श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय ३५७
गुरु जिस पर बैठेंगे वह घोड़ा मैं ही बनूँगा। गुरु का बोझ उठाने के लिये मैं घोड़े के रूप में वाहन बनूँगा। गुरु के
आगे-आगे मैं मार्गरक्षक योद्धा रहूँगा, गुरु के गुणों का वर्णन करने के लिये मैं उनका भाट बनूँगा और गुरु के घर
शान्तिपाठ करने वाला भिक्षुक बनूँगा। गुरु के सिर पर छत्र धारण करने वाला, उन पर चँवर झुलाने वाला, उन्हें
बीड़ा देने वाला, फूल देने वाला, झाड़ लगाने वाला, दूध देने वाला और द्वारपाल मैं ही बनूँगा। गुरु जिधर-जिधर
ध्यान देंगे वहाँ का अवधान मैं ही रहूँगा, भले ही प्राण चले जाएँ लेकिन गुरु को छोड़कर एक क्षण के लिये भी
मैं कहीं नहीं जाऊँगा। गुरु जो कथा कहेंगे उसे आग्रहपूर्वक सुनने वाला मैं श्रोता बनूँगा। गुरुकृपा से अध्यात्मज्ञान
सुनाने वाला वक्ता मैं बनूँगा। गुरु उदारतापूर्वक दान देने लगें तो मैं गरीब याचक बन जाऊँगा। गुरु अपने मन की
बात कहने लगें तो मैं ही एकान्तस्वरूप हो जाऊँगा। गुरु विश्राम करने बैठें तो मैं अवकाश बन जाऊँगा और गुरु
के हृदयस्थ अवकाशरहित जो चिदाकाश है वह मैं बनूँगा। गुरु जिस पर बैठेंगे वह सुखकारी आसन मैं ही बनूँगा
और डोली उठाने वाला कहार मैं ही बनूँगा। स्वामी का ख्याल रखते हुए, बड़े संयम से तेज कदम उठाकर तथा
गुरु की पालकी का डंडा कन्धे पर उठा कर स्वामी से बातें करते हुए मैं तेज कदमों से चलता जाऊँगा। वाहन में
बैठे हुए गुरु का ध्यान रखते हुए कहीं पैर परस्पर टकरा न जाय इसलिये पैर उठाकर चलूँगा। जमीन के गड्ढों
तथा ऊँचाइयों को बचाकर ठीक तरह से चलूँगा। संकल्प और विकल्प के झटकों से शरीर के दायें-बायें अंग को
बचाते हुए श्रीगुरु के मुख की ओर देखते हुए मैं चलूँगा। रास्ता बिना भूले, पालकी का डंडा न हिले इसका ध्यान
रखते हुए, दूसरों की आस किये बिना मैं उत्तम कहार बनूँगा। उस सुखद वाहन में बैठकर चलने से सुख बढ़ता
ही जाएगा। चढ़ना, गिरना, लड़खड़ाना, डरना, दौड़ना, अटकना आदि का ध्यान रखते हुए ध्यानपूर्वक पूरी
उम्मीद से चलूँगा। पालकी में बैठने में गुरुजी को कष्ट न हो इसलिये पालकी का डंडा कन्धे पर, मस्तक पर,
कोहनी पर, इस प्रकार रखकर पैर का ध्यान रखते हुए चुपचाप चलूँगा। सामने चढ़ाई आ जाय, मोड़ आये, साँस
फूलने से शरीर थक जाय लेकिन सीना तान कर, धैर्यपूर्वक चढ़ाई चढ़ता चलूँगा। काम का प्रवाह लाँघ कर,
क्रोध के आवेग से बच कर तथा गड्ढों से बच कर पालकी का अगला डंडा कन्धे पर लेकर मैं चलूँगा। ममता
की दलदल विचित्र होती है। उसमें मनुष्य पूरी तरह फँस जाता है लेकिन मैं पैर में जरा भी कीचड़ लगे बिना
उस दलदल को पार कर जाऊँगा। मोहरूपी नदी की खोह बहुत भयंकर है। पानी के तेज बहाव के कारण वह
बड़ी तेजी से नीचे की ओर खींचता है। लेकिन मैं स्वामी को पानी का एक भी बूँद लगे बिना एक किनारे से
दूसरे किनारे तक ले जाऊँगा। सामने दृष्टि रख कर तेजी से आगे चलते समय दोनों ओर का कहार मैं बन
जाऊँगा और रास्ता चलता जाऊँगा। इस प्रकार आगे और पीछे मैं स्वयं सुखासन के आनन्द में कहीं स्वामी की
नींद न टूटे इसका ध्यान रखते हुए उन्हें ले जाऊँगा। जूठे अन्न पर पलने वाला, आठों पहर जागता रहने वाला
तथा गुरु के द्वार पर 'गुरु' 'गेरु' कहने वाला मैं कुत्ता बन कर रहूँगा। कोई अपरिचित दिखाई देते ही मैं 'सोहं'
भावना से भूकने लगूँगा और भजनरूप कुण्ड में बैठने वाले गुरु के द्वार का कुत्ता बनूँगा। ऐसी अनेक कल्पनाएँ
कर गुरु की सेवा के सम्बन्ध में शिष्य विचार करता रहता है। दैवयोग से वह भले ही दूर चला जाए किन्तु
भक्तियोग से वह पास ही रहता है। गुरु सेवा के लिए जो इस प्रकार अपने आप को न्योछावर कर देता है वह
सद्विद्या शास्त्र में सहज ही पारंगत हो जाता है। वह गुरु के पास रहे अथवा दूर रहे लेकिन उसे गुरुभक्ति से प्रेम
ही रहता है। वह अपने प्राण गुरु की सेवा के लिये और भजन के लिये गुरु के द्वार पर ही रखे रहते हैं। गुरुभक्ति
के प्रति ऐसी तत्परता के कारण तथा स्वरुचि से अधिकाधिक एकाग्रता साधने के कारण वही गुरुकृपाकुठार रूप
सद्विद्यालक्षणशस्त्र उसके हाथ में आता है। उस शस्त्र को वैराग्य की सील पर घिसने और स्वस्वरूपाकार वृत्ति ने