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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 869 में से

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पृष्ठ 42

२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्वया परमकल्याणपुण्यश्रवणकीर्तनः ।
स्मारितो भगवानद्य देवो नारायणो मम ॥ १३ ॥
जिसके गुणानुवाद से पुण्य की वृद्धि होती है और जिसके नामस्मरण से संसार का बन्धन कटता है उस
नारायण का आज तुमने स्मरण कराया, इसलिए तुम्हारी इस वाणी का कल्याण हो। आज तुम्हारा यह प्रश्न
सुनकर हृदय में मानों नारायण ही पूर्णरूप से प्रकट हो गया है। तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है।
इसलिए हे वसुदेव, तुम्हारा पूर्ण कल्याण हो। नारद का यह भाषण सुनकर शायद किसी के मन में यह विचार
आये कि नारद को पहले नारायण का विस्मरण हुआ था और अब वसुदेव के प्रश्न से उसे स्मरण हुआ है।
लेकिन जो इस प्रकार विकल्प का तर्क करेंगे उसे आत्मघाती समझना चाहिए। उस विषय की उत्पत्ति के सम्बन्ध
में शुकदेव बता रहे हैं उसे सुनिए। अग्निकुण्ड में अग्नि स्वयंभू रहती है, उसमें घी डालने से वह और अधिक
भड़क उठती है। उसी प्रकार प्रेमपूर्ण प्रश्न होने पर मुक्तजन के सुख का और भी अधिक विकास होता है। श्रोता
जब भक्तिभाव में तल्लीन हो जाता है उस समय मुक्त भी अधिक उल्लास से कथा सुनाता है। उस सुख का
आस्वाद वही ले सकता है जो जानकार है। इसलिए मुक्त, मुमुक्षु और विषयीजन भी भागवत धर्म से पूर्ण शान्ति
प्राप्त करते हैं। वही प्रश्न वसुदेव ने किया इसलिए नारद को भी परमानंद हुआ और पूर्वपरम्परागत, प्राचीन
भागवत धर्म को सप्रमाण बताने के लिए नारदमुनि ने पूर्व इतिहास बताना शुरु किया।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
आर्षभाणां च संवादं विदेहस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
उपर्युक्त आशय का ही प्रश्न जनकराजा का था, और उसका उत्तर नौ आर्षभों ने दिया था। नारद ने कहा,
उस भागवत धर्म का सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो। किन्तु तुम पूछोगे कि प्रथम आर्षभ कौन
था, इसलिए उनके वंश के बारे में तुम्हें बताता हूँ। उनका जन्म उत्तम कुल में हुआ था और वे सभी अचेत
ब्रह्मनिष्ठ थे।
प्रियव्रतो नाम सुतो मनोः स्वायम्भुवस्य यः।
तस्याग्नीध्रस्ततो नाभिर्ऋषभस्तत्सुतः स्मृतः ॥ १५ ॥
स्वयंभू मनु का पुत्र था। उसका नाम था 'प्रियव्रत'। उसका पुत्र 'आग्नीध्र' नाम से ख्यातिप्राप्त था।
सूर्यवंशीय उसके पुत्र का नाम 'नाभी' था। उस नाभी को ज्ञान का वैभव 'ऋषभ' नामक पुत्र हुआ। यह वासुदेव
का अंशांशावतार था और उसने संसार में मोक्षधर्म का प्रकाश किया।
तमाहुर्वासुदेवांशं मोक्षधर्मविवक्षया।
अवतीर्णं सुतशतं तस्यासीद्वेदपारगम् ॥ १६ ॥
ऋषभ वासुदेव का अंश था। संसार में मोक्षधर्म पर लोगों की श्रद्धा बढ़े इसीलिए भगवान का यह 'अंशांश'
अवतार हुआ था। पंचमस्कन्ध में उसका चरित्र सविस्तार बताया गया है। उसे वेदशास्त्र सम्पन्न सौ पुत्र थे। उनमें
भी जो सबसे बड़ा पुत्र था वह अत्यन्त पवित्र था। उसका लोकविलक्षण चरित्र बताता हूँ, सुनो।
तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायणः।
विख्यातं वर्षमेतद्यन्नाम्ना भारतमद्भुतम् ॥ १७ ॥