श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय
हे देवाधिदेव ! तुम्हारी जय हो। तुम स्वसामर्थ्य से ब्रह्मभाव का भोग करते हो। जब तुम कृपा से अवलोकन
करते हो, तब विश्व में विश्वात्मा की व्याप्ति का अनुभव होता है। इस विश्व में जो विश्ववासी है, उस पर
विश्वास रखने के लिए तुम कहते हो और वैसा से तुम प्रसन्न होते हो और प्रसन्न होने पर अपने निजपद में स्थान
देते हो। उन चरणों की कृपा से 'अहं' 'सोहं' के बन्धन टूट जाते हैं और मैं तुम्हारे उदर में प्रवेश कर जाता हूँ।
तुम मेरी माता हो इस दृष्टि से जब तुम्हारी ओर देखता हूँ तो पाता हूँ कि पिता भी तुम ही हो। इससे अधिक
आश्चर्य की बात और क्या बताऊँ? इस लोक में तो माता और पिता अलग-अलग रहते हैं लेकिन वे दोनों
जनार्दन में ऐक्यरूप में विद्यमान हैं और मैं उनका नन्हा-सा बालक बन गया हूँ। इसलिए इन दोनों का स्नेह
एकत्र कर इस बालक को पालते हो और प्रतिदिन आत्मबोध का नया वैभव दिखला रहे हो। शिव, शक्ति, गणेश
तथा उसी प्रकार विश्व, विष्णु, सूर्य आदि अनेक अलंकार अपनी ही प्रसन्नता के लिए मुझे पहनाते हो। इस प्रकार
तुम मुझे, अपने शिशु को आभूषण पहनाते हो और कृपादृष्टि से वह वैभव तुम ही देखते हो। बालक के शरीर
पर अलंकार पहनाने से, उसकी शोभा और सुख बालक को कैसे मालूम होगा ? वह वैभव तो माँ ही भोगती है।
इस प्रकार मुझसे ग्रन्थ कहलवा कर उसका सुख जनार्दन ही लें। अपने चिद्रत्नों की माला मेरे गले में तुम ही
पहनाते हो और सुरक्षा के लिए एकात्म होकर मेरे पीछे दौड़ते हो। जिसका पिता सम्पन्न होता है, उसे सभी लोग
सम्मान देते हैं। उसी प्रकार जनार्दन ने इस एका को अपना कहा, इसलिए अमान्य होते हुए भी वह अधिक
मान्यता के लिए पात्र हुआ है। बालक स्वयं बोल नहीं सकता इसलिए उसकी माँ उसे बोलना सिखलाती है।
उसी प्रकार इस ग्रन्थ की कथा गुरु जनार्दन मुझसे कहलवा रहे हैं। उन्होंने यहाँ कितना बड़ा चमत्कार कर
दिखाया कि श्रीभागवत के एकादश स्कन्ध का अर्थ और वह भी मराठी भाषा में मुझ जैसे मूर्ख से कहलवाया।
खैर ! पहला अध्याय श्रवण कर राजा परीक्षित मौन बैठे रह गये। आगे की कथा सुनने की उन्हें इच्छा नहीं दिखाई
दी। क्योंकि, यदि मैंने अब प्रश्न किया तो शुक्राचार्य कृष्ण निधन की कथा सुनाएंगे। इसलिए वह राजा शान्त बैठ
गया। उसके मन का यह अभिप्राय जानकर शुक्राचार्य बोले, "हे परीक्षित ! इस अध्याय को मोक्ष का प्रस्ताव
समझ लो। यह पूरा अठारहवाँ स्कन्ध ही बड़ा अलौकिक है। इसमें एक से एक बढ़कर श्लोक हैं तथा
आत्मसाधन करने वाले के लिए पग-पग पर मुक्तिसुख प्राप्त होता है।" इतना सुनते ही राजा सावधान हो गया।
क्योंकि उसे मुक्तिसुख की अत्यधिक चाह थी। उसने सर्वांगों को कर्ण बनाया। यह देखकर शुक्राचार्य के चित्त
को अतीव आनन्द हुआ और उन्होंने कहा, "तुम तो अवधान की मूर्ति ही बन गये हो, तो अब अंतःकरण को
शान्तकर गुह्यज्ञान सुनो।" दूसरे अध्याय में नारद और वसुदेव के बीच के संवाद का निरूपण है। इसमें मुख्य
रूप से भागवतधर्म का लक्षण प्रश्नोत्तर के रूप में बताया गया है।
श्रीशुक उवाच
गोविन्दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह।
अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालसः ॥ १ ॥
जो मुक्त लोगों में अग्रणी है, ब्रह्मचारियों में शिरोमणि है, जिसे योगीजन भी वन्दनीय मानते हैं, जो