सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 368

३५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वासनारूपी करोड़ों पतली जड़ें जमीन में प्रवेश कर जम जाती हैं। वे संकल्प विकल्पों के रूप में चारों ओर फैल
कर उनके नीचे जाल फैला रहता है। संचित क्रियमाणों की अनेक क्यारियाँ जल से पहले से ही भरी रहती हैं,
इसके बाद भी अन्य प्रवाह आकर उन क्यारियों को बार-बार भरते रहते हैं जिससे यह संसारवृक्ष अत्यन्त मजबूत
होकर नित नयी बाढ़ ढूँढ़ता रहता है। सगुण गुण की बाढ़ पर त्रिगुणात्मक अहंकार का त्रिदल फूट कर बाहर
निकलता है। त्रिगुणों के गुणों का क्या कहना। वे एक-दूसरे में गुँथे रहते हैं। वे एक-दूसरे के शरीर पर गिरकर
मिल जाते हैं और एक साथ मिलकर बढ़ते हैं। पंचभूतों की विशाल शाखाएँ तो प्रपंच के बाहर चली जाती हैं
और एक-दूसरे पर फैल जाती हैं तथा एक-दूसरे में मिलकर बढ़ने लगती हैं। इस वृक्ष की शाखाएँ मूल से ही
बढ़ी रहती हैं। उन शाखाओं के गाँव में दसों दिशाओं के रास्ते निकले हुए हैं। वे उस शाखा के हिलने से हौले-
हौले डोलते रहते हैं। उन प्रत्येक शाखाओं में सुखपूर्वक रहने के लिये देवतागण भी आते हैं। वे कर्म का आधार
लेकर अपनी-अपनी शाखा पर बैठते हैं। दस प्रकार की वायु का तूफान उठता है जिससे मालूम होता है कि वह
वृक्ष हिलडुल रहा है। उसमें दो पक्षियों का अत्यन्त गूढ़ एक घोंसला है। इसी घोंसले से आत्मज्ञान उत्पन्न होता
है। वही हृदय मन्दिर है। उसमें जीव और परमात्मा ये दोनों पूर्णतयः अतर्क्य स्थिति में निवास करते हैं।
देहाभिमानी जीव और निरभिमानी परमात्मा ने मिलकर इस हृदय मन्दिर के घोंसले का निर्माण किया है। जीव
संकल्प-विकल्प प्राप्त कराता है और परमात्मा निर्विकल्प स्थिति प्रदान करने वाला है। इन दोनों का वास हृदय
में ही होता है इसलिये वास्तव में यह उनका ही घर है। वात, पित्त तथा कफ ये संसाररूपी वृक्ष की भीतरी छाल
है। हे भक्तोत्तम उद्धव! इसी कारण से उन्हें वल्कल कहलाने का महत्त्व प्राप्त हो गया है। यह वृक्ष आकाश से
भी ऊँचा है और शून्य से भी नीचे काफी दूर तक फैला हुआ है। उसी प्रकार वह चारों ओर सभी दिशाओं की
सीमाएँ तोड़ कर फैला हुआ है। इस प्रकार विस्तार में फैला हुआ वह वृक्ष अपने मद की मस्ती में उखड़ कर
नीचे आ गया है और वह पंचरसात्मक विषयों की अत्यन्त मधुर धाराओं की वर्षा करने लगता है। श्रुति और
स्मृति यही उस वृक्ष के पत्ते हैं और उनमें स्वर्गरूपी पुष्प खिले हुए हैं जिसके लिये याज्ञिकरूपी भ्रमर अत्यन्त
वेग से मँडराते रहते हैं। सुख और दुःख ये उस वृक्ष के जुड़वाँ फल हैं जो सदा एक साथ मिले रहते हैं। उसके
सीरे से नीचे तक उसे सदा वही फल आते हैं। जितनी दूर तक सूर्यमण्डल दिखायी देते हैं उतनी ही दूरी तक इस
वृक्ष का विस्तार है और उन सबको कर्मप्राप्ति सुख-दुःख के फल देती रहती है। सूर्यमण्डल तक इस वृक्ष का
विस्तार है इसका अर्थ यह नहीं कि चन्द्रमण्डल आदि में संसार का भय नहीं है। हे उद्धव! मैं सूर्यमण्डल के
मध्य में हूँ। लेकिन मेरे सिवा जहाँ तक स्फूर्ति का स्फुरण होता है वहाँ तक संसार का भय अवश्य है इसे ध्यान
में रखो। सूर्य का जो मण्डल हे वह भी संसार में ही इसलिये जो उस वृक्ष का फल नहीं खाता वही रविमण्डल
को भेद कर चला जाता है। इस वृक्ष के यहाँ दो ही फल हैं और उन दो फलों के भोक्ता भी दो ही हैं। वे दोनों
इस संसार में रहते हैं। उनके बारे में बताता हूँ, सुनो!
अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा ग्रामेचरा एकमरण्यवासाः।
हंसा य एकं बहुरूपमिज्यैर्मायामयं वेद स वेद वेदम्॥ २३॥
दुःखरूपी फल के जो भोक्ता होते हैं वे मन से अत्यन्त विषयासक्त होते हैं। गिद्ध की तरह वे विधि बाह्य
रीति से विषयों का सेवन करते हैं। वे ग्राम्य विषयों में अत्यन्त तत्पर होते हैं इसलिये उन्हें 'ग्रामचर' कहा जाता
है। गाँव के गिद्ध अर्थात् चील की तरह ये विषयों को लपकने में तत्पर रहते हैं। जिस प्रकार चील आकाश में