श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वर्ण स्थापित हैं। 'उ' कार से 'फ' कार तक (ब, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ) ये दस वर्ण उस चक्र में रहते
हैं। अनाहतचक्र बारह पंखुड़ियों का है। वहाँ 'क' कार से 'ठ' कार तक (क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ,
ट, ठ) बारह वर्ण रखे हुए हैं। वे उस चक्र की शोभा बढ़ाते हैं। विशुद्ध चक्र सोलह पंखुड़ियों का होता है और
उसमें अ, इ, उ, ऋ, लृ मिलाकर कुल सोलह स्वर हैं। उन सभी स्वरों की जमघट कंठस्थान में होती है। वेदों में
उनका अगाध सामर्थ्य दिखाई देता है। लेकिन आज्ञाचक्र बहुत कठिन है। वहाँ काकीमुख नाम का जो द्वार है वह
खुलता ही नहीं है। वहाँ प्राणों की छटपटाहट नहीं चलती। वहाँ का मार्ग अत्यन्त विकट होने के कारण वह उन्हें
नहीं मिल पाता। वह आज्ञाचक्र दो पंखुड़ियों का होता है और वह शुद्ध रूप से हंस का मन्दिर है। वहाँ पहुँचने
के लिये महान योगसामर्थ्य की आवश्यकता होती है। इस स्थान तक पहुँचने के लिये योगी अनेक प्रकार के
हठयोग करते हैं लेकिन अनेक संकटों का सामना कर योगाभ्यास करते पर भी वे वहाँ तक नहीं पहुँच पाते। मेरा
यह स्थान प्राप्त करने के लिये एक अत्यन्त गूढ़ अनुष्ठान है। 'सोहं हंसा' की साधना जो कोई अत्यन्त सावधानी
से करेगा वही उस स्थान तक पहुँचेगा। प्राणायाम का निरोध और त्याग कर 'सोहं हंसा' का स्मरण कर जो
सावधानी से यह अनुष्ठान करेगा वही यह स्थान प्राप्त करेगा। वही वायु का निरोध करने में सक्षम होता है और
वही आज्ञाचक्र में प्रवेश करता है। इतना ही नहीं वह उससे भी आगे का मार्ग अचूक खोज निकालता है। वहाँ
ऋद्धि सिद्धि के समुदाय उसे अनेक सुखसमृद्धि के फल उपलब्ध कराते हैं लेकिन वह उन सब को पीछे छोड़
अपने पवित्र मार्ग पर अग्रसर होता है। जो ऋद्धिसिद्धियों के भुलावे में आ गया या जिसमें सिद्ध होने का
अभिमान जाग उठा वह उस आज्ञाचक्र से च्युत हुआ और उसके सारे परिश्रम व्यर्थ गये ऐसा समझना चाहिये।
लेकिन जिसमें पूर्ण वैराग्य रहता है वह सिद्धियों के भुलावे में नहीं आता। सुखोपभोग तथा मानसम्मान पर लात
मार कर वह मेरी प्राप्ति के लिये अपने मार्ग पर चलता रहता है। इसके उपरान्त औटपीठ (आज्ञाचक्र के बाद का
स्थान) तथा गोल्हाट (औटपीठ के आगे का स्थान) पार कर भ्रमर गुफा के संकट को पार कर सहस्रदल कमल
का प्रवाह सोख कर वे धैर्यवान पुरुष मत्स्वरूप होते हैं। आज्ञाचक्र की स्थिति बताते समय योगमार्ग का वर्णन
रुचिकर लगा इसमें पिछली कथा सुनाना भूल गया। इसके लिये श्रोतागण क्षमा करें। आप कहेंगे कि मछली जब
प्रवाह के साथ बहती है तो वह पीछे मुड़ कर नहीं देखती, उसी प्रकार तुम भी बिना पीछे मुड़े ग्रन्थनिरूपण में
आगे बढ़ते चलो। व्यर्थ की बकवास क्यों करते हो? बच्चा गलती करता है तो माँ उसे सिखलाती है, उसी प्रकार
आपका यह भाषण मेरे कल्याण का ही द्योतक है। चक्रों का निरूपण करते हुए मन योग की ओर मुड़ गया और
इसीलिये पिछला निरूपण भूलकर आगे बढ़ गया। यह सुनकर श्रोतागण हँस पड़े और बोले, तुम इस ग्रन्थ के
कर्त्ता नहीं हो यह हमें मालूम हो चुका है इसलिये उसका निराकरण करने के लिये व्यर्थ का प्रतिपाद मत करो।
करोड़ों ग्रन्थों का अध्ययन करने पर भी योगज्ञान का माधुर्य समझ में नहीं आता। उसे तुमने अपनी ही रुचि से
स्पष्ट करके बतलाया। श्रीमद्भागवत समझने में कठिन था उसे श्रीकृष्ण ने तुम्हारे ही मुख से स्पष्ट करके
सुनाया। वह सचमुच हमें बहुत अच्छा लगा। यह बारहवाँ अध्याय अत्यन्त गूढ़ है। यह बात देवाधिदेव ने ही
कही है। लेकिन तुमने तो उसका अर्थ भी स्पष्ट करके बतलाया। इस प्रकार संतों ने आदरभाव व्यक्त कर
अभयदान दिया। यह देखकर एकाजनार्दन को भी अत्यन्त हर्ष हुआ और उसने संतों को नमस्कार किया। वैखरी,
मात्रा, स्वर और वर्ण आदि पदों का व्याख्यान हुआ। उसका ही निरूपण श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर उद्धव से कर रहे
हैं। जीव और शिव का जो सूक्ष्म मूल है, वही आदिपुरुष वाणी के रूप में स्थूल आकार धारण करता है। इसी
का सरल विवेचन करके बताता हूँ।