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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 869 में से

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पृष्ठ 376

तेरहवाँ अध्याय
हे ॐकारस्वरूप अनादि हंस! हे हंसरूप जगदीश! तुम्हें नमस्कार है। हे श्रेष्ठ परमेश्वर! हे परिपूर्ण, तुम
परमहंस के भी सद्गुरु हो। विद्या-अविद्या, ज्ञान-अज्ञान, प्रकृति पुरुष आदि द्वैतभावना के बिना ही तुम्हारे दो
पंख शोभायमान हो रहे हैं, शुद्ध सत्त्व से भी सुन्दर और उज्ज्वल तुम्हारा स्वरूप है। कहते हैं कि हंस शुभ्र वर्ण
का होता है किन्तु तुम्हारा 'हंस रूप' विलक्षण है। जब सुवर्ण के कमल विकसित होते हैं तब अन्य हंस वहाँ
क्रीड़ा करते हैं लेकिन तुम प्रेम से प्रफुल्लित हृदयकमल में क्रीड़ा करते हो। हंस का रहने का स्थान मानसरोवर
है लेकिन तुम मानसविरहित (मन के सिवा) ही रहने वाले हो। हंस की उड़ान आकाश में रहती है लेकिन तुम
चिदाकाश में उड़ान भरते हो। विवेकरूपी चोंच से तुम दूध और पानी सहज ही अलग कर लेते हो और असार
का त्याग कर शुद्ध सार ग्रहण करते हो। तुम्हारे जैसे हंस के लिये चित्समुद्र के वैराग्यरूपी सीप में तैयार-मुक्तारूप
मोतियों का चारा खिलाया जाता है। पृथ्वी का स्पर्श किये बिना तुम निराधार मार्ग से हंस की गति से प्रवास करते
हो यह तुम्हारे प्रवास की कला अद्भुत है। जो स्वभाव में तुमसे भिन्न नहीं है ऐसी वाग्देवता को तुम परिचालित
करते हो। तुम्हारे अंश के कारण ही उसे हंसवाहिनी कहा जाता है। तुम कहते हो तभी सरस्वती चलती है, तुम्हारे
कहने से ही वेद बोलते हैं, जब तुम कहते हो तभी प्राण में स्पन्दन होता है और तुम्हारी वक्तृत्व शक्ति से ही
सरस्वती बोलती है। सरस्वती वाणी की देवता है लेकिन तुम्हारे ही कारण उसे वाक्शक्ति प्राप्त हुई है उसी प्रकार
जैसे बाँसुरी के स्वर मधुर रहते हैं किन्तु उसे बजाने वाला कोई और ही होता है। उसी प्रकार वाचा, वचन और
वक्ता तुम ही हो, सरस्वती तुम ही हो और बोलने वाले भी तुम ही हो। इसलिये अपने हंसरूप की कथा तुम्हीं
सहज ही बोलवा रहे हो। बड़े-बड़े कवियों को बोलने के लिये तुमने सरस्वती प्रकट की। उस हंसरूप की
अपूर्वता से अभिनव बातें ही प्रकट होती हैं। तो तुम हंसरूपी श्रीजनार्दन सर्वभूतों में एकसमान हो। उसके
श्रीचरण मस्तक पर धारण करने के कारण जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो गया। वह जब स्वयं ही भय के कारण
भाग रहा था तब उसे भ्रम के पास छिपने के लिये जगह मिल गयी और उसने जन्म के बाद मरण को वहाँ रहने
के लिये स्थान निश्चित कर दिया। इसलिये जो भ्रम में पड़ता है वह जन्म-मरण में फँस जाता है और एक बार
भ्रम के चक्र में फँसने पर उससे छूटना कठिन है। वहाँ वह रहटमाला की तरह जन्म-मरण के यंत्र में फँस जाता
है। एक के प्रहार से बचता है तो दूसरा सिर पर सवार हो जाता है। जन्म-मरण के संकट से बचने के लिये
तुम्हारे 'सोहंहंसा' का स्मरण करना पड़ता है। जब कोई सावधानी से उसका स्मरण करता है तभी उसका भ्रम
नष्ट होता है। तुम परमात्मा परमहंस हो। परब्रह्मस्वरूपी पूर्ण परमेश्वर हो। ब्रह्मदेव के पुत्र को उपदेश करने के
लिये तुम हंस बने थे। उस हंसमुख का निरूपण सुनाने के लिये ही श्रीशुक्राचार्य वक्ता बने और उस भाषण का
अर्थग्रहण कर ही परिक्षिति परम पावन हुए। उस हंस का हंसगीत श्रीकृष्ण उद्धव को सुना रहे हैं। इसलिये
श्रोतागण इधर ध्यान दें जिससे उन्हें सहज ही आत्मबोध होगा। वही यह तेरहवाँ अध्याय भगवान अत्यन्त
आस्थापूर्वक सुना रहे हैं। उसे सुनते ही उद्धव विषयों का नाश होते देख सकेगा। तेरहवें अध्याय में सत्त्वबुद्धि के
कारण का निरूपण है तथा सद्दिद्या के उद्भव का क्रमानुसार अत्यन्त सुलभ रीति से वर्णन किया गया है। उस हंस
के इतिहास का योग भगवान स्वयं बतायेंगे और उसी में चित्त को विषयों का वियोग कैसे होता है वह भी सुलभ
रीति से बताया जायगा। बारहवें अध्याय के अन्त में सद्गुरु की भक्ति कर विद्यारूपी शस्त्र प्राप्त कर जीवों में