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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 869 में से

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पृष्ठ 375

बारहवाँ अध्याय ३५९
बीत जाएँ लेकिन मिट्टी में नहीं मिलता। उसी प्रकार प्रपंच अज्ञान के ही कारण बलवान हुआ है। इसलिये ज्ञान
और अज्ञान इन दोनों का अभिमान छोड़ कर, जिस प्रकार काँटे से काँटा निकाला जाता है उसी प्रकार दोनों को
दूर फेंक देना चाहिये क्योंकि यदि इन्हें बीच रास्ते पर फेंक दिया जाय तो ये कभी हमें ही बाधक हो सकते हैं।
अहंकार के रूप में जितना भी कुछ है वह उतना ही बाधक है। इसलिये अहंकार अच्छा हो या बुरा हो ज्ञानीजन
दोनों ही प्रकार के अभिमान को पूर्णरूप से छोड़ देते हैं। हे उद्धव ! तुम्हें मेरे पद की प्राप्ति मेरी भक्ति करने से ही
हुई है। अब अनेक प्रकार के साधनों की झंझट तथा शास्त्रों की चर्चा क्यों करते हो? सद्‌भक्ति से मेरा भजन
करने से तुम ब्रह्मस्वरूप हो गये हो। इसलिये अब शास्त्र श्रवण के साथ सद्धिद्याधिक साधनों का परित्याग कर
दो। 'तस्मादुद्धव उत्सृज्य' इस श्लोक के त्याग का बीज यही है यह अपने अंतःकरण की गुप्त बात मैंने तुम्हें
स्पष्ट करके बतलायी। शिष्य के लिये गुरु का भजन यही सब साधनों में श्रेष्ठ साधन है। सचमुच उससे ही
ब्रह्मसमाधान प्राप्त होता है। जो गुरुचरण का भक्तिभाव से भजन करता है वह सच्चिदानंद मन्दिर में वास करता
है। मेरा यह भाषण पूरी तरह सच है। उसके सम्बन्ध में कोई विकल्प मन में नहीं रखना चाहिये। यह कह कर
श्रीकृष्ण ने अपनी चारों बाहें पसारीं और उन हाथों से उद्धव को बड़े आनन्द से अपने पेट से लगा लिया।
भगवान ने सद्‌भक्त को आलिंगन देने के कारण हृदय से हृदय मिल गया। तब अर्थात् ही कहना और सुनना ये
दोनों क्रियाएँ बन्द हो गयीं और शब्दों ने ही शब्दों को खा लिया। चारों वाणियाँ बन्द हो गयीं, जीव अपना
जीवत्व भी भूल गया और सद्‌भक्तों को केवल आनन्दघन के रूप में जो एकनाथरूपी जनार्दन है वह भी सन्तुष्ट
हो गया। उसी सद्‌भक्ति का भावार्थ बारहवें अध्याय में स्पष्ट किया। उसका सारांश यही कि भक्तों को उनकी
भक्ति से श्रीकृष्णनाथ सदा प्राप्त होते हैं। आत्मप्राप्ति होने का कारण केवल मुख्य भावार्थ ही है। भावार्थ के सिवा
अन्य साधन व्यर्थ की परिक्रमा है।, जप, तप, यज्ञ अथवा दान भावार्थ के ही लिये किये जाते हैं। वह भावार्थ
जिसने साध लिया उसका जन्म धन्य है। नरदेह की प्राप्ति धन्य है। साधुओं का संग धन्य है और जो भावार्थी
भगवद्भक्ति में रंग गये वे अत्यन्त धन्य हैं। जो भगवन्मार्ग में रंग जाते हैं उनका चित्त विषयसुख को भूल जाता
है। वह हंसगीत की कथा उद्धव श्रीकृष्ण से पूछेंगे। वह निरूपण अत्यन्त रसीला है तथा शुद्ध ब्रह्मज्ञान है।
इसलिये श्रोतागण उधर ध्यान दें ऐसी विनती एकनाथरूपी जनार्दन कर रहे हैं।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकारटीकायां द्वादशोध्यायः ॥ १२ ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।