श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय २७
इस बड़े पुत्र का नाम था 'भरत' और वह नारायण का परम भक्त था। अभी भी 'भरतखण्ड' को
'भारतवर्ष' इस नाम से जाना जाता है वह भी इसी के नाम से प्रसिद्ध है। वह मन से, वाचा से और कर्म से
नारायण को ही भजता था, राजकर्ता होने पर भी आत्मज्ञानी था। जिस प्रकार राह चलते समय गलत-सही पग
पड़ने पर और पैर में चोट लगने पर भी उसे भूमि का ही आधार रहता है, उसी प्रकार 'भरत' राज्य का प्रशासन
करते समय यथोचित कर्मों का पालन करते हुए भी वह कभी आत्मनिष्ठा से च्युत नहीं हुआ। इसी स्थिति को
'अखण्ड स्थिति' कहते हैं जो कल्पांत में भी नहीं बदलती और जिसमें मनुष्य अत्यन्त सुखी होता है। उसे
पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता। इस प्रकार भरत सदाचरण करते हुए नारायण परायण था। यह बात मैं तुम्हें विस्तार से
बताता हूँ, सुनो। नरों के बड़े समुदाय को 'नार' कहते हैं। उस 'नारा' अथवा प्राणिसमुदाय की आत्मा 'अयन'
अर्थात् अधिष्ठान होने के कारण उसे 'नारायण' कहते हैं। उसके प्रति भरत परायण अर्थात् अनन्य भाव से शरण
हुआ और अपना अहंभाव भूलकर तद्रूप हो कर रहा। ऐसा वह ऋषभ का पुत्र, जिसका नाम 'भरत' था, जिसकी
पवित्र कीर्ति सारे संसार में फैली हुई है। वह भरत इस भूमि में हुआ इसलिए इस देश को 'भारतवर्ष' कहते हैं।
समस्त वैदिक कर्मों का संकल्प प्रारम्भ करते समय उसके नाम का उच्चार करना पड़ता है। लेकिन इस प्रकार
बिल्कुल आत्मस्वरूप होने पर भी उसे विषयसंग योग्य नहीं है, यह जानने के लिए मैं उसका चरित्र सबको सुना
रहा हूँ, उसे कृपया सुनें। केवल नाम से ही वह इतना प्रसिद्ध हुआ, इसीलिए उसे 'भरतखण्ड' इस नाम से
पुकारते हैं। लेकिन इससे भी अधिक उसका प्रताप प्रचण्ड अर्थात् विचित्र है, उसे सुनें।
स भुक्तभोगां त्यक्त्वेमां निर्गतस्तपसा हरिम्।
उदासीनस्तत्पदवीं लेभे वै जन्मभिस्त्रिभिः ॥ १८ ॥
उसने समस्त दिशाओं में विजय प्राप्त कर समुद्रवलयांकित पृथ्वी पर शासन किया। बड़े-बड़े देवता भी
जिन भोगविलासों को नहीं भोग सके थे, ऐसे विविध सुखों का उसने उपभोग किया। उसे स्त्रियाँ तथा पुत्र
अनुकूल थे और पवित्र मंत्री भी अनुकूल थे। उसी प्रकार समस्त राष्ट्र अनुकूल होते हुए भी उसने उन विविध
प्रकार के दिव्य भोगों का त्याग किया। इस प्रकार के सभी भोगों का उपभोग करने के बाद, वह अपना
समुद्रवलयांकित राजपाट छोड़ कर स्वहित को ध्यान में रखते हुए हरिभजन के लिए निकल पड़ा। जो राज-वैभव
का उपभोग करते हैं उन्हें विरक्ति तो कभी होती नहीं है, किन्तु भरत ने बड़े आश्चर्यजनक बात यह की कि वह
सभी भोगों का त्याग कर लक्ष्मीपति की सेवा करने लगा। सच तो यह है कि उसे उसी जन्म में मोक्ष प्राप्त हो
जाता किन्तु उसे दूसरा जन्म लेना पड़ा। उसका भी कारणं बताता हूँ। एक हिरनी जिसका प्रसूतिकाल निकट आ
गया था, नदी में खड़ी पानी पी रही थी। इतने में उसे व्याघ्र की गर्जना सुनाई पड़ी। वह एकाएक भय से उछल
पड़ी। लेकिन उछलते समय उसके पेट का गर्भ पानी में गिर पड़ा। उस समय भरत वहाँ स्नान कर रहा था।
उसने उसे देखा और स्वभावतः मन से कोमल होने के कारण उसने उसे तुरन्त बाहर निकाला। वह हिरनी वापस
नहीं लौटी। माताहीन शिशु दीन दिखायी देने लगा। इसलिए भूतदया से प्रेरित होकर भरत उस शिशु का पालन
करने लगा। धीरे-धीरे उस मृग के प्रति उसकी ममता बहुत बढ़ गयी। इतनी अधिक कि स्नान, संध्या, अनुष्ठान
आदि करते समय भी उसे हिरनी के उस बच्चे का स्मरण होने लगा। जप अथवा ध्यान प्रारम्भ करते ही भरत की
आँखों के सामने उस हिरनी के बच्चे के सिवाए और कुछ भी नहीं दिखायी देता था। बैठने पर, खाना खाते
समय, सोते समय, हर पल उसे उस मृग का ही ध्यान हो आता था। हिरनी का वह बच्चा आँखों से ओझल होते