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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 869 में से

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पृष्ठ 37

द्वितीय अध्याय २१
भक्तमण्डल में अत्यन्त श्रेष्ठ है, जो ब्रह्मरस का सागर तथा आत्मबोध का पूर्णचन्द्र है, वह शुक योगीन्द्र बोलने
लगा और कुरुवंश का राजाधिराज सुनने लगा। शुक्राचार्य ने कहा, जो व्यासजी के साक्षात गुरु तथा मेरे परमगुरु
महामुनीश्वर नारद हैं उनका श्रीकृष्ण भजन से अत्यन्त प्रेम था। श्रीकृष्ण ने स्वयं ही सारे मुनिजनों को द्वारका से
पिंडारक भेजा था, लेकिन नारदजी वहाँ से बार-बार द्वारका आते थे क्योंकि द्वारका में कालपुरुष का प्रवेश नहीं
होता था। इसलिये वहाँ श्रीकृष्ण अपने स्वसामर्थ्य से विचरण कर रहे थे। नारदजी को दक्ष का शाप था कि वे
क्षणभर के लिए भी एक स्थान पर नहीं रह सकेंगे, लेकिन यह शाप हरिकीर्तन में लागू नहीं होता था इसलिए वे
निरन्तर कीर्तन में ही लीन रहते थे। कीर्तन गाने में जिसकी ख्याति थी वे लक्ष्मीपति श्रीकृष्ण स्वयं द्वारका में
निवास करते थे इसलिए वहाँ भी इस शाप की बाधा नहीं उपस्थित होती थी इसीलिए नारदजी निरन्तर वहीं
निवास करते थे। नारद को पूर्ण ब्रह्मज्ञान था तो फिर उसे सगुण श्रीकृष्ण मूर्ति क्यों अच्छी लगती थी ? क्योंकि
यद्यपि श्रीकृष्ण देहधारी थे फिर भी उनका देह केवल चैतन्यमय था इसलिए श्रीकृष्ण का भजन नारदजी को
अत्यन्त प्रिय था। इस प्रकार जब श्रीकृष्ण का भजन मुक्तों को भी भला लगता है तो ऐसा भाग्यहीन कौन है जो
उसे नहीं भजता ? शुक्राचार्यजी इसी का निरूपण करते हैं।
को नु राजन्निन्द्रियवान्मुकुन्दचरणाम्बुजम्।
न भजेत्सर्वतोमृत्युरूपास्यममरोत्तमैः ॥ २ ॥
हे राजश्रेष्ठ ! यह उत्तम नरदेह पाकर भी जो श्रीकृष्ण को नहीं भजता, उसे माया रूपी घोर दुःख ग्रस लेता
है, यह जान लो। जिस भगवान के लिए उसके पैरों से निकले उदक को मस्तक पर धारण कर सदाशिव
महाश्मशान में आत्मध्यान में बैठा हुआ है, जिनसे साक्षात ब्रह्माजी पैदा हुए हैं वहाँ दूसरों की क्या बात की
जाय ? नरदेह पाकर भी जो नारायण को नहीं भजता उसे पूर्ण रूप से मृत्यु से ग्रसित समझना चाहिए। परमात्मा
श्रीकृष्ण को छोड़कर जो लोग अन्य प्रकार के साधनों के फेर में पड़ते हैं उनको संसार बन्धन से कभी मुक्ति नहीं
मिल सकती। श्रीकृष्ण चरणों को छोड़कर कुछ लोग इन्द्रादि देवों का भजन करते हैं, लेकिन जब वे देवता ही
मृत्युग्रस्त हैं तो वे भजने वालों की मृत्यु को कैसे टाल सकते हैं ? सभी इन्द्रिय सुरक्षित होते हुए भी जो श्रीकृष्ण
चरणों का भजन नहीं करता, वह कहीं भी जाए लेकिन मृत्यु उसका साथ नहीं छोड़ती। वह हर क्षण उसका
विनाश करती है। महामुनि नारद, मुक्त होते हुए भी निरन्तर उनके भजन में तल्लीन रहते हैं। वह हमेशा द्वारका में
ही रहते थे। उनकी श्रीकृष्ण पर अत्यन्त प्रीति थी।
तमेकदा तु देवर्षिं वसुदेवो गृहागतम्।
अर्चितं सुखमासीनमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
अहा ! नारदजी धन्य हैं। उन्हें सर्वत्र श्रीकृष्ण ही दिखाई देते थे। उन्हें सदा हरिनाम का ही व्यसन था और
वे परमानन्द में ही निमग्न रहा करते थे। जो श्रीकृष्ण का चहेता था और जिसे श्रीकृष्ण सभी दृष्टियों से चाहते थे,
जिसके संग से जड़ जीवों को भी मुक्ति प्राप्त होती है, उसे देखते ही वसुदेव को अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उन्हें
साष्टांग दण्डवत कर उन्हें बैठने के लिए उच्चासन दिया। साक्षात परब्रह्म ही घर में आये हैं, इस प्रकार श्रद्धाबुद्धि
से उनकी पूजा प्रारम्भ की। नारद साक्षात नारायण ही हैं इस दृढ़ विश्वास से उन्होंने उनकी पूजा की। सुवर्णपात्र
में उनके पैर धोकर मधुपर्क विधि से उनकी पूजा की। इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूजा कर—वसुदेव अपने आसन पर
बैठ गये और प्रसन्न अंतःकरण से बोलने लगे।