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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 869 में से

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पृष्ठ 369

बारहवाँ अध्याय ३५३
ऊँची उड़ान भरती है और वहाँ से एकाएक अपने शिकार पर टूट पड़ती है उसी प्रकार उत्तम नरदेह प्राप्त होने पर
भी ये विषयों से नोच-खसोट करते रहते हैं। ये मन से विषयासक्त रहते हैं और अधोगति प्राप्त करने योग्य होते
हैं वे वास्तव में दुःख फल के ही भोक्ता होते हैं। उद्धव ! जो पुरुष गृहस्थाश्रम का त्याग कर वानप्रस्थाश्रमी हो
जाते हैं उन्हें ही सुखफल प्राप्त होता है। उस सुखफल के विभागी, यथाशास्त्र कर्म करने के कारण ही जो उस
राह पर चल पाते हैं, ऐसे ब्रह्मस्थान के अन्त तक और भी अनेक स्वर्ग हैं। ब्रह्मचर्याश्रम में वेदाध्ययन करना
चाहिये, गृहस्थाश्रम में अग्नि की तथा ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिये और वानप्रस्थ में वन में रहकर वहाँ के
फलभक्षण कर रहना चाहिये। इस क्रम से आचरण करने से क्रमानुसार मुक्तिस्थान अर्थात् ब्रह्मस्थान जिन्होंने
प्राप्त कर लिया है वे लोग सुख के फल के भोक्ता हैं यह जान लो। अन्य स्वर्गों में सुख की प्राप्ति होती है
लेकिन वहाँ से पुनः जन्म लेना होता है। ब्रह्मस्थान प्राप्त होने पर उन्हें मुक्ति ही प्राप्त होगी। मूलरूप में
'अरण्यवासी' यही पद है। उस पद से 'वानप्रस्थ' का ही बोध होता है। यहाँ 'संन्यासी' यह अर्थ नहीं लिया गया
है। संन्यासी को वनवासी नहीं कहा जा सकता। वेदों में संन्यासियों के रहने के स्थान का कोई उल्लेख नहीं है।
उन्होंने स्वदेह का हवन किया रहता है इसलिये उनके रहने का कोई निश्चित स्थान नहीं है। जो विरजा होम में
अविद्या आदि कर्म प्रवृत्तियों को ही जला देते हैं वे संसाररूपी वृक्ष के फल खायेंगे यह सम्भव नहीं लगता।
जागृत अवस्था के मेहमान को स्वप्न के घर में भोजन के लिये भेजना जिस प्रकार सम्भव नहीं है उसी प्रकार
मनोवासना शून्य संन्यासी संसारसुख के भोक्ता किस प्रकार होंगे ? जिन्होंने विरजाहोम में अपना कर्म जलाकर
'ब्रह्म मैं ही हूँ' यह सूत्र साध लिया उनके लिये जंगल में अथवा गाँव में नियमित निवासस्थान कौन देगा?
आकाश के निवास के लिये कौन-सा घर निश्चित किया जाय ? उसी प्रकार जो संकल्प त्याग संन्यासी हैं उन्हें
रहने के लिए कौन जगह देगा ? जो संकल्प त्याग करने वाले संन्यासी होते हैं उन्हें वनवासी कौन कहेगा?
इसलिये उन्हें संसारवृक्ष के फल का भोक्ता नहीं कहा जा सकता। मूल पद अरण्यवासी है लेकिन वह वानप्रस्थ
के हिस्से में आया है क्योंकि वानप्रस्थमाश्रमी सदा वन में रहता है इसलिये दूसरे फल (सुखफल) का भोक्ता
वही है। अब संन्यासी की सुखप्राप्ति के बारे में सुनो। वे भी दोनों फलों को मिथ्या ही समझते हैं। त्रिभुवन में
सर्वत्र एक मैं ही हूँ यह अनुभव उन्हें निश्चयपूर्वक हुआ रहता है। अनेक रूपों में फैला हुआ जो यह विस्तार है,
वह सचमुच मैं चिदात्मा ही हूँ, यह निश्चय गुरुमुख से जानकर वे मेरा सच्चा सुख प्राप्त कर चुके हैं। वे
मत्स्वरूप होकर मेरे हो गये, मेरे ही सुख से सुखरूप हो गये, सुख-दुःख फलों से वंचित हो गये और संसार में
आने से भी मुक्त हो गये। मायामय होने के कारण संसार मिथ्या भासरूप है यह जो जानता है वही वेदवेत्ता और
विद्वान है। उसे ही परमहंस कहते हैं। वह सारे विश्व को अपना घर समझ कर ही रहता है। ऐसा पद प्राप्त करने
के लिये अनन्यभाव से गुरुभक्ति करनी चाहिये। उसी से संसार की निवृत्ति होगी। यही बात श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
पहले सत्संगति के बारे में बताया। उससे मेरे पद की प्राप्ति होती है। उसी अध्याय के अन्त में गुरुभक्ति के बारे
में बताते हैं।
एवं गुरुपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः।
विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४॥
भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक साधन करने पर भी यदि सद्गुरु का भजन नहीं किया तो संसारवृक्ष का भेदन
नहीं हो सकता। जिस प्रकार वीरों की स्वयं की ही शक्ति शत्रु का नाश करती है, उसी प्रकार संसारवृक्ष का