श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय २३
घर भी आपका आना-जाना था और कृष्ण की सभा में तो उसके सम्बन्धी आप ही थे। देवताओं का नाम कोई न
ले इसका बीड़ा हिरण्यकश्यपु ने उठाया था, लेकिन उसे आपका कीर्तन बहुत अच्छा लगता था। इससे ज्ञात होता
है कि आपमें भेदभाव नहीं है। देवताओं के मन में लालच है लेकिन आप साधुओं में वह नहीं है। वह कैसे इसे
भी यथार्थ ढंग से बताता हूँ।
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान्।
छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः॥६॥
वे जैसे यज्ञों से देवताओं को संतुष्ट करते हैं, वैसे ही फल देवता उन्हें देते हैं और जो उन्हें नहीं भजते उन
पर विपदाएँ लाते हैं ऐसी देवताओं की चाल है। पुरुष जिस प्रकार घूमता है उसी प्रकार उसकी छाया भी घूमती
है। उसी प्रकार देवताओं का भजन करने से वे बहुत प्रसन्न होते हैं, नहीं तो उलटे उनके मार्ग में विघ्न लाते हैं।
प्रातःकाल सूर्य जिस प्रकार ऊपर चढ़ता जाता है वैसे-वैसे छाया भी निकट आने लगती है। उसी प्रकार हमारे
कर्म के अनुसार भगवान भी निकट आने लगते हैं, अर्थात् प्रसन्न होते हैं। सूर्यास्त होते ही छाया विलुप्त हो जाती
है, उसी प्रकार भजन न करने से देवता क्षुब्ध हो जाते हैं। उसी प्रकार देवता स्वार्थी हैं यह आप भी जानते हैं।
अन्य देवताओं की बात क्या करें ? लेकिन जो सबसे बड़ा देवता है वह भी पक्का घूसखोर है, वह भी प्राण लिये
बिना भेंट नहीं करता और गर्भवास हमें सहना पड़ता है। उसका प्रेमपूर्वक भजन करने से वह अपना निजांग
देकर भी प्रसन्न होता है लेकिन जो उसे नहीं भजता उसके घर भूल कर भी नहीं जाता। लेकिन संतों की बुद्धि
वैसी नहीं है। आप तो सचमुच ही दीनों पर दया करने वाले हैं। कृपा की निधि हैं। वह कैसे यह बताता हूँ।
आपने व्यासजी को सज्ञान जानकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया लेकिन ध्रुव को अज्ञान बालक जानकर उसकी
उपेक्षा नहीं की। आपने जब प्रह्लाद को उपदेश दिया उस समय वह दैत्य का पुत्र है यह विचार भी आपके मन में
नहीं आया। आपकी कृपा की लहर यही दीन जनों का विश्रामस्थल है। वाल्या धीवर राह में लूटपाट करता था,
न भजन जानता था न पूजन करता था उसे आपने रामनाम का उपदेश देकर महाकवि वाल्मीकि बनाया। उसका
वन्दन देवता भी करते हैं। उसके ग्रन्थ को देखकर सदाशिव भी आनन्द से विभोर हो उठते हैं। ऐसे आप कृपालु
और अनाथ के लिए आश्रयस्थल हैं। तुम बाह्य रूप से कुपित होते हो, लेकिन फिर उसका पाप दूर करते हो और
अंततः, हे दयालु ! एकत्व का दीप जला कर सद्रूप दिखलाते हो। आप सचमुच ही अच्युतात्मा हैं, इसलिए
भगवान भी आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। आप उससे जिसका उद्धार करने के लिए कहते हैं, उसी का वे
उद्धार करते हैं। अन्यथा उसका हाथ भी नहीं पकड़ते। इस प्रकार आप दीनों को परमार्थ की दीक्षा देने वाले गुरु
हैं और ब्रह्मज्ञान से अत्यन्त उदार हैं। इसलिए अब जो बात मैं पूछूँगा उसे ठीक तरह से बताइये।
ब्रह्मांस्तथापि पृच्छामो धर्मान् भागवतांस्तव।
यान्श्रुत्वा श्रद्धया मर्त्यो मुच्यते विश्वतो भयात् ॥ ७ ॥
उसने पुनः आदरपूर्वक कहा, "हे देवर्षि ! आज मेरे सारे कर्म फलीभूत हुए। क्योंकि आत्मसुख देने वाले
आप हमारे घर आये। पहले आपने जिस प्रकार शिष्यों पर कृपा की थी उसी प्रकार मुझ पर भी कृपा कर मुझे
संसार पाश से छुड़वाइये। आप पर मेरा पूर्ण विश्वास है। आपने अपने दर्शन से मुझे सचमुच ही कृतकृत्य कर
दिया। तो अब वैसी ही कृपा से मुझे यथार्थ ढंग से भागवत कथा का निरूपण करें। भागवतधर्म इस प्रकार बताएँ
जिससे समस्त कर्मों का विलय हो जाए और उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से जन्ममरण से मुक्ति प्राप्त हो