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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 869 में से

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पृष्ठ 365

बारहवाँ अध्याय ३४९
यथानलः खेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः।
अणुः प्रजातो हविषा समिध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी॥ १८॥
आकाश में ऊष्मा अदृश्य रूप में विद्यमान रहती है क्योंकि अग्नि सर्वत्र व्याप्त रहता है। वही मथनी से मंथन
करने पर अत्यन्त सूक्ष्म रूप में प्रकट होता है। वायु अग्नि का घनिष्ट मित्र है। इसीलिये अग्नि पर महीन रुई रखकर
फूँकने से वह चमकने लगता है और उसकी नाजुक और कोमल ज्वालाएँ चारों ओर फैलने लगती हैं। इस प्रकार
अग्नि मध्यम स्थिति में पहुँचने पर उसमें हवनसामग्री से होम करने पर उसकी ज्वाला भड़क उठती है और आकाश
तक पहुँचती है। उसी प्रकार सूक्ष्म नाद शिव के संसर्ग से, प्राण की संगति से तथा षट्चक्रादि संस्कारों के योग से
वाणी के रूप में प्रकट होता है। 'मरा' यह शब्द सुनने पर वह वाणी अमंगल मालूम होती है लेकिन उन्हीं अक्षरों
को उलटा करने पर 'राम' के नाम से पवित्र हुई वाचा संतोष प्रदान करती है। अच्छा या बुरा उच्चार करने से वर्ण
नष्ट नहीं हो जाते। वे कायम ही रहते हैं। इसीलिये वर्णों को 'अक्षर' (अविनाशी) कहते हैं। इस प्रकार वह वाणी
पवित्र होती रहती है। जिस प्रकार वाणी वर्णोच्चारों से स्पष्ट रूप से प्रकट होती है, उसी प्रकार अन्य इन्द्रियों की भी
प्रवृत्ति है। उन इन्द्रियों की स्थिति भी श्रीकृष्ण उद्धव से संक्षेप में बता रहे हैं।
एवं गदिः कर्म गतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च।
संकल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजःसत्त्वतमोविकारः॥ १९॥
जिस प्रकार वाणी प्रकट होने का यह ढंग है, उसी प्रकार कर्म इन्द्रियों की प्रवृत्ति प्रकट होने का प्रकार है।
चरणों की गति तथा हाथों की ग्रहणशक्ति (किसी वस्तु को पकड़ने का सामर्थ्य) स्पष्ट प्रतीत होती है। विसर्ग
गुण है वायु का और आत्यंतिक सुखोपभोग लिंग के गुण के रूप में प्रकट होता है। कर्मेन्द्रियों में पाँचवीं जो
वाणी है उसका विस्तारपूर्वक वर्णन पीछे आ चुका है। उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रिय होते हैं। दृष्टि देखने में व्यक्त होती
है, उसी प्रकार जिह्वा रसों का चखना जानती है और कान को अपने विशिष्ट गुण के कारण सुनने का अधिकार
प्राप्त हुआ है। शीत, उष्ण, मुलायम, कठोर यह ज्ञान त्वचा नामक इन्द्रिय द्वारा व्यक्त होता है। सुगन्ध अथवा
दुर्गन्ध का ज्ञान होने के मामले में नाक ही चतुर इन्द्रिय है। मन का संकल्प अथवा विकल्प, उसी प्रकार निश्चय
यह बुद्धि का कर्म है। चिन्तन चित्त का कर्म है और 'मैं' अहंकार का कर्म है। रजतम सत्त्वों के विकार तो मूल
काया के विकार हैं। उन तीनों का विवरण मैं बिलकुल संक्षेप में सुनाऊँगा। आधिदैव, आधिभौत तथा जिसे
अध्यात्म कहते हैं, उसके कारण जो बड़ा प्रपंच दिखायी देता है वह ईश्वर का दृश्य स्वरूप है। ईश्वर स्वयं ही
संसार का प्रमुख कारण है। इस कारण से भिन्न कोई कारण नहीं होता। घी यदि जम कर उसकी पुतली बन जाय
तो वह घृत से भिन्न कभी नहीं दिखायी देती। अथवा यदि लकड़ी का घोड़ा बनाया जाय, उसकी रचना, उसकी
खड़े रहने की शान आदि बातों के कारण वह कितना ही सुन्दर क्यों न लगे लेकिन उसने लकड़ी का गुण नहीं
छोड़ा होता। उसके अवयव, टांगे, कन्धे आदि सब काष्ठ के ही होते हैं। उसी प्रकार तीन गुणों से उत्पन्न
पंचमहाभूत शिव का ही मूर्तिमंत स्वरूप हैं। सुवर्ण का अलंकार अंततः सुवर्ण के ही रूप में शोभा पाता है, उसी
प्रकार महाभूत तथा विषयेन्द्रिय भी अभिन्न रूप से शिवस्वरूप ही हैं। सुवर्ण का नाग तैयार करने पर उसका फन,
पूँछ और मुड़ी हुई गर्दन के कारण उसे 'नाग' कहते हैं लेकिन वह सचमुच का नाग नहीं होता, वह अच्छे किस्म
का सुवर्ण ही होता है। उसी प्रकार यह संसार भी मद्रूप ही है। प्रपंच ईश्वर से अलग नहीं है। इसी अर्थ से
श्रीकृष्ण उद्धव से जीव-शिव की अभिन्नता का वर्णन कर रहे हैं।