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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 869 में से

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पृष्ठ 363

बोल नहीं सकती। इस चक्र में प्राणवायु भी एकत्र रहता है किन्तु वह उसके आगे नहीं जा पाता। वहाँ प्राण और
अपान का झगड़ा होकर दोनों ही रूठ जाते हैं। वहीं बहुत बड़ा गृहकलह मच जाता है और दोनों में अलगाव
होने लगता है। इस प्रकार प्राण, अपान, व्यान, उदान तथा समान ये पाँच प्राण अलग-अलग रहने लगते हैं। जो
पहले रूठ गया था उसे 'अपान' कहते हैं। गुस्से में जो आगे बढ़ा आता है उसे 'प्राण' कहते हैं। दोनों में जो
समानरूप से नाभि में रहता है, उसे 'समान' कहते हैं। जो कंठ में रहता है, उसका नाम 'उदान' है। लेकिन व्यान
को रहने का स्थान ही नहीं है इसलिये वह पूरे शरीर में परिभ्रमण करता रहता है। इनसे भी सूक्ष्म पंचप्राण होते हैं
जो भिन्न-भिन्न स्थानों में रहते हैं। उन्होंने स्वयं ही अपने रहने के लिए अलग-अलग स्थान निश्चित कर लिया
है। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा पाँचवाँ धनंजय यही वे पंचप्राण हैं। इनकी शरीर में जहाँ बस्ती रहती है वे
स्थान तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ। छींकर नाग का घर है, जम्हाई कूर्म का घर है और डकार कृकल का घर
है। हिचकी देवदत्त का निवास है। लेकिन धनंजय को कहीं भी बसेरा नहीं मिलता इसीलिये जीव और देह का
संगम होने के स्थान पर (अर्थात् चिज्जडग्रंथि में) धनंजय रहता है। इससे जीव शरीर को छोड़ देता है तो भी
कुछ समय के लिये यह शरीर को बचाकर रखता है। स्वाधिष्ठान नामक चक्र से प्रारम्भ कर क्रमानुसार प्राण के
दस भाग होते हैं। उनका स्थान, मान और लक्षण ये सारी बातें मैंने तुम्हें बतायीं। मैंने तुम्हें पहले ही यह बात
बता दी है कि प्राण और अपान ये दोनों रूठे हुए हैं। इसके बाद उन दोनों का कभी मिलन नहीं हुआ क्योंकि वे
दोनों ही बहुत हठी तथा सनकी हैं। उन दोनों में जो मेल करा दे वही प्यारा दुलारा है, यह जान लो। उसे मैं स्वयं
ही अपना सर्वस्व अर्पण करता हूँ। इसी का नाम योगसाधना है। हे उद्धव! प्राण के लक्षण बताते-बताते सहसा
प्राण और अपान की साम्यास्थिति बताने का प्रसंग आया। इसलिये तुम भी उसे सुन लो। स्वाधिष्ठान चक्र से
मणिपुर चक्र में आते समय जीव और मन की एकता होती है। वहीं सूक्ष्मप्राण का निवास होने के कारण पश्यंती
परावाणी की एकता प्राप्त करती है। तब मन में खिलाड़ी प्रवृत्ति उत्पन्न होकर बाल्यदशा प्राप्त होती है, यह समझ
लो। इसके बाद प्राण आराम से आगे बढ़ता है और अनाहत स्थान तक पहुँच जाता है। तब पश्यंती वाणी की
कृपा से मध्यमा नाम की वाची उत्पन्न होती है। वह मौन का दामन छोड़े बिना अपने से ही गुनगुनाने लगती है।
यहाँ मन को मुग्धावस्था (सोलह वर्ष के लगभग की अवस्था) प्राप्त होकर वह अनेक प्रकार के उपभोगों और
सुखास्थिति की कामना करती है। लेकिन लज्जा के कारण कुछ कह नहीं पाती। फिर प्राण अत्यन्त तत्परता से
विशुद्धि स्थान पर पहुँचता है और उच्छृंखल उदान का रूप धारण करता है। तब मन को भी परिपूर्ण यौवन प्राप्त
होता है। उस विशुद्धि चक्र में भीतर से परावाणी भी आ मिलती है और पश्यंती और मध्यमा भी एक हो जाती
हैं। इस प्रकार वे सब बड़ी शान से विचरण करने लगती हैं। उनके इस झटके के पीछे-पीछे तत्काल मुँह से
वाणी प्रकट होती है। वह यौवन से उन्मत्त रहती है और मुँह से स्वर और वर्णों की व्यर्थ की बड़बड़ करती रहती
है। आज्ञाचक्र की स्थिति भौंहों में होती है और वह उनसे अलग है। वहाँ वाणी का प्रवेश नहीं होता। योगियों का
हंस लक्षण यही है। ये क्रमानुसार छह चक्र हैं। चार मातृका, अट्ठाईस वर्ण तथा सोलहों सम्पूर्ण स्वर प्राप्त हो
जाएँ तो यही योगियों का हंसलक्षण होता है। अब किस चक्र में कौन से वर्ण उत्पन्न होते हैं मातृका का क्या
स्थान है सारे स्वर कहाँ उत्पन्न होते हैं उनके भी लक्षण सुनो। आधारचक्र में चार पंखुड़ियों की आकृति होती है
और उन आकृतियों में चार मात्राएँ छूटी रहती हैं। व, श, ष तथा स इन अक्षरों को शास्त्रज्ञों ने मात्रा कहा है।
स्वाधिष्ठान छह पंखुड़ियों का चक्र है। वहाँ छह वर्ण स्थापित हैं। 'ब' कार से 'ल' कार तक (ब, भ, म, य, र,
ल) ये जो छह वर्ण हैं वे उन स्थानों पर निश्चित रूप से रहते हैं। मणिपुर चक्र में दस पंखुड़ियाँ हैं, जहाँ दस