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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 869 में से

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पृष्ठ 372

३५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सबकी क्रिया मैं स्वयं बन जाऊँ ऐसी वह मन ही मन इच्छा करता है। सद्गुरु के सारे भोग मैं ही बनूँगा। इस
प्रकार मैं ही गुरुभक्तिस्वरूप बनकर रहूँगा। सद्गुरु जहाँ खड़े रहेंगे वहाँ उनके पैरों के नीचे की जमीन मैं बनूँगा,
सद्गुरु जहाँ-जहाँ चलते जायेंगे उस मार्ग की मिट्टी मैं ही बनूँगा। उनके पैर धोने का पानी मैं ही बनूँगा और
चरण धोने वाला मैं ही रहूँगा और उनके चरणों के तीर्थ को सेवन करने वाला मैं ही बनूँगा। सद्गुरु के चरणों की
धूल मैं स्वयं बनूँगा। सद्गुरु जिस पर बैठते हैं, वह सिंहासन भी मैं ही बनूँगा। उस पर रखा जाने वाला आसन
भी मैं ही बनूँगा इसे ध्यान में रखो। सद्गुरु के शरीर में जो तेल लगाया जाता है, वह भी सर्वांग से मैं ही बनूँगा।
गुरु को टेकने के लिये आगे-पीछे रखे जाने वाले तकिये मैं बनूँगा। यहाँ तक कि सद्गुरु की सिद्ध पादुकाएं भी
मैं ही बनूँगा। दूसरों को उन्हें हाथ भी नहीं लगाने दूँगा। गुरु का श्वासोच्छ्वास भी मैं ही बनूँगा और उनके नाम
से मैं ही तीव्र गति से बाहर आऊँगा। गुरु जिस सुगन्ध का सेवन करेंगे वह सुगन्ध मैं बनूँगा। गुरु कृपादृष्टि से
जिधर देखेंगे वह दृश्य मैं ही बनूँगा। अथवा जो कीर्तन गुरु को पसन्द है उसका गायक मैं रहूँगा। सद्गुरु के मुख
में जो कथा होगी वह आदरपूर्वक मैं ही रहूँगा और उसका प्रत्येक अक्षर और उसका अर्थ भी मैं ही रहूँगा।
सद्गुरु जहाँ स्नान करेंगे वहाँ भी स्नान से उड़ने वाला पानी मैं बनूँगा। गुरु जो आचमन करेंगे वह भी मैं ही
बनूँगा। गुरु जो वस्त्र परिधान करेंगे वह उत्तम वस्त्र मैं ही रहूँगा। गुरु के पैर पोंछने के लिये जो धूतवस्त्र होता है,
वह मैं ही रहूँगा। गुरु के शरीर पर उबटन लगाया जाता है, वह उबटन मैं बनूँगा। गुरु के चरणों पर अर्पण किया
जाने वाला फूल मैं ही रहूँगा। सद्गुरु जिसमें भोजन करेंगे वह थाली और अन्न मैं ही रहूँगा। उसमें रस का
माधुर्य, पकवान, पंगत में साथ में बैठने वाला सब कुछ मैं ही रहूँगा। दही मथ कर जो मक्खन निकलता है उसे
वैराग्यरूपी अग्नि पर पका कर भोजन का प्रमुख व्यंजन घृत मैं ही बनूँगा। भोजन में स्वाद लाने वाला लवण मैं
बनूँगा और इसके बाद भी यदि कोई कमी रह जाएगी तो उसे वे गुरु पूरा करेंगे। जो पानी गुरु प्राशन करेंगे वह
पानी मैं बनूँगा और सद्गुरु तृप्ति की जो डकार देंगे वह भी मैं ही बनूँगा। गुरु को जो फल अर्पण किया जाता है
वह फल तत्काल मैं बनूँगा। गुरु को अर्पण करने के कारण सफल होने वाले फल की सफलता मैं बनूँगा। गुरु
की जूठन ग्रहण करने की मुझे आदत-सी पड़ गयी है। इसके लिये मैं बिल्ली बनकर उनकी थाली चाट कर
साफ करूँगा। गुरु जब सुगन्धित चूर्ण से हस्तशुद्धि करेंगे तो मैं सुगन्धी चन्दन बन जाऊँगा और मुख में सुगन्ध
लाने वाली गन्ध भी बन जाऊँगा। फलाशा तोड़ कर उसके टुकड़े तथा वासना की रेशाएँ तोड़ कर उसका बीड़ा
सद्गुरु के मुख में रखने से आने वाली ताम्बूल की रुचि मैं बनूँगा। 'अहंता' का अभिमान छोड़कर मैं 'सोहं' का
शुद्ध चूना बन जाऊँगा और शान्ति रूप पके पान में लग कर सद्गुरु के मुख में प्रवेश करूँगा। सभी सारों का
शुद्ध कत्था मैं बनूँगा। सद्गुरु के मुख में रंग के रूप में मैं ही शोभा बढ़ाऊँगा। सद्गुरु के मुख का पवित्र थूक मैं
लपकूँगा और पीकदानी का मुँह मैं ही बनूँगा। गुरु ने चबाया हुआ बीड़ा और थूकी हुई पीक के साथ पीकदान मैं
ही बनूँगा। मक्खियाँ भगाने की चँवर मैं ही बनूँगा। गुरु के मुख का बीड़ा लेने के लिये मैं अत्यन्त आस्था से
सेवक बनूँगा। अन्यथा गुरु की गोद में मैं प्यारा बच्चा बनकर लेटूँगा। मेरे गुणरूपी पुष्पों की माला मैं बड़े प्यार से
गुरु के गले में डालूँगा। गुरु कमल के फूल के साथ खेलने लगेंगे तो उनका करकमल मैं ही बनूँगा। गुरु की
नीरांजन से आरती करते समय उस नीरांजन की ज्योति मैं अपने ही तेज से प्रकाशित करूँगा और गुरु जिस
प्रकाश से चलेंगे उस दीपक की प्रभा मैं बनूँगा। मैं श्रीगुरु पर अपने प्राण न्योछावर कर दूँगा। उनके सारे कष्ट मैं
अपने ऊपर ले लूँगा। वह शाप लक्षण मुझे लगे। मैं छत्र भी हूँ और छत्रधारी भी। चँवर भी मैं हूँ और चँवरधारी
भी मैं ही हूँ। पंखा भी मैं हूँ और पंखा झलने वाला भी मैं ही हूँ। इस प्रकार गुरु का सारा परिवार मैं ही रहूँगा।