श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनिरव्यक्त एको वयसा स आद्यः ।
विश्लिष्टशक्तिर्बहुधैव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥
शिव स्वयं जीवों का जीव है इसलिये उसका शिवत्व भिन्न है ऐसा कहा जाता है। जीव और शिव इन रूपों
से यह भिन्न लगता है इसीलिये जीवत्त्व भिन्न लगता है। समुद्र अपने शरीर पर अनेक वर्त्तुल भँवर बनाता है उसी
प्रकार श्रीहरि ने ब्रह्माण्ड कमल उत्पन्न कर उसे अपनी नाभि में धारण किया है। इसीलिये उसे 'त्रिवृदब्ज' (तीन
लोकों को धारण करने वाला) कहते हैं। उस नाभिकाल में ही अपनी लीला से त्रैलोक्य धारण करता है इसलिये
श्रीहरि को पद्मनाभ कहते हैं। सोने के सिंहासन पर सोने की मूर्ति स्थापित कर उसकी सोने के ही फूलों से पूजा
की जाय तो वे तीनों एकरूप ही भासित होते हैं। उसी प्रकार नाभिकाल में त्रैलोक्य धारण करने पर तीनों लोकों
में एकता का ही भास होता है। इसीलिये श्रुति के मुख से 'पद्मनाभ' यही शब्द बाहर आया। सुगन्ध और मृदुता
के कारण पीली चंपा की कली अकेली दिखाई देती है लेकिन वही अनेक पंखुड़ियों से प्रफुल्लित होती है, उसी
प्रकार मैं श्रीकृष्ण अनेक लोकों के रूपों से विकसित हुआ हूँ। जब तक यह कार्य कारण सम्बन्ध नहीं था तब
तक मैं अव्यक्त ही था। मैं सत्य का भी सत्य हूँ और मुझमें भेद जरा भी नहीं है क्योंकि शब्द और दृष्टांत इनमें
से कोई भी जहाँ प्रवेश नहीं कर सकते ऐसा मैं अपार, अनादि, अनंत, आद्य और अव्यक्त हूँ। इस प्रकार जो
अभेदस्वरूप है उसमें तीन प्रकार के भेद किस प्रकार होंगे ? जिस स्वरूप का विचार करते-करते वेद भी लज्जित
होकर वापस लौटे वही मेरा शुद्ध स्वरूप है। मैं सहायक समुदाय एकत्र न कर स्वयं के लीलाक्षोभ से ही क्षुब्ध
काल बन जाता हूँ। मैं अपने ही सामर्थ्य से प्रबल हुआ हूँ और मेरी ही शक्ति का प्रबल विस्तार सर्वत्र व्याप्त है।
अपनी उस शक्ति के विभाग भी मैंने ही ठीक तरह से बना रखे हैं। उन विभागों के बारे में मैं बताऊँगा, सुनो।
गुणों की शक्ति, देवताओं की शक्ति, मन की शक्ति, इन्द्रियों की शक्ति, महाभूतों की भूतशक्ति इन सब में
क्रियाशक्ति ही प्रमुख रहती है। जीव से जो अदृष्ट शक्ति उत्पन्न हुई वह त्रैलोक्य में अटल है। हरिहर भी जिसे
नियंत्रित नहीं कर सकते ऐसी यह अदृष्ट शक्ति असीम है। जिस अदृष्टशक्ति ने जीव को बद्ध कर अपना लिया है
उस पर नियंत्रण करना मेरे सामर्थ्य के बाहर है। जिस प्रकार स्वयं राजा भी राजाज्ञा का पालन करता है उसी
प्रकार मैं भी अदृष्ट शक्ति का उल्लंघन नहीं करता। जीभ काट कर भगवान को अर्पित की जाती है लेकिन नाक
नहीं काटी जाती। उसी प्रकार मैं कर्म की स्थिति नष्ट करता हूँ लेकिन अदृष्ट की गति को नहीं तोड़ता अथवा
विशेष रूप से यह जान लो कि मेरी ही शक्ति माया, उसे आलिंगन देकर बैठा हुआ मैं अकेला त्रैलोक्य में अनेक
व्यक्त रूपों में भासमान होता हूँ। जो जीवन्मुक्त हुआ वह मत्स्वरूप तक आकर पहुँचता है लेकिन वह भी अदृष्ट
से ही बँधा होने के कारण देहरूपी गृह में नाना प्रकार से विचरण करता रहता है। राजा जनक राज्यपद पर
सुशोभित था। शुक्राचार्य अपने प्रारब्ध के अनुसार नग्नावस्था में रहता था। नारद तो हर जगह कलह ही लगाता
फिरता था और प्रारब्धगति से विनोदी बन गया था। वसिष्ठ को पुरोहितत्व करना पड़ा। भीष्म को शरपंजर पर
सोना पड़ा। याज्ञवल्क्य को दो पत्नियाँ थीं किन्तु प्रारब्ध के चक्कर में फँसकर उसे उसके ही अनुसार आचरण
करना पड़ता था। हे उद्धव ! इस प्रकार प्रारब्ध की शक्ति त्रैलोक्य में अनिवार रूप से बढ़ गयी है। जिस प्रकार
मदारी के हाथ में बन्दर रहता है उसी प्रकार जीव अदृष्ट गति से बँधे रहते हैं। इस त्रैलोक्य में मैं अकेला हूँ
किन्तु उन जीवों की प्रारब्ध गति से अनेक व्यक्तिरूपों में भासमान होता हूँ। 'विश्वतश्चक्षु' यह श्रुतिवचन है इससे
इन सारे व्यक्तियों में मैं ही एक हूँ यह स्पष्ट होता है। मिट्टी के अनेक गोकुल बनाकर उन्हें अलग-अलग नाम
और आकार देकर भले ही पूजा करें लेकिन उन सब में मिट्टी ही रहती है। उसी प्रकार यह संसार मेरे ही रूप में