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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 869 में से

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पृष्ठ 379

तेरहवाँ अध्याय ३६३
अकस्मात् शरीर पर गिर जाय तो पाप निःशेष हो जाता है अथवा जिसके लिये ब्रह्मादिक देवताओं की भी लार
टपकती रहती है उस मेरी प्रतिमा का चरणामृत अथवा शालिग्राम शिला का तीर्थ भी सभी पापों का विनाश करता
है। जिससे सारे तीर्थ पावन होते हैं वह ब्राह्मणों का चरणतीर्थ स्वयं नारायण शिरसावंद्य करते हैं और ब्राह्मणों के
चरण अपने वक्षःस्थल पर धारण करते हैं। पानी कहीं का भी क्यों न हो ? जो पानी सद्गुरु के चरणों से लगा है
वह सकल तीर्थों से भी श्रेष्ठ है। वह सेवन करते ही तत्काल उद्धार करता है। सत्त्ववृद्धि का कारण उदक
(जल) है। वह इस तीर्थ से पुण्य पावन होता है और उसका सेवन करने से सत्त्ववृद्धि का स्वरूप अपने आप
प्रकट होता है। प्रजा का अर्थ है श्रेष्ठ लोग। साधु तथा बैरागी पुरुषों की सेवा करनी चाहिये, क्योंकि इससे जड़
जीवों का उद्धार होता है। सत्त्ववृद्धि का प्रमुख कारण सत्संगति है, यह समझ लो। इस सत्संगति का वर्णन
बारहवें अध्याय में हुआ है। अब देश का अर्थ है नैमिषारण्यादि पुण्यभूमि अथवा सत्पुरुषों द्वारा सिद्धि प्राप्त करने
के लिये स्थापित किया हुआ सिद्धिस्थान। वह स्थान निर्जन, एकान्त तथा ऐसा हो जहाँ बैठने से तत्काल सत्त्व
को अधिक से अधिक बल प्राप्त होता है। एकांत में आसन लगा कर बैठने का अभ्यास पूर्ण हो जाय और चिद्धन
अर्थात् परब्रह्म प्राप्त करने के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाय तो यह सत्त्वगुण अपने आप बढ़ता है। उसी प्रकार
साधकों के लिये उत्तम समय है बाह्य मुहूर्त—भोर। यही समय पूरी तरह योग्य और अनिवार्य है। अथवा जिस
समय मन उद्वेगरहित तथा हर्षयुक्त हो वह काल भी उपयुक्त है। प्रेमपूर्ण अंतःकरण से कीर्तन श्रवण करने में जो
काल व्यतीत होता है, अथवा जयंती आदि अवसरों पर महापूजा करने में, एकादशी को जागरण करने में जो
काल व्यतीत होता है, वही समय की उत्तम सार्थकता है। हरिकीर्तन में गाने में अथवा नाचने में जो समय व्यतीत
होता है उस काल की महिमा का वर्णन मैं भी नहीं कर पाऊँगा। अभिमानरहित होकर कीर्तन करना, निर्लोभ से
गाना और नाचना इसमें जो समय व्यतीत होता है उस काल को मैं श्रीकृष्ण भी प्रणाम करता हूँ। उसकी महिमा
का वर्णन कौन करे ? जो कर्म आशारहित हो, फलरहित हो अथवा निष्काम कर्म हो उसी को कर्म कहना चाहिये
अथवा जो क्रिया उपकार के लिये की जाती है वही वास्तव में सात्त्विक कर्म है। गुरु से दीक्षा ग्रहण करने में
पुरुष को मानों एक नया जन्म ही मिलता है, इसे स्मरण रखो। उद्धव ! गुरु ही माँ-बाप हैं। उसका भी लक्षण
सुनो। सचमुच जन्म लेने वाले बालक को भी पाँच प्रकार के पिता होते हैं। एक जन्म देनेवाला, दूसरा उपनयन
करने वाला और तीसरा अन्न खिलाकर पोषण करने वाला। जो भय से छुड़ाता है, जो बन्धन से मुक्त करता है
और जो देह को मरने से बचाता है वह भी शास्त्रों के अनुसार पिता ही है। इसके अलावा एक पाँचवाँ पिता भी
है। वह पंचमहाभूतों का विनाश करता है, वह मृत्यु से छुड़ाता है और गर्भवास के दुःख का निवारण करता है
जिनके चरणों का दर्शन करने से संसार बन्धन पीड़ा नहीं दे सकता वह सद्गुरु पिता है। वह भाग्य के बिना नहीं
मिलता। जन्म लेने वाले बालक के लिये माता और पिता अलग-अलग रहते हैं। बाप वीर्य प्रदान करता है और
उस वीर्य को धारण कर उससे होने वाले गर्भ का पोषण करने का कार्य माँ का होता है। सद्गुरु उस प्रकार का
पिता नहीं है। अपना वीर्य प्रदान किये बिना और योनिद्वार से जन्म दिये बिना वह स्वयं माँ और बाप बनता है।
उदर से बाहर आने के बाद माँ के हृदय में पुत्रस्नेह उमड़ पड़ता है। लेकिन जो बाहर है उसे पेट में डालकर
गुरुमाता सच्ची आमीयता से महान बन गयी है। इसलिये शिष्य के लिये सद्गुरु ही सचमुच माता-पिता हैं। वही
अपनी ममता से उसका पोषण करता है और अभिन्न भाव के कारण गुरु शिष्य में एकत्व उत्पन्न होता है। इससे
पहले जिन चार पिताओं का वर्णन किया उन सबको सौतेला बाप समझो। माता और पिता जब अलग-अलग हैं
तो वे सगे कैसे हुए ? इसलिये जो दयालु सद्गुरु है वही सच्चे शिष्य का सगा पिता है। इसीलिये उन दोनों में