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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय
हे देवाधिदेव ! तुम्हारी जय हो। तुम स्वसामर्थ्य से ब्रह्मभाव का भोग करते हो। जब तुम कृपा से अवलोकन
करते हो, तब विश्व में विश्वात्मा की व्याप्ति का अनुभव होता है। इस विश्व में जो विश्ववासी है, उस पर
विश्वास रखने के लिए तुम कहते हो और वैसा से तुम प्रसन्न होते हो और प्रसन्न होने पर अपने निजपद में स्थान
देते हो। उन चरणों की कृपा से 'अहं' 'सोहं' के बन्धन टूट जाते हैं और मैं तुम्हारे उदर में प्रवेश कर जाता हूँ।
तुम मेरी माता हो इस दृष्टि से जब तुम्हारी ओर देखता हूँ तो पाता हूँ कि पिता भी तुम ही हो। इससे अधिक
आश्चर्य की बात और क्या बताऊँ? इस लोक में तो माता और पिता अलग-अलग रहते हैं लेकिन वे दोनों
जनार्दन में ऐक्यरूप में विद्यमान हैं और मैं उनका नन्हा-सा बालक बन गया हूँ। इसलिए इन दोनों का स्नेह
एकत्र कर इस बालक को पालते हो और प्रतिदिन आत्मबोध का नया वैभव दिखला रहे हो। शिव, शक्ति, गणेश
तथा उसी प्रकार विश्व, विष्णु, सूर्य आदि अनेक अलंकार अपनी ही प्रसन्नता के लिए मुझे पहनाते हो। इस प्रकार
तुम मुझे, अपने शिशु को आभूषण पहनाते हो और कृपादृष्टि से वह वैभव तुम ही देखते हो। बालक के शरीर
पर अलंकार पहनाने से, उसकी शोभा और सुख बालक को कैसे मालूम होगा ? वह वैभव तो माँ ही भोगती है।
इस प्रकार मुझसे ग्रन्थ कहलवा कर उसका सुख जनार्दन ही लें। अपने चिद्रत्नों की माला मेरे गले में तुम ही
पहनाते हो और सुरक्षा के लिए एकात्म होकर मेरे पीछे दौड़ते हो। जिसका पिता सम्पन्न होता है, उसे सभी लोग
सम्मान देते हैं। उसी प्रकार जनार्दन ने इस एका को अपना कहा, इसलिए अमान्य होते हुए भी वह अधिक
मान्यता के लिए पात्र हुआ है। बालक स्वयं बोल नहीं सकता इसलिए उसकी माँ उसे बोलना सिखलाती है।
उसी प्रकार इस ग्रन्थ की कथा गुरु जनार्दन मुझसे कहलवा रहे हैं। उन्होंने यहाँ कितना बड़ा चमत्कार कर
दिखाया कि श्रीभागवत के एकादश स्कन्ध का अर्थ और वह भी मराठी भाषा में मुझ जैसे मूर्ख से कहलवाया।
खैर ! पहला अध्याय श्रवण कर राजा परीक्षित मौन बैठे रह गये। आगे की कथा सुनने की उन्हें इच्छा नहीं दिखाई
दी। क्योंकि, यदि मैंने अब प्रश्न किया तो शुक्राचार्य कृष्ण निधन की कथा सुनाएंगे। इसलिए वह राजा शान्त बैठ
गया। उसके मन का यह अभिप्राय जानकर शुक्राचार्य बोले, "हे परीक्षित ! इस अध्याय को मोक्ष का प्रस्ताव
समझ लो। यह पूरा अठारहवाँ स्कन्ध ही बड़ा अलौकिक है। इसमें एक से एक बढ़कर श्लोक हैं तथा
आत्मसाधन करने वाले के लिए पग-पग पर मुक्तिसुख प्राप्त होता है।" इतना सुनते ही राजा सावधान हो गया।
क्योंकि उसे मुक्तिसुख की अत्यधिक चाह थी। उसने सर्वांगों को कर्ण बनाया। यह देखकर शुक्राचार्य के चित्त
को अतीव आनन्द हुआ और उन्होंने कहा, "तुम तो अवधान की मूर्ति ही बन गये हो, तो अब अंतःकरण को
शान्तकर गुह्यज्ञान सुनो।" दूसरे अध्याय में नारद और वसुदेव के बीच के संवाद का निरूपण है। इसमें मुख्य
रूप से भागवतधर्म का लक्षण प्रश्नोत्तर के रूप में बताया गया है।
श्रीशुक उवाच
गोविन्दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह।
अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालसः ॥ १ ॥
जो मुक्त लोगों में अग्रणी है, ब्रह्मचारियों में शिरोमणि है, जिसे योगीजन भी वन्दनीय मानते हैं, जो

द्वितीय अध्याय २१
भक्तमण्डल में अत्यन्त श्रेष्ठ है, जो ब्रह्मरस का सागर तथा आत्मबोध का पूर्णचन्द्र है, वह शुक योगीन्द्र बोलने
लगा और कुरुवंश का राजाधिराज सुनने लगा। शुक्राचार्य ने कहा, जो व्यासजी के साक्षात गुरु तथा मेरे परमगुरु
महामुनीश्वर नारद हैं उनका श्रीकृष्ण भजन से अत्यन्त प्रेम था। श्रीकृष्ण ने स्वयं ही सारे मुनिजनों को द्वारका से
पिंडारक भेजा था, लेकिन नारदजी वहाँ से बार-बार द्वारका आते थे क्योंकि द्वारका में कालपुरुष का प्रवेश नहीं
होता था। इसलिये वहाँ श्रीकृष्ण अपने स्वसामर्थ्य से विचरण कर रहे थे। नारदजी को दक्ष का शाप था कि वे
क्षणभर के लिए भी एक स्थान पर नहीं रह सकेंगे, लेकिन यह शाप हरिकीर्तन में लागू नहीं होता था इसलिए वे
निरन्तर कीर्तन में ही लीन रहते थे। कीर्तन गाने में जिसकी ख्याति थी वे लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण स्वयं द्वारका में
निवास करते थे इसलिए वहाँ भी इस शाप की बाधा नहीं उपस्थित होती थी इसीलिए नारदजी निरन्तर वहीं
निवास करते थे। नारद को पूर्ण ब्रह्मज्ञान था तो फिर उसे सगुण श्रीकृष्ण मूर्ति क्यों अच्छी लगती थी ? क्योंकि
यद्यपि श्रीकृष्ण देहधारी थे फिर भी उनका देह केवल चैतन्यमय था इसलिए श्रीकृष्ण का भजन नारदजी को
अत्यन्त प्रिय था। इस प्रकार जब श्रीकृष्ण का भजन मुक्तों को भी भला लगता है तो ऐसा भाग्यहीन कौन है जो
उसे नहीं भजता ? शुक्राचार्यजी इसी का निरूपण करते हैं।
को नु राजन्निन्द्रियवान्मुकुन्दचरणाम्बुजम्।
न भजेत्सर्वतोमृत्युरूपास्यममरोत्तमैः ॥ २ ॥
हे राजश्रेष्ठ ! यह उत्तम नरदेह पाकर भी जो श्रीकृष्ण को नहीं भजता, उसे माया रूपी घोर दुःख ग्रस लेता
है, यह जान लो। जिस भगवान के लिए उसके पैरों से निकले उदक को मस्तक पर धारण कर सदाशिव
महाश्मशान में आत्मध्यान में बैठा हुआ है, जिनसे साक्षात ब्रह्माजी पैदा हुए हैं वहाँ दूसरों की क्या बात की
जाय ? नरदेह पाकर भी जो नारायण को नहीं भजता उसे पूर्ण रूप से मृत्यु से ग्रसित समझना चाहिए। परमात्मा
श्रीकृष्ण को छोड़कर जो लोग अन्य प्रकार के साधनों के फेर में पड़ते हैं उनको संसार बन्धन से कभी मुक्ति नहीं
मिल सकती। श्रीकृष्ण चरणों को छोड़कर कुछ लोग इन्द्रादि देवों का भजन करते हैं, लेकिन जब वे देवता ही
मृत्युग्रस्त हैं तो वे भजने वालों की मृत्यु को कैसे टाल सकते हैं ? सभी इन्द्रिय सुरक्षित होते हुए भी जो श्रीकृष्ण
चरणों का भजन नहीं करता, वह कहीं भी जाए लेकिन मृत्यु उसका साथ नहीं छोड़ती। वह हर क्षण उसका
विनाश करती है। महामुनि नारद, मुक्त होते हुए भी निरन्तर उनके भजन में तल्लीन रहते हैं। वह हमेशा द्वारका में
ही रहते थे। उनकी श्रीकृष्ण पर अत्यन्त प्रीति थी।
तमेकदा तु देवर्षिं वसुदेवो गृहागतम्।
अर्चितं सुखमासीनमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
अहा ! नारदजी धन्य हैं। उन्हें सर्वत्र श्रीकृष्ण ही दिखाई देते थे। उन्हें सदा हरिनाम का ही व्यसन था और
वे परमानन्द में ही निमग्न रहा करते थे। जो श्रीकृष्ण का चहेता था और जिसे श्रीकृष्ण सभी दृष्टियों से चाहते थे,
जिसके संग से जड़ जीवों को भी मुक्ति प्राप्त होती है, उसे देखते ही वसुदेव को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उन्हें
साष्टांग दण्डवत कर उन्हें बैठने के लिए उच्चासन दिया। साक्षात परब्रह्म ही घर में आये हैं, इस प्रकार श्रद्धाबुद्धि
से उनकी पूजा प्रारम्भ की। नारद साक्षात नारायण ही हैं इस दृढ़ विश्वास से उन्होंने उनकी पूजा की। सुवर्णपात्र
में उनके पैर धोकर मधुपर्क विधि से उनकी पूजा की। इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूजा कर—वसुदेव अपने आसन पर
बैठ गये और प्रसन्न अंतःकरण से बोलने लगे।

२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वसुदेव उवाच
भगवन्भवतो यात्रा स्वस्तये सर्वदेहिनाम्।
कृपणानां यथा पित्रोरुत्तमश्लोकवर्त्मनाम् ॥ ४॥
आज आपने स्वयमेव आने की कृपा की इससे मैं अत्यन्त भाग्यवान हो गया हूँ। आप की निकटता से हम
कृतकृत्य हो गये हैं। माँ जब नहीं दिखायी देती तो बच्चा लोगों के बीच असहाय हो उठता है, लेकिन माँ के आते
ही उसके मन में आनन्द समा नहीं पाता। उसकी भी अपेक्षा आपका आगमन अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि उससे
प्राणिमात्र को नित्य ही सुख प्राप्त होता है। दीनों का उद्धार करने के लिए आप सहज ही पृथ्वी पर संचार करते
हैं। माँ को आये देख बालक को नित्य नया वैभव प्राप्त होता है लेकिन आपका आगमन समस्त दीनजनों को
सहज ही आत्मसुख का वैभव प्राप्त कराता है। माँ जो सुख प्रदान करती है वह नश्वर रहता है और आपके
आगमन से जो सुख प्राप्त होता है वह शाश्वत होता है। परा से परे चिन्मात्र चित्सुख भोगने का अवसर प्राप्त
होता है। आप भागवत धर्म पर चलने वाले हैं। हम लोग जब प्रयाग संगम पर निष्काम बुद्धि से कोटियज्ञ करते
हैं, तभी हमारी आप से भेंट होती है। नारदजी ! आप भगवत्स्वरूप हैं। आपकी भेंट मात्र से मनुष्य—निष्पाप हो
जाता है। तुम्हारी थोड़ी भी कृपा हो जाए तो तुम्हारा चित्स्वरूप अंतःकरण में अंकित हो जाता है। तुम्हारे ही
कारण भक्ति को अलौकिक महिमा प्राप्त होती है। तुम्हारे ही कारण भक्ति के सामर्थ्य का प्रसार हुआ। तुम्हारे ही
कारण भक्ति भगवत्स्वरूप बनी। तुम अपनी आत्मनिष्ठा के कारण चित्स्वरूप बन गये हो। आप ही भक्ति की
प्रकाशक मशाल हैं, भक्ति मार्ग के पथप्रदर्शक हैं। नारदजी ! आपके अनेक उपकार हैं। आपने भक्ति की हाट ही
सजा दी है। तुमने ही श्रेष्ठ और परिपूर्ण भागवत शास्त्र का व्यासजी को उपदेश कर दीन जनों का उद्धार करने के
लिए दस लक्षण प्रकट किये। नारदजी ! आप ईश्वर समान हैं। लेकिन यह उपमा भी कम है। इस अभिप्राय से
वसुदेव बोले।
भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च।
सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥
देवताओं से प्राणियों को सुख और दुःख प्राप्त होते हैं और उनका भोग भोगना पड़ता है। अधिक या कम
वृष्टि होने से प्राणियों में घबराहट उत्पन्न होती है। इसलिए मुझे सचमुच ही ऐसा लगता है कि उन देवताओं की
अपेक्षा साधु ही श्रेष्ठ हैं क्योंकि देवताओं की करनी से दुःख मिश्रित सुख उत्पन्न होता है लेकिन साधु निर्दोष
सुख के दाता हैं। अर्थात् दुःखक्लेशरहित सुख प्रदान करते हैं। तिस पर तुम्हारे जैसा कृपालु आत्मसखा मिलने पर
क्या पूछना। परमार्थ सुख की मानों बहार ही आ जाती है। यह महिमा इन लोगों की समझ में नहीं आती और
विशेष बात यह है कि एक बार यह सुख प्राप्त होने पर वह कल्पांत में भी समाप्त नहीं होता। नारदजी ! यह
अच्युतात्मस्थिति निश्चित रूप से आपके ही पास है। तुम्हारी महिमा की बराबरी भगवान से भी नहीं हो सकती।
वह कैसे ? तो नारदजी ! उसे मैं यथार्थ ढंग से बताता हूँ। देवता का अवतार होने पर उसके दास को सुख प्राप्त
होता है और दैत्य भयाक्रांत हो उठते हैं लेकिन यह भेदभाव आपमें नहीं है। आप देवताओं के भी अपने हैं और
दैत्यों को भी आप पर विश्वास है। रावण तुम्हें एकान्त में अपने मन की गुह्य बातें सुना रहा था। रावण ने
देवताओं को कारागृह में डाल रखा था लेकिन वही तुम्हारे चरणों का वन्दन कर रहा था। अन्त में तुम सचमुच
ही राम के भी मित्र थे। सारांश यह कि तुम्हारे में विषमभाव नहीं है। जरासंध कृष्ण का बैरी था, लेकिन उसके

द्वितीय अध्याय २३
घर भी आपका आना-जाना था और कृष्ण की सभा में तो उसके सम्बन्धी आप ही थे। देवताओं का नाम कोई न
ले इसका बीड़ा हिरण्यकश्यपु ने उठाया था, लेकिन उसे आपका कीर्तन बहुत अच्छा लगता था। इससे ज्ञात होता
है कि आपमें भेदभाव नहीं है। देवताओं के मन में लालच है लेकिन आप साधुओं में वह नहीं है। वह कैसे इसे
भी यथार्थ ढंग से बताता हूँ।
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान्।
छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः॥६॥
वे जैसे यज्ञों से देवताओं को संतुष्ट करते हैं, वैसे ही फल देवता उन्हें देते हैं और जो उन्हें नहीं भजते उन
पर विपदाएँ लाते हैं ऐसी देवताओं की चाल है। पुरुष जिस प्रकार घूमता है उसी प्रकार उसकी छाया भी घूमती
है। उसी प्रकार देवताओं का भजन करने से वे बहुत प्रसन्न होते हैं, नहीं तो उलटे उनके मार्ग में विघ्न लाते हैं।
प्रातःकाल सूर्य जिस प्रकार ऊपर चढ़ता जाता है वैसे-वैसे छाया भी निकट आने लगती है। उसी प्रकार हमारे
कर्म के अनुसार भगवान भी निकट आने लगते हैं, अर्थात् प्रसन्न होते हैं। सूर्यास्त होते ही छाया विलुप्त हो जाती
है, उसी प्रकार भजन न करने से देवता क्षुब्ध हो जाते हैं। उसी प्रकार देवता स्वार्थी हैं यह आप भी जानते हैं।
अन्य देवताओं की बात क्या करें ? लेकिन जो सबसे बड़ा देवता है वह भी पक्का घूसखोर है, वह भी प्राण लिये
बिना भेंट नहीं करता और गर्भवास हमें सहना पड़ता है। उसका प्रेमपूर्वक भजन करने से वह अपना निजांग
देकर भी प्रसन्न होता है लेकिन जो उसे नहीं भजता उसके घर भूल कर भी नहीं जाता। लेकिन संतों की बुद्धि
वैसी नहीं है। आप तो सचमुच ही दीनों पर दया करने वाले हैं। कृपा की निधि हैं। वह कैसे यह बताता हूँ।
आपने व्यासजी को सज्ञान जानकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया लेकिन ध्रुव को अज्ञान बालक जानकर उसकी
उपेक्षा नहीं की। आपने जब प्रह्लाद को उपदेश दिया उस समय वह दैत्य का पुत्र है यह विचार भी आपके मन में
नहीं आया। आपकी कृपा की लहर यही दीन जनों का विश्रामस्थल है। वाल्या धीवर राह में लूटपाट करता था,
न भजन जानता था न पूजन करता था उसे आपने रामनाम का उपदेश देकर महाकवि वाल्मीकि बनाया। उसका
वन्दन देवता भी करते हैं। उसके ग्रन्थ को देखकर सदाशिव भी आनन्द से विभोर हो उठते हैं। ऐसे आप कृपालु
और अनाथ के लिए आश्रयस्थल हैं। तुम बाह्य रूप से कुपित होते हो, लेकिन फिर उसका पाप दूर करते हो और
अंततः, हे दयालु ! एकत्व का दीप जला कर सद्रूप दिखलाते हो। आप सचमुच ही अच्युतात्मा हैं, इसलिए
भगवान भी आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। आप उससे जिसका उद्धार करने के लिए कहते हैं, उसी का वे
उद्धार करते हैं। अन्यथा उसका हाथ भी नहीं पकड़ते। इस प्रकार आप दीनों को परमार्थ की दीक्षा देने वाले गुरु
हैं और ब्रह्मज्ञान से अत्यन्त उदार हैं। इसलिए अब जो बात मैं पूछूँगा उसे ठीक तरह से बताइये।
ब्रह्मांस्तथापि पृच्छामो धर्मान् भागवतांस्तव।
यान्श्रुत्वा श्रद्धया मर्त्यो मुच्यते विश्वतो भयात् ॥ ७ ॥
उसने पुनः आदरपूर्वक कहा, "हे देवर्षि ! आज मेरे सारे कर्म फलीभूत हुए। क्योंकि आत्मसुख देने वाले
आप हमारे घर आये। पहले आपने जिस प्रकार शिष्यों पर कृपा की थी उसी प्रकार मुझ पर भी कृपा कर मुझे
संसार पाश से छुड़वाइये। आप पर मेरा पूर्ण विश्वास है। आपने अपने दर्शन से मुझे सचमुच ही कृतकृत्य कर
दिया। तो अब वैसी ही कृपा से मुझे यथार्थ ढंग से भागवत कथा का निरूपण करें। भागवतधर्म इस प्रकार बताएँ
जिससे समस्त कर्मों का विलय हो जाए और उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से जन्ममरण से मुक्ति प्राप्त हो

२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाए। संसार का भय अत्यन्त विदारक है और उसका मूल कारण माया है। वह माया जिस धर्म से समूल नष्ट हो
जा, ऐसे धर्म के बारे में मुझे कृपापूर्वक बताइए। यदि आप यह कहें कि उसे सुनने का मुझे अधिकार नहीं है तो
उसके सम्बन्ध में मैं बताता हूँ उसे सुनें।''
अहं किल पुराऽनन्तं प्रजार्थी भुवि मुक्तिदम्।
अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया ॥८॥
मुझे पूर्ण अधिकार नहीं है यह मैं स्वयं भी जानता हूँ। लेकिन मैंने भगवद्भजन किया हुआ है, उसे तुम
श्रवण करो। मैंने भी पूर्व में देवाधिदेवों की आराधना की थी लेकिन ममता के कारण वह भजन व्यर्थ गया।
पुत्रलोभ के कारण मैं देवताओं की माया में फँस गया था। देवता ने संतुष्ट होकर मुझसे कहा कि जो माँगोगे वही
तुम्हें दूँगा। उस समय माया ने मुझे धोखे में डाल दिया। इसलिए मैंने माँगा, 'मुझे पुत्र हो।' वही यह मेरा पुत्र
श्रीकृष्ण है। लेकिन वह मुझे ब्रह्मज्ञान नहीं बताता। वह मेरे चरणों पर मस्तक रखता है और कहता है, मैं तुम्हारा
बालक हूँ। इस कारण से हमें श्रीकृष्ण से ज्ञानप्राप्ति नहीं होती। हृषीकेशी श्रीकृष्ण सचमुच परमात्मा है यह मैं
जानता हूँ। मैंने उसे जन्म दिया इसीलिए मुझे श्रद्धा है और इसीलिए तुम भी संतुष्ट हुए हो। तो अब उसी प्रकार
अपनी कृपा से मेरा उद्धार करो। जिस माया के भुलावे में हम फँसे हुए हैं, वह समूल किस प्रकार नष्ट होगी,
इसका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें दीजिये। इससे अधिक कुछ कहने से क्या लाभ है ?
यथा विचित्रव्यसनाद्भवद्विश्वतोभयात्।
मुच्येमह्यञ्जसैवाद्धा तथा नः शाधि सुव्रत ॥ ९ ॥
मायारूपी जल से यह संसार-सागर बिलकुल लबालब भरा हुआ है। उसे पार करना अत्यन्त कठिन हो
गया है। तो हे मुनिवर! उसे पार करने के लिए आप नौका बनें। इस सागर का जल बिलकुल खारा है और
प्रचण्ड जलचरों की भरमार हो गयी है। वे इतने उन्मत्त हो गये हैं कि उन्होंने अपने सामर्थ्य से सारे चराचर
को निगल लिया है। अविवेक रूपी तट पर मोह की दुर्धर लहरें चल रही हैं और धैर्य के तट को उध्वस्त कर
रही हैं। अहंकार का तूफान 'रों रों रों रों' की आवाज करता रहता है जिससे सम्पूर्ण सागर क्षुब्ध हो उठता है
और बड़े कर्कश स्वर में 'मैं और मेरा' यह गर्जना करता रहता है। उसी प्रकार अनेक प्रकार की वासनाओं के
भँवर देखो कैसे घूम रहे हैं। इसलिए देवताओं को भी इस सागर को पार करने का साहस नहीं होता। ईर्ष्या
की खाड़ियों में क्रोध का ज्वार भरता रहता है और ईर्ष्या तिरस्कार के काँटे राह में बिखेर देती है। कामरूप
पर्वतों के असंख्य ऊँचे-नीचे शिखर दिखायी देते हैं और उन पर वासनाओं के बड़े-बड़े वृक्ष विषयांकुर से
बढ़ते रहते हैं। इस समुद्र में संकल्प-विकल्प रूपी मछलियाँ तथा निंदारूपी भयानक मगरमच्छ हैं और
ब्रह्मद्वेष रूपी मगर मत्त होकर समुद्र में विचरण करते रहते हैं। संसारसागर इतना प्रचण्ड है, फिर भी उसको
सोखने वाले तुम अगस्ति हो। इसलिए तुम्हारी सहायता से इस समुद्र को पार करने का हमें पूर्ण विश्वास है।
इसकी लहरों का भय सारे ब्रह्माण्ड को है लकिन तुम्हारी कृपा से वे हमें बाधक नहीं होंगी। तो हे नारददेव !
हे दयानिधान ! आप इस जन्म-मरण रूपी संसार सागर से मेरा उद्धार करें। यह संसार समुद्र केवल पैर से
चलकर उस पार जा सकूँ ऐसा भागवत धर्म का विचारं मुझे बताइये। वसुदेव का यह भाषण सुनकर नारद के
मन को परम संतोष हुआ। उसकी उसी आनन्दमय स्थिति का वर्णन शुक्राचार्य अपने मुँह से राजा परीक्षित को
सुनाते हैं।

द्वितीय अध्याय २५
श्रीशुक उवाच
राजन्नेवं कृतप्रश्नो वसुदेवेन धीमता।
प्रीतस्तमाह देवर्षिर्हरेः संस्मारितो गुणैः ॥ १० ॥
वसुदेव के इस प्रश्न का उत्तर देते समय शुक्राचार्यजी आनन्दमग्न हो गये। चैतन्यरूपी मेघरूपी नारद मुमुक्षु
लोगों पर चित्सुख की वर्षा करने लगे। श्रीशुक्राचार्य ने कहा, “हे राजा यह अपनी रुचि का प्रश्न सुनकर मन से
मन मिल जाने के कारण नारद ने कहा, “हे वसुदेव! तुम्हारी वाणी धन्य है। तुम्हारा यह प्रश्न सुनकर चिदानंद
स्वरूप से नारायण प्रकट हुए हैं।” यह कहते समय नारद आत्मानंद से अभिभूत हो उठा। उसके शरीर पर रोमांच
हो आये, शरीर पसीने-पसीने हो गया, आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे और वे स्वानंद के रंग में डोलने लगे। भक्त
श्रोता मिलने पर जिस वक्ता को पूर्ण आनन्द नहीं प्राप्त होता, उसे कथासारामृत का स्वाद ही मालूम नहीं है, वह
बिल्कुल शुष्क है। वसुदेव का प्रश्न सुनकर नारद को अत्यन्त आनन्द हुआ और फिर उस आनन्दयुक्त वाणी से
गर्जना करते हुए वसुदेव से क्या कहा, सुनो।
नारद उवाच
सम्यगेतद् व्यवसितं भवता सात्वतर्षभ।
यत् पृच्छसे भागवतान्धर्मांस्त्वं विश्वभावनानू ॥ ११ ॥
नारद ने कहा, हे यादवश्रेष्ठ! हे परमार्थनिष्ठ वसुदेव ! तुम्हारी उत्कंठा सचमुच ही धन्य है। भागवतधर्म पर
तुम्हारी बहुत अधिक भक्ति है इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रीकृष्ण जनक ! जिस धर्म के प्रश्नोत्तर से इस सारे विश्व
का उद्धार होगा, उसी धर्म के बारे में तुमने पूछा यह बहुत अच्छा हुआ। तुम्हारे प्रश्नोत्तर से साधकों का उद्धार
होगा इसमें आश्चर्य कैसा ? इसके योग से महापापी भी पावन हो जाएंगे।
श्रुतोऽनुपठितो ध्यात आदृतो वाऽनुमोदितः।
सद्यः पुनाति सद्धर्मो देवविश्वद्रुहोऽपि हि॥ १२ ॥
भागवत धर्म का गुण ही ऐसा है कि उसके श्रवण से ही कितनों का उद्धार होता है, कुछ उसके पठन से
तर जाते हैं। कुछ उसके चिन्तन से, संसार पाश से मुक्त हो जाते हैं। कुछ श्रोता को और वक्ता को देखकर मन में
आनन्द का अनुभव करते हैं, सद्भाव से उनकी प्रशंसा करते हैं वे इस भागवत धर्म से तर जाते हैं। इसमें भी
कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि जो देवताओं का द्रोही है या दुरात्मा है अथवा सारे विश्व का द्रोह करने
वाला दुष्ट चाण्डाल होता है, वह भी इस भागवत धर्म से तर जाता है, ऐसी इसकी महिमा है। यदि भागवत धर्म
हृदय में धारण किया जाय तो वह अकर्मी के कर्मों का विनाश करता है और अधर्मी के अधर्मों को रसातल तक
ले जाकर उन्हें उत्तम से उत्तम पद पर आरूढ़ कराता है। भागवतधर्म जहाँ पहुँचता है वहाँ वह कर्माकर्म का
विलय कर निंदा, द्वेष, क्रोध, अविद्या आदि का नाम भी शेष नहीं रहने देता। अब उस भागवत धर्म के सम्बन्ध
में ही तुमने अत्यन्त आदर से और भक्ति से गूढ़ प्रश्न किया है। इसलिए हे वसुदेव, तुम अत्यन्त पवित्र और
अत्यन्त उदार भाग्य के हो। तुम्हारी पवित्रता का कितना वर्णन किया जाय ? जिसके सुनाम से हम पावन और
जगतवंध्य हुए, वह श्रीकृष्ण तुम्हारा पुत्र है। वह श्रीकृष्ण तुम्हारे घर में नित्य रहता है। इसलिए तुम्हारे जैसा
भाग्यवान तो मुझे इस संसार में कोई और नहीं दिखाई देता। हे वसुदेव! तुम्हारे ही नाम से इस अनन्त को
'वासुदेव' कहते हैं। उस वासुदेव का नामस्मरण करने से प्राणी अति पावन हो जाता है।

२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्वया परमकल्याणपुण्यश्रवणकीर्तनः ।
स्मारितो भगवानद्य देवो नारायणो मम ॥ १३ ॥
जिसके गुणानुवाद से पुण्य की वृद्धि होती है और जिसके नामस्मरण से संसार का बन्धन कटता है उस
नारायण का आज तुमने स्मरण कराया, इसलिए तुम्हारी इस वाणी का कल्याण हो। आज तुम्हारा यह प्रश्न
सुनकर हृदय में मानों नारायण ही पूर्णरूप से प्रकट हो गया है। तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है।
इसलिए हे वसुदेव, तुम्हारा पूर्ण कल्याण हो। नारद का यह भाषण सुनकर शायद किसी के मन में यह विचार
आये कि नारद को पहले नारायण का विस्मरण हुआ था और अब वसुदेव के प्रश्न से उसे स्मरण हुआ है।
लेकिन जो इस प्रकार विकल्प का तर्क करेंगे उसे आत्मघाती समझना चाहिए। उस विषय की उत्पत्ति के सम्बन्ध
में शुकदेव बता रहे हैं उसे सुनिए। अग्निकुण्ड में अग्नि स्वयंभू रहती है, उसमें घी डालने से वह और अधिक
भड़क उठती है। उसी प्रकार प्रेमपूर्ण प्रश्न होने पर मुक्तजन के सुख का और भी अधिक विकास होता है। श्रोता
जब भक्तिभाव में तल्लीन हो जाता है उस समय मुक्त भी अधिक उल्लास से कथा सुनाता है। उस सुख का
आस्वाद वही ले सकता है जो जानकार है। इसलिए मुक्त, मुमुक्षु और विषयीजन भी भागवत धर्म से पूर्ण शान्ति
प्राप्त करते हैं। वही प्रश्न वसुदेव ने किया इसलिए नारद को भी परमानंद हुआ और पूर्वपरम्परागत, प्राचीन
भागवत धर्म को सप्रमाण बताने के लिए नारदमुनि ने पूर्व इतिहास बताना शुरु किया।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
आर्षभाणां च संवादं विदेहस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
उपर्युक्त आशय का ही प्रश्न जनकराजा का था, और उसका उत्तर नौ आर्षभों ने दिया था। नारद ने कहा,
उस भागवत धर्म का सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो। किन्तु तुम पूछोगे कि प्रथम आर्षभ कौन
था, इसलिए उनके वंश के बारे में तुम्हें बताता हूँ। उनका जन्म उत्तम कुल में हुआ था और वे सभी अचेत
ब्रह्मनिष्ठ थे।
प्रियव्रतो नाम सुतो मनोः स्वायम्भुवस्य यः।
तस्याग्नीध्रस्ततो नाभिर्ऋषभस्तत्सुतः स्मृतः ॥ १५ ॥
स्वयंभू मनु का पुत्र था। उसका नाम था 'प्रियव्रत'। उसका पुत्र 'आग्नीध्र' नाम से ख्यातिप्राप्त था।
सूर्यवंशीय उसके पुत्र का नाम 'नाभी' था। उस नाभी को ज्ञान का वैभव 'ऋषभ' नामक पुत्र हुआ। यह वासुदेव
का अंशांशावतार था और उसने संसार में मोक्षधर्म का प्रकाश किया।
तमाहुर्वासुदेवांशं मोक्षधर्मविवक्षया।
अवतीर्णं सुतशतं तस्यासीद्वेदपारगम् ॥ १६ ॥
ऋषभ वासुदेव का अंश था। संसार में मोक्षधर्म पर लोगों की श्रद्धा बढ़े इसीलिए भगवान का यह 'अंशांश'
अवतार हुआ था। पंचमस्कन्ध में उसका चरित्र सविस्तार बताया गया है। उसे वेदशास्त्र सम्पन्न सौ पुत्र थे। उनमें
भी जो सबसे बड़ा पुत्र था वह अत्यन्त पवित्र था। उसका लोकविलक्षण चरित्र बताता हूँ, सुनो।
तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायणः।
विख्यातं वर्षमेतद्यन्नाम्ना भारतमद्भुतम् ॥ १७ ॥

द्वितीय अध्याय २७
इस बड़े पुत्र का नाम था 'भरत' और वह नारायण का परम भक्त था। अभी भी 'भरतखण्ड' को
'भारतवर्ष' इस नाम से जाना जाता है वह भी इसी के नाम से प्रसिद्ध है। वह मन से, वाचा से और कर्म से
नारायण को ही भजता था, राजकर्ता होने पर भी आत्मज्ञानी था। जिस प्रकार राह चलते समय गलत-सही पग
पड़ने पर और पैर में चोट लगने पर भी उसे भूमि का ही आधार रहता है, उसी प्रकार 'भरत' राज्य का प्रशासन
करते समय यथोचित कर्मों का पालन करते हुए भी वह कभी आत्मनिष्ठा से च्युत नहीं हुआ। इसी स्थिति को
'अखण्ड स्थिति' कहते हैं जो कल्पांत में भी नहीं बदलती और जिसमें मनुष्य अत्यन्त सुखी होता है। उसे
पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता। इस प्रकार भरत सदाचरण करते हुए नारायण परायण था। यह बात मैं तुम्हें विस्तार से
बताता हूँ, सुनो। नरों के बड़े समुदाय को 'नार' कहते हैं। उस 'नारा' अथवा प्राणिसमुदाय की आत्मा 'अयन'
अर्थात् अधिष्ठान होने के कारण उसे 'नारायण' कहते हैं। उसके प्रति भरत परायण अर्थात् अनन्य भाव से शरण
हुआ और अपना अहंभाव भूलकर तद्रूप हो कर रहा। ऐसा वह ऋषभ का पुत्र, जिसका नाम 'भरत' था, जिसकी
पवित्र कीर्ति सारे संसार में फैली हुई है। वह भरत इस भूमि में हुआ इसलिए इस देश को 'भारतवर्ष' कहते हैं।
समस्त वैदिक कर्मों का संकल्प प्रारम्भ करते समय उसके नाम का उच्चार करना पड़ता है। लेकिन इस प्रकार
बिल्कुल आत्मस्वरूप होने पर भी उसे विषयसंग योग्य नहीं है, यह जानने के लिए मैं उसका चरित्र सबको सुना
रहा हूँ, उसे कृपया सुनें। केवल नाम से ही वह इतना प्रसिद्ध हुआ, इसीलिए उसे 'भरतखण्ड' इस नाम से
पुकारते हैं। लेकिन इससे भी अधिक उसका प्रताप प्रचण्ड अर्थात् विचित्र है, उसे सुनें।
स भुक्तभोगां त्यक्त्वेमां निर्गतस्तपसा हरिम्।
उदासीनस्तत्पदवीं लेभे वै जन्मभिस्त्रिभिः ॥ १८ ॥
उसने समस्त दिशाओं में विजय प्राप्त कर समुद्रवलयांकित पृथ्वी पर शासन किया। बड़े-बड़े देवता भी
जिन भोगविलासों को नहीं भोग सके थे, ऐसे विविध सुखों का उसने उपभोग किया। उसे स्त्रियाँ तथा पुत्र
अनुकूल थे और पवित्र मंत्री भी अनुकूल थे। उसी प्रकार समस्त राष्ट्र अनुकूल होते हुए भी उसने उन विविध
प्रकार के दिव्य भोगों का त्याग किया। इस प्रकार के सभी भोगों का उपभोग करने के बाद, वह अपना
समुद्रवलयांकित राजपाट छोड़ कर स्वहित को ध्यान में रखते हुए हरिभजन के लिए निकल पड़ा। जो राज-वैभव
का उपभोग करते हैं उन्हें विरक्ति तो कभी होती नहीं है, किन्तु भरत ने बड़े आश्चर्यजनक बात यह की कि वह
सभी भोगों का त्याग कर लक्ष्मीपति की सेवा करने लगा। सच तो यह है कि उसे उसी जन्म में मोक्ष प्राप्त हो
जाता किन्तु उसे दूसरा जन्म लेना पड़ा। उसका भी कारणं बताता हूँ। एक हिरनी जिसका प्रसूतिकाल निकट आ
गया था, नदी में खड़ी पानी पी रही थी। इतने में उसे व्याघ्र की गर्जना सुनाई पड़ी। वह एकाएक भय से उछल
पड़ी। लेकिन उछलते समय उसके पेट का गर्भ पानी में गिर पड़ा। उस समय भरत वहाँ स्नान कर रहा था।
उसने उसे देखा और स्वभावतः मन से कोमल होने के कारण उसने उसे तुरन्त बाहर निकाला। वह हिरनी वापस
नहीं लौटी। माताहीन शिशु दीन दिखायी देने लगा। इसलिए भूतदया से प्रेरित होकर भरत उस शिशु का पालन
करने लगा। धीरे-धीरे उस मृग के प्रति उसकी ममता बहुत बढ़ गयी। इतनी अधिक कि स्नान, संध्या, अनुष्ठान
आदि करते समय भी उसे हिरनी के उस बच्चे का स्मरण होने लगा। जप अथवा ध्यान प्रारम्भ करते ही भरत की
आँखों के सामने उस हिरनी के बच्चे के सिवाए और कुछ भी नहीं दिखायी देता था। बैठने पर, खाना खाते
समय, सोते समय, हर पल उसे उस मृग का ही ध्यान हो आता था। हिरनी का वह बच्चा आँखों से ओझल होते

२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही वह ध्यान छोड़कर खड़बड़ा कर उठ जाता था। इस प्रकार उस मृग से उसकी ममता हो गयी। एक दिन वह
मृग स्वेच्छा से जंगल में चला गया। इसलिए भरत को बड़ा दुःख हुआ और तभी मृत्यु ने उसे आ दबोचा।
इसलिए जहाँ ममता है वहाँ मृत्यु अवश्यमेव रहती है। जो पूरी तरह ममताशून्य रहता है, उसे जन्म अथवा मृत्यु
स्पर्श भी नहीं करती। भरत स्वयं बड़ा तपस्वी था, फिर वहाँ काल ने कैसे प्रवेश किया ? तो ममता का मौका
पाकर मृत्यु ने उसे आ दबोचा। जिस समय उसके शरीर की मृत्यु हुई उस समय भरत को मृग का ही ध्यान हो
रहा था। इसलिए उसे अगला जन्म मृग का ही प्राप्त हुआ। इस प्रकार उसके लिए पुनर्जन्म का कारण हो गया।
कृपा के ही कारण क्यों न हो लेकिन संग करने से वह योगी के लिए योगभंग का कारण बनता है। इसलिए जो
निःसंग होता है, वही अभंग साधक होता है। मृग का स्मरण करते-करते ही उसे मृत्यु आयी इसीलिए उसे मृग
का जन्म प्राप्त हुआ। जो कृष्ण का स्मरण करते हुए मरता है वह मृत्यु के बाद कृष्णस्वरूप ही हो जाता है। अंत
समय प्राणि की जैसी मति होती है उसी प्रकार उसे गति प्राप्त होती है। इसलिए मन में रात-दिन श्रीकृष्ण का ही
स्मरण करना चाहिए। भरत मृग बना लेकिन उस मृग के शरीर में भी उसे श्रीकृष्ण का स्मरण था क्योंकि पूर्वजन्म
में किया हुआ अनुष्ठान कभी व्यर्थ नहीं जाता यह निश्चित है। उसके बाद तीसरे जन्म में वह 'जड़-भरत' इस
नाम से प्रसिद्ध हुआ। वहाँ वह मायापाश से बिल्कुल अलिप्त रहने के कारण नित्यमुक्त हो गया। पिछले अनेक
जन्मों की कमी उसने इस जन्म में पूरी की। उसने अपने को आत्मस्वरूप में लीन कर लिया और परब्रह्म पद
प्राप्त कर लिया। इस प्रकार ऋषभ को सौ पुत्र हुए उनमें जो सबसे बड़ा था उसके बारे में बतलाया, अब शेष के
बारे में सुनो।
तेषां नवद्वीपपतयोऽस्य समन्ततः ।
कर्मतन्त्रप्रणेतार एकाशीतिर्द्विजातयः ॥ १९॥
प्रत्येक खण्ड पर एक इस प्रकार नौ खण्डों पर नौ को अधिपति बना रखा था। इक्यासी पुरुष कर्ममार्ग के
प्रवर्तक थे। शेष जो नौ असामी थे वे सारे भाग्य के भूषण एवं ब्रह्मज्ञान के मानों अधिष्ठान ही थे। उनके लक्षण
बताता हूँ, सुनो।
नवाभवन् महाभागा मुनयो ह्यर्थशंसिनः ।
श्रमणा वातरशना आत्मविद्याविशारदाः ॥ २० ॥
ये नौ भाई मानो ऋषभकुल को बिना तेल-बाती के प्रकाशित करने वाले दीपक ही थे। वे नौ के नौ
सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए सायुज्यस्वरूप के प्रकाशक अर्थात् साधकों को सायुज्यस्वरूप का दर्शन कराने वाले
थे। उन्होंने आत्माभ्यास के परिश्रम से कर्माकर्म को नष्ट कर दिया था। इसलिए वे भ्रमरहित होकर बिना किसी
आश्रम का स्वीकार कर रहे थे। वे शब्दज्ञान और ब्रह्मज्ञान में पारंगत थे तथा शिष्यप्रबोधन में समर्थ तथा परम
अद्भुत और अत्यन्त दक्ष थे। वे ब्रह्म विद्या के सचल पुतले थे तथा उनके अवयव मानों ब्रह्म को निकले हुए
अंकुर थे। वे विद्या के प्रतिबिम्ब एवं स्वतः सिद्ध परब्रह्म का स्वरूप थे। उन मुनीश्वरों ने दसों दिशाओं को एक
डोर में पिरोकर चद्दर बना दी थी और वायु को बँट कर उसकी करधनी बना दी थी। आकाश का ही उन्होंने वस्त्र
बना दिया था। नौ पुरुष चिदाकाश का ही वस्त्र ओढ़े खड़े थे। प्राण और अपान को रस्सी बट कर उसे नाभि के
पास गाँठ बाँध दिया तभी मानो जीव की ग्रन्थि खुल गयी और वही उन नौ पुरुषों का ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत
बन गया। इस प्रकार परब्रह्म के वैभव और आत्मस्वरूप के अनुभव से वे बिल्कुल परिपक्व हो गये थे। अब उन

द्वितीय अध्याय २९

नौ पुरुषों के नाम यथागौरव बताता हूँ। उनका नाम सुनते ही काल कम्पित होकर पीछे से ही भाग जाता है,
जिनके नाम का स्मरण करने से संसार माथा नहीं उठा पाता। हे परीक्षित! जिनका नाम लेने से भक्तजनों को
निश्चित रूप से मुक्ति ही मिलती है, उनके नाम की कीर्ति के सम्बन्ध में तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
कविर्हरिरन्तरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः ।
आविर्होत्रोऽथ द्रुमिलश्चमसः करभाजनः ॥ २१ ॥
कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध पिप्पलायन, आविर्होत्र, सुलक्षणी द्रुमिल निर्दोष चमस तथा करभाजन इस
प्रकार उन नौ के नौ नाम थे। इन नामों का स्मरण करने से सभी पापों का विनाश होता है ऐसी उनकी महिमा है।
उनकी परमहंस स्थिति मैं तुम्हें बताता हूँ। जिनके कारण सारी पृथ्वी पावन हो जाय ऐसी वे पुण्य पूज्य नौ
मूर्तियाँ थीं।
एते वै भगवद्रूपं विश्वं सदसदात्मकम्।
आत्मनोऽव्यतिरेकेण पश्यन्तो व्यचरन्महीम् ॥ २२ ॥
वे नौ यद्यपि शरीर से अलग दिखाई देते थे लेकिन भगवद्रूप से वे एक ही थे। चाहे सृष्ट हो या दुष्ट हो
वे सबको अपनी ही तरह एक ही दृष्टि से देखते थे। क्योंकि उनमें असाधुत्व जैसी कोई चीज शेष नहीं रह गयी
थी, सब कुछ चिन्मय हो जाने के कारण 'संत' कहने लायक भेद उनमें रह ही नहीं गया था। सारा संसार ही
जहाँ भगवान से भरा हुआ है वहाँ हम उनसे अलग कैसे रह सकते हैं। इसलिये वे सब भूतमात्र तथा पंचमहाभूतों
को भगवत्स्वरूप में ही देखते थे। देखना और देखने का पदार्थ भी स्वयं ही बन जाना, होना न होना आवागमन
इन सारे लक्षणों को निगल कर वे संसार में विचरण करते थे।
अव्याहतेष्टगतयः सुरसिद्धसाध्यगन्धर्वयक्षनरकिन्नरनागलोकान्।
मुक्ताश्चरन्ति मुनिचारणभूतनाथविद्याधरद्विजगवां भुवनानि कामम् ॥ २३ ॥
वैकुण्ठ, कैलाश, उसी प्रकार देवता तथा सिद्ध (साध्य, गंधर्व, यक्ष, नर, किन्नर, नाग, मुनि, चारण,
भूतनाथ, विद्याधर, द्विज, गौएँ) आदि के स्थान, सारांश सप्तस्वर्ग तथा सप्त पातालादि अर्थात् श्लोकों में वर्णित
चौदह लोकों में वे अबाध गति से विचरण करते थे। उनके मन में विषयासक्ति न होने के कारण उनकी गति
कहीं बाधित नहीं होती थी। स्वेच्छानुसार कहीं भी जाने का सामर्थ्य उनमें होने के कारण वे निष्काम भाव से
कहीं भी विचरण करते रहते थे।
तं एकदा निमेः सत्रमुपजग्मुर्यदृच्छया।
वितायमानमृषिभिरजनाभेर्महात्मनः ॥ २४ ॥
जहाँ मन का प्रवेश भी निषिद्ध है, वहाँ वे पग से चल कर जाते। इस प्रकार वे इच्छागमनी पुरुष स्वेच्छा से
विचरण करते-करते एक बार कर्मभूमि पर आये ओर पृथ्वी पर के 'अजनाभ' खण्ड पर (भारतवर्ष) पहुँचे। वहाँ
राजा जनक का यज्ञ चल रहा था और असंख्य बड़े-बड़े ऋषि वहाँ एकत्र थे। यज्ञ वैदिक विधि से शास्त्रोक्त ढंग
से चल रहा था। कुण्ड, मण्डप, वेदिका, दिशासाधन, अनुष्ठान की पीठिका अर्थात् यज्ञ की पूर्व तैयारी कर सभी
कर्म पवित्र रीति से चल रहे थे। स्त्रुक, स्त्रुवा आदि यज्ञपात्र, त्रिसंधान अर्थात् तीन जगह जोड़ी हुई दर्भ की डोरी
तथा दर्भ के परिस्तरण फैलाकर अखण्ड घृत की धार कुण्ड में देते हुए ऋषि लोग होम कर रहे थे। होम समाप्त

३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
होकर पूर्णाहूति का समय आ ही रहा था कि तभी ये नौ पुरुष (आर्षभयोगी) तेज से देदीप्यमान होकर वहाँ आते
दिखाई पड़े।
तान् दृष्ट्वा सूर्यसंकाशान्महाभागवतान् नृप।
यजमानोऽग्नयो विप्राः सर्व एवोपतिष्ठिरे ॥ २५ ॥
जिसके अंगूठे के नाखून के तेज के सामने करोड़ों सूर्यों का तेज लुप्त हो जाता है, उस भगवान को
जिन्होंने अपने हृदय में सुरक्षित कर लिया है उनके अलौकिक तेज का क्या वर्णन किया जाय ? उनकी देहकांति
के सामने सूर्य का तेज भी निष्प्रभ हो जाता था। अपने शरीर की कान्ति से प्रभा को ही शोभायमान करने वाले वे
नौ पुरुष मानों साकार चैतन्य का सार ही थे। इन नौ पुरुषों को भगवद्भाव का वैभव, भगवान का गौरव अथवा
नवविधा भक्ति की साकार मूर्त्तियाँ कहना ही उचित होगा। मानों वे नौ पुरुष नवखण्ड पृथ्वी के अलंकार,
नवनिधि का सार अथवा नवरत्नों का निज भण्डार ही साकाररूप लेकर आये थे। अथवा नौ नारायण वहाँ
स्वयमेव प्रकट हो गये थे अथवा नौ नृसिंह ही देदीप्यमान रूप लेकर वहाँ आ गये थे। उन यज्ञकुण्डों में
दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि तथा आहवनीयाग्नि इन तीन अग्नियों का आवाहन हुआ था। वे इन्हें देखकर उठ कर
खड़े हो गये। उन्हें केवल इन नौ भागवतों ने ही देखा अन्य लोग उन अग्निदेवताओं को नहीं देख पाये। ऐसी उन
तेजःपुंज मूर्तियों को देखकर ऋत्विज और आचार्य उठ कर खड़े हो गये। राजा जनक तो दौड़ कर ही उनकी
अगवानी में आये और उन्होंने उनका स्वागत किया। उन्होंने दौड़कर ही उन्हें दण्डवत् किया और मुकुट उतार
कर मस्तक से चरणों का वन्दन कर अत्यन्त सत्कारपूर्वक उन्हें यज्ञमण्डप में ले आये।
विदेहस्तानभिप्रेत्य नारायणपरायणान्।
प्रीतः संपूजयाञ्चक्रे आसनस्थान् यथार्हतः ॥ २६ ॥
अतिथि भागवत परायण थे यह जानकर जनक को अत्यन्त आनन्द हुआ और उसने स्वयं उनकी पूजा
करने की तैयारी शुरू की। उन्होंने परम श्रद्धा से उनके चरण धोये, फिर धूप, दीप, चन्दन, पुष्प आदि साहित्य से
मधुपर्क विधान से उनकी यथायोग्य पूजा की।
तारोचमानान्स्वरुचा ब्रह्मपुत्रोपमान्नव।
पप्रच्छ परमप्रीतः प्रश्रयावनतो नृपः ॥ २७॥
अपने अंगों की निज प्रभा से उनके शरीर की शोभा बढ़ रही थी। उनका शरीर विचित्र तेज से शोभायमान
ब्रह्मविद्या का गाभा थी। मानों उनके शरीर का ब्रह्मज्ञान परिपक्व होकर प्रकाशमान हो गया था और उनके शरीर
का भूषण था। अन्य भूषण उन्हें अनावश्यक थे। मुकुट, कुण्डल, सुवर्ण के कड़े ये आभूषण मूर्खों के शरीर पर
कितने भी क्यों न हों लेकिन उन अलंकारों की शोभा उन पर विलुप्त हो जाती है और उनके अन्दर की मूर्खता ही
बाहर प्रकट होती है। यह ज्ञानधन वैसा नहीं था। पूर्ण ब्रह्मत्व से ही वह सुशोभित होता था। वही उनके शरीर का
भूषण था। अन्य भूषण वे नहीं धारण करते थे। वे ब्रह्मानुभव से पूर्ण होते थे और वही अनुभव उनके इन्द्रियों के
द्वारा भी प्रस्फुटित होता था। पूर्णानुभव से आने वाली शान्ति ही उनका भूषण था। उसके आगे मुकुट और कंगन
तुच्छ होते थे। पहले सनकादिकों का वर्णन किया है। ये उनकी ही योग्यता के थे या अधिक थे, यह पूछें तो
उनमें और इनमें कोई भेद नहीं ऐसा समझना चाहिए। उनकी और इनकी गति एक थी, उनकी और इनकी स्थिति

द्वितीयं अध्याय ३१
एक थी और उनकी और इनकी शान्ति भी एक जैसी ही थी, वास्तव में उनमें भेद कुछ भी नहीं था। उनकी ही
तरह ये भी सगे भाई थे, उनकी ही तरह बोध इनका भी था, चाल-चलन, ढंग, व्यवहार उनके ही जैसा था,
अन्तर कुछ भी नहीं। वे चार और ये नौ लेकिन सबका ब्रह्मज्ञान एक जैसा, उनकी और इनकी शान्ति एक जैसी।
ये बातें जनक ने जान लीं। उनकी यह परिपूर्ण स्थिति देखकर राजा को बड़ा संतोष प्राप्त हुआ और उन्होंने
अत्यन्त विनम्र होकर मृदु-मंजुल वाणी से उनकी विनती की।
विदेह उवाच
मन्ये भगवतः साक्षात् पार्षदान्वो मधुद्विषः।
विष्णोर्भूतानि लोकानां पावनाय चरन्ति हि॥ २८॥
सार्वभौम चक्रवर्ती होते हुएं भी विदेह ऐसा राजा जनक उन ऋषभपुत्रों से अत्यन्त प्रेम से विनती करने
लगा। उनसे भेंट होते ही राजा जनक को असीम आनन्द हुआ और उस सुख संतोष के आवेग में उसने उनसे
प्रेमपूर्वक विनती की। उसने कहा—आप का सामर्थ्य देखा जाय तो आप ईश्वरस्वरूप हैं, देहभाव से देखा जाय
तो भगवान के भक्त हैं, मानों आप श्रीहरी के पार्षद हैं। देवता स्वयं अपना ही भक्त है ऐसा जो ध्वनितार्थ
उपनिषद में है, उसका प्रत्यक्ष अनुभव आप में हो रहा है। "शिव होकर ही शिव की पूजा करनी चाहिए"—
("शिवो भूत्वा शिवं यजेत") यह उपनिषद रहस्य आप में ही शोभा दे रहा है। अन्य लोग केवल मुँह से इन
बातों का उच्चार करें। लेकिन उस बात का कोई अर्थ नहीं दिखाई देता। श्रीविष्णु संसार में जो भी कुछ उत्पन्न
करते हैं, वह सब पवित्र करने के लिए, केवल दीन-दुखियों का उद्धार करने के लिए। इसीलिए आप कृपापूर्वक
पृथ्वी पर संचार करते रहते हैं। आप संसार के कल्याण के लिए ही विचरण करते रहते हैं, किन्तु जब भाग्योदय
होता है तभी आप से भेंट होती है। आज मुझे आपकी सेवा का लाभ मिला इसका अर्थ मैं सचमुच ही बड़ा
भाग्यवांन हूँ। धन्य है मेरा भाग्य और धन्य है मेरा वैभव। आज आपके चरणों का अपूर्व लाभ होने से मैं सचमुच
ही धन्य हो गया हूँ।
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्॥ २९॥
सभी प्रकार के देहों में नरदेह अत्यन्त दुर्लभ है। उसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है। जब पाप और पुण्य
समान रहता है तभी यह कर्मभूमि अर्थात् यह नरदेह प्राप्त होता है। पुण्य और पाप की मात्रा यदि कम अथवा
अधिक हो तो उसे स्वर्ग या नरक प्राप्त होता है। कर्म समान होने पर नरदेह प्राप्त होता है। किन्तु सभी की बुद्धि
एक जैसी नहीं होती, उस समता में भी गाढी विषमता कैसे हो जाती है वह बताता हूँ। पाप का एक बहुत बड़ा
हिस्सा एक पलड़े में रखें और दूसरे पलड़े में पुण्य डालें और दोनों का भार यदि समान भी हो तो भी उस जन्म
में उस व्यक्ति में पापबुद्धि ही होगी। जिस प्रकार बालू और सुवर्ण तौल में यदि समान भी हो तो उस स्वर्ण को
खरीदने के लिए लोग धन खर्च करते हैं और बालू कोई मुफ्त में भी नहीं लेता। उसी प्रकार किसी का पुण्य बहुत
बड़ा होता है और उसकी बराबरी में दूसरे पलड़े में छोटे-छोटे पाप डाले जाते हैं और उनका भार समान हो जाता
है। ऐसा कर्म लेकर जो जन्म लेते हैं उनका प्रेम पुण्य के प्रति अधिक रहता है। पुण्य ओर पाप जब पूरी तरह
नष्ट हो जाते हैं तभी नित्यमुक्ति प्राप्त होती है। मनुष्य देह की प्राप्ति भी महान संकट है। वहाँ कनक-कांता रूपी
विषय का अभिमान उत्पन्न होता है। जिस प्रकार प्यासा अपनी प्यास बुझाने के लिए अमृत देकर मद्यरस पीए

३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करे, उसी प्रकार लोग अमूल्य मानव जीवन में विषयों में लिप्त रहते हैं। जैसे कोई चिन्तामणि देकर गन्धर्व नगर
अर्थात् आकाश में दिखाई देने वाले बादलों की आकृतियों का चयन करे उसी प्रकार वे मिथ्या विषय साधनों के
लिए नरदेह का सत्यानाश कर लेते हैं। जैसे कल्पतरु का बगीचा उजाड़ कर कोई उसे जंगल समझ कर दूर फेंक
दे और उसके स्थान पर भांग के पौधे लगा दे उसी प्रकार प्राणी नरदेह प्राप्त कर उसका विनाश कर लेते हैं।
शिश्नोदर के लिए सारा दिन प्रयास, नहीं तो उपहास, निंदा आदि हर रोज गृहस्थी की कचकच, वासनाओं की
तृप्ति के लिए प्रयास और यदि इतने पर भी समय बच जाय तो चौपड़ की बाजी बिछाना। हर तरह के हँसी-
मजाक, विषय वासनाओं की ही बकवास। ऐसे लोगों को राम का नाम लेते समय मुँह बन्द हो जाता है। जैसे
कामधेनु घर आने पर, उसे खिला नहीं सकते इसलिये उसे घर से निकाल देते हैं उसी प्रकार श्रीरामनाम का जप
न करने के कारण प्राणि नरदेह प्राप्त कर भी व्यर्थ चला जाता है। इस नरदेह का अहंकार किया जाय तो वह तो
क्षणभंगुर है। यहाँ तो भगवान से एकरूप हुए भक्तों का मिलना ही भाग्य की बात है। जिन्हें भगवद्भक्ति से प्रेम
रहता है उन पर भगवान का भी अत्यन्त प्रेम रहता है। ऐसे भगवद्भक्तों से साक्षात मिलन तभी होता है जब
अनेक कोटि पुण्य साथ में खड़े हों। जिसके प्रेम की लालसा के कारण ही भगवान ने अपना निजनिर्गुण रूप
त्याग कर जन्म लिया, जिनके प्रेम के कारण उस पद्मनाभ को दशावतार की शोभा प्राप्त हुई। ऐसे जो कृष्ण कृपा
के कारण उनके अत्यन्त चहेते बन गये, ऐसे लोगों की भेंट तभी होती है जब भाग्य का उदय होता है। शरीर
निष्काम हो, आत्मस्वरूप की ओर दृष्टि हो और कोटि-कोटि पुण्य राशि का साथ हो,तभी हरि के प्रियजनों से
भेंट होती है। एक समय बाघ और सिंह का दूध मिल जाएगा, चन्द्रामृत भी प्राप्त हो सकेगा किन्तु हरिप्रियों से
भेंट नहीं हो सकेगी। उसके लिए अत्यन्त दुर्लभ भाग्य की आवश्यकता होती है। बाघ और सिंह के दूध से मनुष्य
अत्यन्त शक्तिशाली और पुष्ट हो जाएगा लेकिन उस दूध से जन्म-मरण से छुटकारा नहीं प्राप्त होगा। कहते हैं
कि जो चन्द्रामृत का सेवन करता है वह निरोगी होता है लेकिन चन्द्र स्वयं ही मूलरूप से क्षयरोगी है उसका
अमृत दूसरे को कैसे निरोगी करेगा? बाघ और सिंह के दूध से यदि प्राणी अजर-अमर हो जाते तो फिर उसी दूध
से जिनकी उत्पत्ति होती है वे बाघ और सिंह क्यों मरते ? लेकिन जब हरिभक्तों की भेंट होती है, तब सांसारिक
संकटों की बाधा नहीं होती। जन्म-मरण का फेरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है। सारांश यह कि उनसे भेंट होने
के लिए अत्यन्त भाग्य की आवश्यकता होती है। आज वह सारा भाग्य मेरे हिस्से में आया है क्योंकि मुझे आपके
दर्शन हुए। इसलिए 'आत्यंतिक क्षेम' का क्या अर्थ है, यह मुझे समझाइये।
अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः।
संसारेऽस्मिन् क्षणार्धोऽपि सत्सङ्गःशेवधिर्नृणाम्॥ ३०॥
आप निष्पाप और निर्मल हैं आपके दर्शन से कलिमल तत्काल नष्ट हो जाता है। आप स्वाभाविक रूप से
ही पवित्र हैं। गंगा में स्नान करने से वह सबको पवित्र कर देती है लेकिन वह गंगा भी अपना पातक नष्ट होने
के लिए आपके ही चरण स्पर्श की कामना करती है। आपके दर्शन का लाभ ही चित्स्वरूप गंगा है। संसार में
वह अत्यन्त समर्थ है। केवल दर्शन से ही संसार ताप को नष्ट कर डालता है। फिर जन्म-मरण का प्रश्न ही कहाँ
उठता है? आपके इस दर्शन के आगे गंगा की क्या बिसात है? उसके सामने तीर्थों की महिमा की कोई प्रतिष्ठा
नहीं है। तीर्थ भी भवदोष से लिप्त हैं। वह दोष आपकी दृष्टि से नष्ट होता है। ऐसी पवित्रता आप अपनी दृष्टि
से ही बढ़ाते हैं। मैं तो आज अत्यन्त पवित्र हो गया हूँ। क्योंकि आज आप दीन दयाल से मेरी भेंट हुई। ऐसी

द्वितीय अध्याय ३३
पवित्र और कृपामूर्त्ति का साथ मुझे आज भाग्य से ही प्राप्त हुआ है। सत्संगति के माहात्म्य का वर्णन करते समय
श्रुतियाँ भी मौन हो जाती हैं। ब्रह्म स्वयं निर्धर्म है, अपना धर्म वह नहीं जानता, साधुओं के मुख से ही ब्रह्म को
ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। उस सत्संग की महिमा अत्यन्त महान और निरुपम है। सत्संग को यदि निधि की उपमा दी
जाय तो उसके खोने का भय है किन्तु सत्संग की महिमा ऐसी है कि वह साधकों को पूरी तरह सद्रूप करता है।
अच्छी निधि प्राप्त होने पर उससे विषय भोग बढ़ता है। लेकिन महाराज! सत्संग में वह बात नहीं है। वह
विषयरहित तथा अत्यन्त सुख देने वाला है। इन्द्रिय रहित स्वानन्द तथा विषयरहित परमानन्द प्राप्त होने का ही वे
बोध कराते हैं। इसलिए साधुओं की महिमा अगाध है। सत्संग यदि निमिष मात्र के लिए भी हो जाए तो उससे
भवसंग हो जाता है इसलिए सत्संग का भाग्य भाग्यवान साधक ही जानते हैं। संत चरणों में जिनका भाव है, उन
पर उस भाव के कारण ही संत स्वयमेव प्रसन्न होते हैं। संतों के सान्निध्य मात्र से संसार अपने आप व्यर्थ हो जाता
है। अनेक प्रकार के विकार, विषयों की भरमार आदि से संसार की बाधा तीव्र हो उठती है। उस संसार को
समाप्त करने के लिए सत्संग यही एकमात्र रामबाण उपाय है। दीप की संगति से जिस प्रकार कर्पूर का कर्पूरत्व
नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार सत्संगति प्राप्त होने पर क्षणार्ध में ही संसार की अर्थात् जन्ममरण परम्परा की तथा
देहात्म बुद्धि की निवृत्ति हो जाती है। वह आपका सत्संग मुझे आज अनायास ही मिल गया है तो अब यह बताएँ
कि प्राणी 'आत्यंतिक क्षेम' अर्थात् शाश्वत कल्याण कैसे प्राप्त करते हैं। यदि आप कहें कि भागवत धर्म ही
आत्यंतिक क्षेम का मूलमंत्र है तो महाराज! उस धर्म का अनुक्रम सुगम करके बताएँ।
धर्मान् भागवतान् ब्रूत यदि नः श्रुतये क्षमम्।
यैः प्रसन्नः प्रपन्नाय दास्यत्यात्मानमप्यजः ॥ ३१ ॥
यदि भागवत धर्म सुनने का हमें अधिकार हो, तो महाराज! आप हमें सम्पूर्ण भागवतधर्म सुनाइये। इस
भागवत धर्म की ख्याति कुछ विचित्र है। इसे यदि प्रेम से स्वीकार किया जाय तो श्रीपति उससे संतुष्ट होकर
स्वयं सेवकों के अधीन हो जाता है। वेदशास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण की ख्याति 'अजन्मा' है लेकिन भक्तों के
लिए वे अनेक जन्म लेते हैं। ऐसे इस भागवत धर्म की शरण में जो भी कोई अनन्य भाव से जाता है, उस पर
नारायण प्रसन्न होकर अपना सर्वस्व अर्पण करता है। अब यदि मुझे भागवत धर्म श्रवण करने का अधिकार न हो
तो सचमुच ही मैं अनन्य भाव से आपकी शरण आया हूँ और आप सब अत्यन्त कृपालु हैं। भूत दया तो आप में
परिपक्व हो रही है। आप दया के सागर हैं, आपके कारण दीनों का उद्धार होता है। जिस पर आपकी पूर्ण कृपा
रहती है वहाँ जन्ममरण नहीं रहता, सारे अधिकार सहज ही प्राप्त होते हैं। अर्थात् आपकी कृपा जैसा कोई
सामर्थ्य ही नहीं है यह जानकर मैं निश्चयपूर्वक आपकी शरण में आया हूँ। अज्ञान की लज्जा से क्या लाभ है?
यहाँ मेरा सारा कार्य आपकी ही कृपा से होने वाला है। इस प्रकार जनकराजा ने प्रार्थना कर उन ब्राह्मणों की
चरणरज अपने माथे से लगायी। जनक राजा का नम्रतापूर्वक पूछा गया यह प्रश्न सुनकर वे सभी नौ पुरुष संतुष्ट
हुए। वही कथा नारद मुनि अपने मुख से वसुदेव को सुना रहे हैं।
श्रीनारद उवाच
एवं ते निमिना पृष्टा वसुदेव महत्तमाः।
प्रतिपूज्याब्रुवन् प्रीत्या ससदस्यार्त्वित्वजं नृपम् ॥ ३२ ॥
जो जगत की स्थिति और गति का जानकार है, जो हरिहर का लाडला है, जो निज आत्मज्ञान में परिपूर्ण

३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, उस नारद ने वसुदेव से कहा, वसुदेव! इस प्रकार जनक राजा द्वारा मार्मिक प्रश्न पूछे जाने पर उन महानुभावों
को अत्यन्त संतोष हुआ। उन्होंने जनकराजा को धन्य-धन्य कहा। यज्ञ के ऋत्विजों को तथा सभासदों को परमार्थ
श्रवण की उत्सुकता बढ़ने लगी। उन्हें भी योग्य अनुमोदन देकर उन नौ असामियों ने बोलना प्रारम्भ किया।
जनक के नौ प्रश्न इस कथा का प्रमुख विषय है। भागवत धर्म किसे कहते हैं, भगवद्भक्त कैसे होते हैं? 'माया'
किस तरह विराजती है? अज्ञानियों को उससे तरने के क्या उपाय हैं? उसी प्रकार परब्रह्म कैसा होता है? 'कर्म'
किसे कहते हैं? अवतार चरित्र संख्या परम, अभक्तों को 'अधोगति' क्यों प्राप्त होती है? और किस युग में कैसा
धर्म होता है? इन सबका अच्छी तरह निरूपण करें। इस प्रकार नौ मार्मिक प्रश्न राजा जनक ने पूछे। उन नौ
पुरुषों ने उनके क्रम से उत्तर दिये। उनमें से पहले प्रश्न का कवि ने उत्तर दिया।
कविरुवाच
मन्येऽकुतश्चिद्भयमच्युतस्य पादाम्बुजोपासनमत्र नित्यम्।
उद्विग्नबुद्धेरसदात्मभावाद् विश्वात्मना यत्र निवर्तते भीः॥३३॥
राजा ने 'आत्यंतिक क्षेम' अर्थात् अत्यन्त कल्याण किसमें हैं यह प्रश्न किया। कवि तो उस विषय का
परमज्ञाता ही था। उसने आत्यंतिक क्षेम का अर्थ अर्थात् 'भागवत धर्म' का प्रतिपादन करना प्रारम्भ किया।
उसने कहा, राजा! एक चमत्कार ध्यान में रखो। हमारा संकल्प ही हमारा बैरी है। वही शरीर में देहबुद्धि
(साढ़े तीन हाथ का देह मैं ही हूँ, यह भावना) बढ़ाकर संसार का भय दृढ़ करता रहता है। जिसके पास
देहबुद्धि होती है, उसके भाग्य में सुख तो नहीं ही होता। ऐसे लोग सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि द्वंद्वों के बीच
में तथा व्याधियों के महासागर में डूब जाते हैं। क्योंकि देहबुद्धि वालों के पास दुःखों की राशि तो रखी ही
रहती है। रात दिन चारों ओर से महाभय के भूत उसे सताते रहते हैं। 'मैं ही देह हूँ' मानने वाले को चिन्ता
का बहुत अधिक भय लगता है। उस पर ममता द्वारा संकल्प-विकल्पों की मार निरन्तर पड़ती रहती है। देह-
बुद्धिवालों को अणु के बराबर भी सुख नहीं प्राप्त होता। ऐसा होते हुए भी जो सुख मानते हैं वे महामूर्ख हैं।
देहबुद्धि दुःखजनक है। दीपक की संगत करने वाले पतंग के भाग्य में केवल दुःख ही रहता है, फिर भी वह
उसे गले लगाने के लिए आगे बढ़ता है, उसी प्रकार देहबुद्धि विषयों की ओर भागती है। इस प्रकार देहबुद्धि
बहुत खराब है। वह विषयों के प्रति रुचि बढ़ाती है। इससे महाभय उत्पन्न होकर जन्ममरण के फेरे बढ़ जाते
हैं। जो यह जानता है कि देहबुद्धि में इतना संताप और महापाप है वह इन विषयों में जरा भी नहीं उलझता।
विषयों के प्रति कोटि-कोटि जन्म मरण सहने पड़ते हैं यह बात जो जानता है वह उस भय से विषयों का
त्याग करता है और उन्हें इन्द्रियों में बन्द कर देता है। लेकिन विषय इन्द्रियों में बन्द होना नहीं चाहते। विषय
छूटते नहीं है और निरन्तर कष्ट देते रहते हैं। इसीलिए वेदों ने हरिभक्ति प्रकट की है। इसमें इन्द्रियों को बन्द
नहीं करना पड़ता और विषयासक्ति अपने आप रुक जाती है। हे राजाधिराज! इतना अद्भुत सामर्थ्य हरिभक्ति में
है यह स्मरण रखो। योगी लोग इन्द्रियों का दमन करते हैं किन्तु भक्त लोग उन्हीं इन्द्रियों को भगवान की भक्ति
में लगाते हैं। योगी जिन विषयों का त्याग करते हैं, उन्हें ही भक्तगण भगवान को अर्पण करते हैं। योगी विषयों
का त्याग करते हैं लेकिन उस त्याग से शरीर को दुःख होता है और भक्त वही विषय भगवान को अर्पण करते
रहने के कारण नित्यमुक्त हो जाते हैं। कुछ विकल्पी लोग इसे सम्भव नहीं मानते। इसलिए यहाँ 'कायेन वाचा'
यह कृष्णार्पण द्योतक श्लोक बताया गया है। घरबार, बाल-बच्चे और प्राण भी भगवान को अर्पण करने

द्वितीय अध्याय ३५
चाहिए यही सम्पूर्ण भागवतधर्म है और इसी का नाम 'मुख्य भजन' है। अब ग्यारहों इन्द्रियों को किस प्रकार
भगवद्भक्ति की ओर लगाया जाए उसके विषय में संक्षेप में बताता हूँ। 'मन' से हरि का ध्यान करना चाहिए,
'कानों' से उसकी कीर्ति का श्रवण करना चाहिए, 'जिह्वा' से नामस्मरण करना चाहिए और दिन रात उसके
कीर्तन में मग्न रहना चाहिए। 'हाथों' से हरि का पूजन करना चाहिए, पैरों से मन्दिर में जाना चाहिए, नाक से
तुलसी निर्माल्य की गन्ध लेनी चाहिए। जो मस्तक पर नित्य निर्माल्य धारण करता है और पेट में चरणतीर्थ
तथा हरिप्रसाद एकत्र करता है उसे देखकर संसार भय दूर भागता है। बढ़ते हुए सद्भाव तथा बढ़ते प्रेम के
कारण जिसके भाग्य में श्रीकृष्ण का अखण्ड भजन रहता है उसे संसार का बन्धन नहीं रहता। सभी भयों में
संसार भय अत्यन्त कठोर है। वह बेचारा भी हरिभक्ति के सामने किंकर हो जाता है। फिर वह सामने कैसे
खड़ा हो पाएगा ? रामकृष्ण का स्मरण करने से जहाँ जन्म-मरण उठकर भागने लगते हैं वहाँ भव भय का
साहस कौन धीर कर सकता है ? जहाँ हरिचरण भजन से प्रेम है, वहीं संसारभय की निवृत्ति है। इस प्रकार
हमारे विवेक के अनुसार भगवद्भक्ति ही परम निर्भय है। तुम निश्चयपूर्वक जान लो कि यह हमारा दृढ़
निश्चय है और वेद, शास्त्र, पुराण इसके साक्षी हैं। सारांश यही कि सभी प्राणियों के लिए भगवद्भजन ही
सबसे अधिक निर्भय स्थान है। वेद, शास्त्र, पुराण भले ही एक ओर रहें लेकिन प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण ने अपने मुख
से यही कहा है कि मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ। इससे भगवान के कथन में भक्ति ही प्रधान है। इतना ही
नहीं, बल्कि साक्षात श्रीकृष्ण ने अपने चारों हाथ उठाकर निज आत्म प्राप्ति का उपाय बताते समय
'भक्त्याहमेकन्या ग्राह्यः' अर्थात् केवल भक्ति से ही मैं वश में आने वाला हूँ, यह बात बतायी है।
ये वै भगवता प्रोक्ता उपाया ह्यात्मलब्धये।
अंजः पुंसामविदुषां विद्धि भागवतान् हि तान् ॥ ३४॥
जिनके पास वेद शास्त्र का ज्ञान नहीं है, ऐसे अज्ञानी लोगों को ईश्वर प्राप्ति सुगम हो और वे ब्रह्मस्वरूप
प्राप्त कर सकें इसलिए भगवान ने ही यह हरिभक्ति प्रकट की है। वेदशास्त्र का अध्ययन किये बिना किस
जड़-मूढ़ ने भवसागर पार किया ऐसा यदि पूछें तो उन्मत्त गजेन्द्र का उद्धार हुआ है। परीक्षित का गर्भावस्था में
संरक्षण हुआ है। अम्बरीष का गर्भ निवारण भक्ति के ही कारण हुआ। 'अहं भक्तपराधीनः' अर्थात् मैं भक्त के
वश में हूँ यह बात स्वयं नारायण ने कही है। इस भगवद्भक्ति से वनचर, वानर जाने कितने तर गये। भालुओं
का उद्धार करने के लिए भगवान ने जंगल में जाकर भक्ति से जांबवती से विवाह किया फिर यह भी याद करो
कि अविवेकी ग्वाले, गोधन और गोपाल जो कृष्ण के सखा थे वे भी प्रबल अनन्य प्रीति के ही कारण तर गये।
शास्त्र विरुद्ध अविवेक के कारण, जार भावना से ही क्यों न हो लेकिन श्रीकृष्ण से अत्यन्त प्रेम रखने के कारण
कितनी गोपियों का उद्धार हुआ उनकी तो कोई गिनती ही नहीं है। अनेक प्रकार के शास्त्र पढ़े बिना सुलभ
उपाय से ब्रह्मप्राप्ति हो सके और दुर्बल भी पार लग सकें इसलिए भगवान ने अपनी भक्ति प्रकट की। राजा !
वही यह भागवत है, जिसमें मुख्य रूप से भक्ति ही प्रधान है। शुद्ध भावना से भगवद्भजन करने से अज्ञानी
जनों का उद्धार हो जाता है। यह भागवत नहीं बल्कि दीन अज्ञानी लोगों के लिए खुला हुआ पौसरा है।
भजनभाव से संसार सागर पार करने के लिए भगवान ने यह बहुत बड़ी नौका ही बना कर रख दी है। भजन
भाव से जो इस भागवत रूपी महानौका में बैठ कर निकल पड़े उन्हें भजन स्वभाव के कारण संसार भय के
हिंचकोले नहीं लगते। स्त्री, शूद्र आदि सभी को एक ही बार में भजन भाव से उस तट तक ले जाया जा सकता

३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। भक्तिभाव से इस नौका को खेने से कर्माकर्म रूपी क्रूर जल को काट कर आत्मबोध के प्रवाह की दशा से
वह एक ही समय उस किनारे तक पहुँचाती है। वैराग्य के नाविक चारों ओर अटल बैठे रहने के कारण वे
विषयों की चट्टानों से बचाते हुए सुगमता से किनारे तक पहुँचाते हैं। संचित क्रियमाण की लहरों को काट कर
सही रास्ते पर लगाते हैं और भाग्य का संचय समाप्त कर आत्मस्वरूप के तट पर पहुँचाते हैं। इसमें यदि कुछ
न्यूनाधिक हो जाए तो गुरुवचन के अनुसार सँभाल कर भूतदया की डोर से आत्मविश्वास के साथ खींचते हैं।
तब बड़ी शीघ्रता से वह नौका परात्पर तट पर जा लगती है। सबको एकाएक परतीर पर उतारते हैं और फिर
आत्मसाक्षात्कार हो जाने के कारण पुनरावृत्ति रुक जाती है और आवागमन नहीं करना पड़ता। एक भक्तिभाव
होने से, फिर जिसे 'डूबना' कहते हैं, वह मिथ्या हो जाता है। फिर जहाँ पहुँचना चाहता है, वह स्थान वह
स्वयं हो जाता है। यहाँ बिना पहुँचे ही तर जाना है और बिना प्रयास के ही प्राप्ति होनी है। अर्थात् सहज उपाय
से ब्रह्म की प्राप्ति हो, इसलिए नारायण ने भक्ति प्रकट की है। भागवत धर्म की स्थिति ही कुछ ऐसी है कि
सीधे-सादे लोग भी संसार सागर को पार कर जाते हैं। सुलभ रीति से किस प्रकार ब्रह्मप्राप्ति होती है, वही अब
श्लोकार्थ में स्पष्ट रूप से बताते हैं।
यानास्थाय नरो राजन्न प्रमाद्येत कर्हिचित्।
धावन्निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पते दिह ॥ ३५ ॥
जिसे श्रुति-स्मृति की समझ नहीं है, लेकिन केवल भक्तिभाव से भगवन्मार्ग अर्थात् भागवत धर्म का
अनुसरण करता है, उसे विधि निषेध की बाधा नहीं होती और उससे स्वप्न में भी गलती नहीं होती। सप्रेम
सद्भाव से यदि भागवत धर्म का आचरण करें तो कर्माकर्म की बाधा नहीं होती। उसकी भक्ति से ही पुरुषोत्तम
सदा सन्तुष्ट रहता है। श्रुति और स्मृति ये दो आँखें हैं। इनके बिना जो अन्धे हैं, वे भी भक्ति के बल के कारण
हरिभजन में दौड़ते समय गिरते या लड़खड़ाते नहीं हैं। हे राजा! ध्यान में रखो कि प्रेम के बिना श्रुति स्मृति का
ज्ञान, प्रेम के बिना ध्यान पूजा, प्रेम के बिना श्रवण-कीर्तन यह सब व्यर्थ है। माँ को देखते ही शिशु आँखें बन्द
कर ही उसकी ओर झपटता है, लेकिन उसके साथ माँ भी उतने ही प्रेम से उसकी ओर झपटती है और शिशु को
थाम लेती है। उसी प्रकार जो भक्त भगवान को प्रेमपूर्वक भजता है, उसके उस भजन के साथ ही भगवान भी
आनन्दपूर्वक चलने लगता है और पग-पग पर उसे सँभालता है। इस प्रकार भागवत धर्म का आचरण करते
समय उसे कर्माकर्म की बाधा नहीं हो सकती। क्योंकि जिसने कर्म में आज्ञा और नियम बनाये हैं वह पुरुषोत्तम
ही उसके भजन में उपस्थित रहता है। इस प्रकार स्वानंदकंद गोविन्द जहाँ भागवत धर्म से सन्तुष्ट होकर विचरण
करता रहता है वहाँ विधि-निषेधों का प्रवेश कैसे हो सकता है? उसके भक्त को कभी भी प्रमाद की बाधा नहीं
होती। जिस प्रकार पहरेदार मालिक के लड़के को नहीं रोक सकता उसी प्रकार जो भागवत धर्म से भजन करने
वाला है उसे कर्म की रुकावट बाधक नहीं होती। जिसे भगवद्भजन में विश्वास है, उसके तो विधिनिषेध दास
ही बन जाते हैं। उसका भजन विलास देखकर स्वयं जगन्निवास परम सन्तुष्ट होते हैं। भागवत धर्म से कर्म जैसे-
जैसे छूटते जाते हैं, वैसे-वैसे पुरुषोत्तम सन्तुष्ट ही होता है। लोगों को व्यर्थ ही भ्रान्ति है कि भक्तों को कर्म की
बाधा होती है। कर्म यदि भक्त से प्रमाद कराता है तो उसी प्रमाद में भगवान प्रकट हो जाते हैं। इसलिए हरिभक्तों
को कर्म का विधि निषेध बाधक नहीं होता। अजामिल को उसका कर्म 'बाधक हुआ था, वह यमपाश में बँध
गया, इतने में केवल नाम लेने से भगवान वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने उसे पावन किया। स्वधर्म कर्म जब

द्वितीय अध्याय ३७
निजसत्ता के वाहक बन जाते हैं तब भजनरूपी पालकी में शयन करने वाला भक्त यदि गिर पड़ता है तो स्वधर्म
कर्मों को ही दण्ड मिलता है। इस प्रकार भजन प्रताप के योग से स्वधर्म कर्मों को भी दण्ड दिया जा सकता है।
वर्णाश्रम का अस्तित्व मिटा कर कर्मों का भी विनाश किया जा सकता है। सारांश यह कि जो भागवत धर्म का
सेवन करने वाले हैं उनके स्वधर्म कर्म तुच्छ सेवक हैं। जिनमें भक्तों के सामने खड़े रहने का भी साहस नहीं है
वे भक्तों के लिए बांधक कैसे हो सकते हैं? भागवत धर्म कैसा है? भगवान के प्रति कर्म कैसे अर्पण होता है?
हे राजन! यह अत्यन्त गोपनीय निजभजन कर्म तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वाऽनुसृतः स्वभावात्।
करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ ३६॥
सोद्देश्य हो या निरुद्देश्य हो, वैदिक हो लौकिक हो या स्वाभाविक हो, ये सारे कर्म भगवान के प्रति अर्पण
करना, इसी को 'भागवत धर्म' कहते हैं, इसे ध्यान में रखो। पानी की तरंग अत्यन्त चंचल होती है, लेकिन वह
जहाँ भी कहीं जाती है, वह जल में ही मिलती है। उसी प्रकार भक्त के सारे कर्म तत्काल भगवान के ही चरणों
में अर्पित होते हैं अर्थात् भगवद्रूप ही हो जाते हैं। इस श्लोक में पहले मानसिक कर्मों के अर्पण के बारे में
बतलाया गया है तथा बाद में इन्द्रिय, बुद्धि, अहंकार आदि के कर्मों का तथा अन्त में कायिक कर्मों का अर्पण
बताया गया है। भागवत धर्म की वास्तविक स्थिति अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इन्द्रिय वृत्तियाँ हैं
तथा उन्हें भगवान के प्रति अर्पण करना है। यह कैसे किया जाता है सुनो। हे राजा! भक्त को स्वधर्म कर्म की
बाधा क्यों नहीं होती इसका रहस्य बताता हूँ। अति निस्सीम आत्मबोध से मन में ही पुरुषोत्तम प्रकट होते हैं
जिससे संकल्प विकल्प भगवद्रूप हो जाते हैं जिसके कारण भक्त निष्पाप ही रहते हैं। वे हरी की तरह
सत्यसंकल्पी होते हैं। जिस प्रकार शतरंज के खेल में राजा, प्रधान, हाथी, पैदल ये सब रहते हैं लेकिन वे सब
केवल लकड़ी के टुकड़े होते हैं, इसलिए भगवान के भक्त के संकल्प भगवद्रूप ही हो जाते हैं। उसका संकल्प
जिस विषय की अभिलाषा करता है वह विषय आत्माराममय ही हो जाता है जिससे भजन का उल्हास अपने
आप ही बढ़ जाता है। जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में भजन होने लगता है और शरीर में
आत्मबोध पूरी तरह भर जाने के कारण अनुसंधान अखण्ड रहता है। जब मन को समाधान प्राप्त होता है तो
उससे भजन भी बढ़ जाता है। अनुसंधान पूरी तरह बढ़ने के कारण ध्येय, ध्याता और ध्यान एकरूप होकर भजन
चलता रहता है। भक्त, तुर्या, साक्षी और उन्मनी को भी भगवद्भजन में लगाते हैं। इस प्रकार भावना के बिना ही
जो भाव उत्पन्न होता है वह तत्काल भगवान स्वरूप ही हो जाता है। फिर अर्पण का आश्चर्यभाव किसलिए?
अर्पण किये बिना ही वह अपने आप भगवदर्पण होता है। स्वरूपानुभव से स्वप्न मिथ्या हो जाता है, जागृति
छील कर ज्ञान बाहर निकालती है, सुषुप्ति का सुखसमाधान छाँट कर पूरी तरह एकत्रित करने से स्वयं मन ही
आत्मार्पण करता है। ऐसी स्थिति का सुखसमाधान ज्ञानी भक्त ही जानते हैं। इस प्रकार मानसिक व्यापार स्वरूप
में सहज ही अर्पण हो जाता है यह जान लो। घर में जब दीपक जलाया जाता है तो उसी का प्रकाश खिड़कियों
से बाहर आता है। उसी प्रकार मन में श्रीहरि प्रकट होने पर वही इन्द्रियों में भजनानन्द के रूप में प्रकट होता है।
इन्द्रियों का वही व्यापार विस्तारपूर्वक बताता हूँ। इन्द्रिय व्यापार भी परब्रह्मस्वरूप में भजनरूप हो जाते हैं। दृष्टि
जब दृश्य वस्तु को देखती है, उस समय उसे उसमें भगवान ही दिखाई देता है। इस प्रकार भजन सत्ता से
दृश्यदर्शन के साथ दृष्टि का विषय भी भगवान को अर्पित हो जाता है। दृश्य को दृश्य रूप में जो शक्ति प्रकट

३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करती है वह दृष्टि में दर्शनरूप हो जाती है। ऐसे अभिन्न भाव से दर्शनार्पण कर भक्तगण भजन करते हैं। एकत्व
में तीनों भाग हैं और तीनों में एक ही रूप है। इस प्रकार सुन्दर देखना ही पूर्ण समर्पण है। आँखें नित्य विविध
प्रकार के अनेक पदार्थ देखती हैं लेकिन भक्तों को उन सब में परमात्मा का ही रूप दिखाई देता है और इस
प्रकार वे दृष्टि के अर्पण का वैभव भोगते हैं। इस प्रकार भक्त दृष्टि का दर्शन ब्रह्मार्पण करते रहते हैं। अब हे
राजा! अब तुम्हें बताता हूँ कि श्रवण का ब्रह्मा में किस प्रकार अर्पण होता है। जो शब्दों का मुँह से उच्चार
कराता है वही कानों में सुनने वाला बनकर बैठा हुआ है और अर्थ जानने वाला भी वही है। अर्थात् यहाँ श्रवण
भी ब्रह्मार्पण हो जाता है। मुँह से शब्द निकल रहा है तभी शब्द का उच्चार कराने वाला उसके पीछे-पीछे प्रकट
होता है। इससे वह भजन प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होता है और श्रवण सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। शब्दोच्चार
होते ही अर्थ की वृद्धि होने लगती है इतने में जो शब्द का उच्चार कराने वाला होता है वही शब्दार्थ का माधुर्य
ग्रहण करता है और इस प्रकार श्रवणार्पण से ही हरिभजन में रुचि उत्पन्न होती है। कान पर शब्द पड़ते ही
शब्दार्थ के कारण भजन बढ़ता है और इस प्रकार शब्दों के प्रवर्तक से जुड़ जाता है अर्थात् अर्पित हो जाता है।
जो शब्दों को मुँह से निकलवाता है, उससे एकात्मता निश्चित करने से भजन श्रवण के हाथ में आता है और
सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। सद्गुरु का वचन कान पर पड़ते ही मन का मनपन मन में ही विलीन हो जाता
है। वही श्रवण ब्रह्मार्पण होकर भगवद्भजन में सार्थकता आती है। इस प्रकार श्रवण से ही श्रवण करने पर उसे
ब्रह्मार्पणता प्राप्त होकर सहज ही हेतुरहित भगवद्भजन हो जाता है। भजन से सन्तुष्ट होने वाला जगन्निवास गन्ध
का गन्ध बन कर रहता है और परेश घ्राण के द्वारा ब्रह्मार्पण से सुवास ग्रहण करता है। जो पुष्प को पुष्पत्व देता
है और फिर अनेक प्रकार की सुगन्धता का ब्रह्मार्पण भोग करता है। नासिका में अवकाश स्वयं ही ग्राहक्ता बन
जाने के कारण वह भोग स्वयं ही कृष्णार्पण होता है। अब 'रस' के अर्पण के सम्बन्ध में बताता हूँ। जिह्वा
रसग्रहण करने जाती है तो भगवान स्वयं ही रसास्वाद बन जाते हैं, जिससे रसना में रसोपभोग की वृत्ति ब्रह्मार्पण
हो जाती है। जिह्वा जो भी स्वाद ग्रहण करती है, वह हरिरूप होकर पूर्ण रूप से मधुर हो जाती है। इस प्रकार
जिह्वा अपना रसानुभव ब्रह्मार्पण कर देती है। रस, रसना और रसास्वाद का निजस्वरूप में अभेद ही है। ऐसी
भावना से रस का सेवन करने से स्वानन्द कन्द इन्द्रियद्वार के बाहर आता है। अर्थात् ऐसे रससेवन से परमानन्द
का साक्षात्कार होता है। कडुवा, मधुर आदि जो अनेक रस हैं उनका रसना धीरे-धीरे सेवन करती है लेकन वह
सारा 'ब्रह्मरस' ही होने के कारण उसके स्वाद में मधुर परमानन्द ही प्रकट होता है। इस प्रकार रसना भी रसभोग
द्वारा कृष्णार्पण में ही रत होती है। अब हे राजा! 'स्पर्श' इस विषय की व्यवस्था ब्रह्मार्पण में किस प्रकार होती
है, सुनो! अपने शरीर से स्पर्श करने जाओ तो देह में विदेही आत्मा ही प्रकट होता है। इसलिए जिसे भी स्पर्श
करने जाओ, वह स्पर्शभोग ब्रह्मार्पण होने लगता है। स्पर्शास्पर्श से अर्थात् त्वचा से किसी को स्पर्श करने का
विचार करें तो वहाँ स्पर्श करने के लिए कुछ नहीं रहता। उस ऐक्यरूप के कारण कृष्णार्पणरूपी भजन ही प्रकट
होता है। इसलिए जो भी पदार्थ लेने जाओ, वह पदार्थ सर्वसत्ताधीश परमात्मा ही बनकर रह जाता है इस प्रकार
उस भजन से निजभक्ति का स्वार्थ अर्थात् परमार्थ ही पल्ले पड़ता है। अब हाथ के अर्पण के बारे में बता रहे हैं।
हाथ भगवान को जब कुछ देने जाते हैं, तब वह देते समय भजन किस प्रकार हो जाता है, देखें। तो देनेवाला,
लेने वाला और दान ये तीनों बातें भगवान स्वयं हो जाता है। अब 'पैर' का अर्पण सुनिये। भक्त हर तरफ पैर से
चल कर आता है वह मार्ग भगवान स्वयं हो जाता है इसलिए ब्रह्मार्पण के कारण पग-पग पर निजभजन होता

द्वितीय अध्याय
३९

है। चरणों को चलने के लिए जो गति देता है, वही पृथ्वी की धारणा शक्ति है ऐसी युक्ति धारण कर चलने से,
चलने का वह कर्म ब्रह्मस्थिति को पहुँच जाता है। अभी तक ज्ञानेन्द्रियों में से श्रोतेन्द्रियों के सम्बन्ध में बतलाया,
अब कर्मेन्द्रियों में से वागिन्द्रिय के सम्बन्ध में सुनिये। बोल और बुलवाने वाले की भेंट बोलने में होती है। उसे
देखकर बोल लज्जा करता है। उसे दूर कर ही बोलना प्रकट होता है इसलिए ब्रह्मार्पण के साथ निजभजन बढ़ता
रहता है। निःशब्द में शब्द का विलय होता है निःशब्द बात ही शब्दों से कही जाती है। अर्पणकर्ता के साथ
वास्तविक अर्पण विधि इसे ही समझो। बोल बुलाने वाला बोल के भीतर ही है यह मान लेने पर वह बोल
कृष्णार्पण ही हो जाते हैं। इस प्रकार शब्द रूप से ही भजन होकर ब्रह्मार्पण के साथ परमार्थ प्रकट होता है। अब
अभिमान का अर्पण बताते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है, मन से कर्म से और वचन से जो भगवद्भजन में दृढ़
होता है वही उस भजन को अभिमान के साथ दृढ़तर थाम कर रहता है। समुद्र के भीतर रहने वाली लहर कहती
है कि वास्तव में देखा जाए तो जगत को शान्त करने वाला और पोसने वाला तथा चातक की तृष्णा को हरण
करने वाला जो मेघ है उसकी उत्पत्ति मुझ से ही है। मेरे ही कारण फसल पकती है, मेरे ही कारण नदियाँ जल
से भरकर बहती हैं और फिर समुद्र में मिल कर मुझसे ही मिल जाती हैं। इस न्याय के अनुसार भगवद्भक्त मूल
का पूर्णत्व पाकर उस पूर्णत्व के अभिमान से भजने लगता है। उस भजन का लक्षण ध्यान देकर सुनो। वह
कहता है कि त्रिभुवन का कर्ता मैं हूँ, कर्म करके अकर्ता तथा सभी प्रकार के भोग भोगकर नित्य अभोक्ता रहने
वाला भी मैं हूँ, सभी लोकों में मेरी ही सत्ता है, सभी में सब का नियंता भी मैं ही हूँ, सब को सभी प्रकार से
प्रकाशित करने वाला भी मैं ही हूँ, उसी प्रकार सबका रास्ता भी मैं ही हूँ। सकल प्राणियों में मैं ही एकमेव हूँ,
व्याप्य और व्यापक मैं ही हूँ, उत्पन्न होने वाला और उत्पन्न करने वाला मैं ही हूँ। एकता भंग किये बिना जगद्रूप
होनेवाला मैं ही हूँ। देवों का आदिदेव मैं हूँ, देवों में जो देवत्व है वह मेरा ही तत्व है। विनाशवान पदार्थों में
अव्यय और अज मैं हूँ। अक्षरों में जो अक्षरधर्म दिखाई देता है वह मेरे ही कारण है। ईश्वर में निहित जो भी
सत्ता है, वह सब मेरे ही सामर्थ्य के कारण है। ईश्वर में जो भी ईश्वरत्व है वह मेरे ही कारण है। जलरूप में
रसरूप मैं हूँ, प्रकृतिपुरुषों का जनक मैं हूँ, सृष्टि रचना की संकल्पना मेरी है किन्तु मैं निर्विकल्प हूँ। सभी
कारणों का अनादि कारण मैं हूँ, समाधि की मूल समाधि मैं हूँ, आत्मशुद्धि को मेरे ही कारण शुद्धि प्राप्त हुई।
अभिमान का कृष्णार्पण इसी प्रकार होता है। मैं अजन्मा होते हुए, बिना जन्म लिये जन्म लेता हूँ। मैं अकर्मा होते
हुए कर्म किये बिना कर्म करता हूँ। पुरुषोत्तम को 'उत्तम' की महिमा मेरे ही कारण प्राप्त हुई है। 'सत्' शब्द से
मेरा ही बोध होता है। 'चित्' शब्द से तो स्पष्ट रूप से 'मैं' ही हूँ। सत्, चित् और 'आनन्द' ये तीन भिन्न धर्म न
होकर निर्व्यंग जो 'आनन्द' है, वह मैं हूँ। मेरे ही कारण सूर्य में प्रकाश है, मुझमें ही चिदाकाश का आकाश है।
जगन्निवास मेरे ही कारण जगत में आनन्द से विचरण करता है। मैं अज हूँ। मेरे अजत्व के कारण ही माया को
अजत्व प्राप्त हुआ है। निःशेष निर्बीज पदार्थों का बीज मैं हूँ। मेरे ही स्वरूप से आत्मस्वरूप प्रकट होकर नाचता
रहता है। अधिष्ठान का वास मुझमें ही है। जगदीश्वर का पूर्ण ईश्वर मैं हूँ। परमपुरुष का पुरुष मैं हूँ और परेश
का परेश भी स्वयं मैं हूँ। असत् पदार्थ मेरे कारण सत्तावान होते हैं। अचित् अर्थात् जड़ वस्तुओं को मेरे कारण
चेतनता प्राप्त होती है। निजानंद को भी मेरे ही कारण आनन्दत्व प्राप्त होता है। सभी सिद्धियों की मूल सिद्धि मैं
हूँ, बुद्धि की सर्वांग सुन्दर बुद्धि मैं ही हूँ। मोक्ष की उपाधि भी मेरे कारण ही सिद्ध होती है। सच्चा धर्म मैं हूँ।
मुझमें निहित ब्रह्म से कर्म का विस्मरण होता है। ब्रह्म समाधि की परमावधि जो परब्रह्म है, वह मैं हूँ।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर ये भी वास्तव में मेरा ही अंश धारण करते हैं। दशावतारों का अवतारी मैं ही हूँ। मेरी