होने से उसका मोल भले
ही बढ़ जाय लेकिन वह स्त्री के होठों के पास सोने की तार में फँस जाता है। मुक्त होते हुए भी वह नाक के
पास आ गया, यह कठिन प्रसंग अभिमान के कारण उपस्थित हुआ। उसी प्रकार अज्ञान का अभिमान तत्काल
नष्ट हो जाता है लेकिन ज्ञानाभिमान बहुत कठिन है। मिट्टी की गागर कच्ची रहती है वह तत्काल गलने लगती है
और मिट्टी में मिल जाती है। लेकिन वही भट्टी में सेंका हुआ खपरैल कठोर होने के कारण कितने ही दिन क्यों न