श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वसुदेव उवाच
भगवन्भवतो यात्रा स्वस्तये सर्वदेहिनाम्।
कृपणानां यथा पित्रोरुत्तमश्लोकवर्त्मनाम् ॥ ४॥
आज आपने स्वयमेव आने की कृपा की इससे मैं अत्यन्त भाग्यवान हो गया हूँ। आप की निकटता से हम
कृतकृत्य हो गये हैं। माँ जब नहीं दिखायी देती तो बच्चा लोगों के बीच असहाय हो उठता है, लेकिन माँ के आते
ही उसके मन में आनन्द समा नहीं पाता। उसकी भी अपेक्षा आपका आगमन अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि उससे
प्राणिमात्र को नित्य ही सुख प्राप्त होता है। दीनों का उद्धार करने के लिए आप सहज ही पृथ्वी पर संचार करते
हैं। माँ को आये देख बालक को नित्य नया वैभव प्राप्त होता है लेकिन आपका आगमन समस्त दीनजनों को
सहज ही आत्मसुख का वैभव प्राप्त कराता है। माँ जो सुख प्रदान करती है वह नश्वर रहता है और आपके
आगमन से जो सुख प्राप्त होता है वह शाश्वत होता है। परा से परे चिन्मात्र चित्सुख भोगने का अवसर प्राप्त
होता है। आप भागवत धर्म पर चलने वाले हैं। हम लोग जब प्रयाग संगम पर निष्काम बुद्धि से कोटियज्ञ करते
हैं, तभी हमारी आप से भेंट होती है। नारदजी ! आप भगवत्स्वरूप हैं। आपकी भेंट मात्र से मनुष्य—निष्पाप हो
जाता है। तुम्हारी थोड़ी भी कृपा हो जाए तो तुम्हारा चित्स्वरूप अंतःकरण में अंकित हो जाता है। तुम्हारे ही
कारण भक्ति को अलौकिक महिमा प्राप्त होती है। तुम्हारे ही कारण भक्ति के सामर्थ्य का प्रसार हुआ। तुम्हारे ही
कारण भक्ति भगवत्स्वरूप बनी। तुम अपनी आत्मनिष्ठा के कारण चित्स्वरूप बन गये हो। आप ही भक्ति की
प्रकाशक मशाल हैं, भक्ति मार्ग के पथप्रदर्शक हैं। नारदजी ! आपके अनेक उपकार हैं। आपने भक्ति की हाट ही
सजा दी है। तुमने ही श्रेष्ठ और परिपूर्ण भागवत शास्त्र का व्यासजी को उपदेश कर दीन जनों का उद्धार करने के
लिए दस लक्षण प्रकट किये। नारदजी ! आप ईश्वर समान हैं। लेकिन यह उपमा भी कम है। इस अभिप्राय से
वसुदेव बोले।
भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च।
सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥
देवताओं से प्राणियों को सुख और दुःख प्राप्त होते हैं और उनका भोग भोगना पड़ता है। अधिक या कम
वृष्टि होने से प्राणियों में घबराहट उत्पन्न होती है। इसलिए मुझे सचमुच ही ऐसा लगता है कि उन देवताओं की
अपेक्षा साधु ही श्रेष्ठ हैं क्योंकि देवताओं की करनी से दुःख मिश्रित सुख उत्पन्न होता है लेकिन साधु निर्दोष
सुख के दाता हैं। अर्थात् दुःखक्लेशरहित सुख प्रदान करते हैं। तिस पर तुम्हारे जैसा कृपालु आत्मसखा मिलने पर
क्या पूछना। परमार्थ सुख की मानों बहार ही आ जाती है। यह महिमा इन लोगों की समझ में नहीं आती और
विशेष बात यह है कि एक बार यह सुख प्राप्त होने पर वह कल्पांत में भी समाप्त नहीं होता। नारदजी ! यह
अच्युतात्मस्थिति निश्चित रूप से आपके ही पास है। तुम्हारी महिमा की बराबरी भगवान से भी नहीं हो सकती।
वह कैसे ? तो नारदजी ! उसे मैं यथार्थ ढंग से बताता हूँ। देवता का अवतार होने पर उसके दास को सुख प्राप्त
होता है और दैत्य भयाक्रांत हो उठते हैं लेकिन यह भेदभाव आपमें नहीं है। आप देवताओं के भी अपने हैं और
दैत्यों को भी आप पर विश्वास है। रावण तुम्हें एकान्त में अपने मन की गुह्य बातें सुना रहा था। रावण ने
देवताओं को कारागृह में डाल रखा था लेकिन वही तुम्हारे चरणों का वन्दन कर रहा था। अन्त में तुम सचमुच
ही राम के भी मित्र थे। सारांश यह कि तुम्हारे में विषमभाव नहीं है। जरासंध कृष्ण का बैरी था, लेकिन उसके