श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाए। संसार का भय अत्यन्त विदारक है और उसका मूल कारण माया है। वह माया जिस धर्म से समूल नष्ट हो
जा, ऐसे धर्म के बारे में मुझे कृपापूर्वक बताइए। यदि आप यह कहें कि उसे सुनने का मुझे अधिकार नहीं है तो
उसके सम्बन्ध में मैं बताता हूँ उसे सुनें।''
अहं किल पुराऽनन्तं प्रजार्थी भुवि मुक्तिदम्।
अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया ॥८॥
मुझे पूर्ण अधिकार नहीं है यह मैं स्वयं भी जानता हूँ। लेकिन मैंने भगवद्भजन किया हुआ है, उसे तुम
श्रवण करो। मैंने भी पूर्व में देवाधिदेवों की आराधना की थी लेकिन ममता के कारण वह भजन व्यर्थ गया।
पुत्रलोभ के कारण मैं देवताओं की माया में फँस गया था। देवता ने संतुष्ट होकर मुझसे कहा कि जो माँगोगे वही
तुम्हें दूँगा। उस समय माया ने मुझे धोखे में डाल दिया। इसलिए मैंने माँगा, 'मुझे पुत्र हो।' वही यह मेरा पुत्र
श्रीकृष्ण है। लेकिन वह मुझे ब्रह्मज्ञान नहीं बताता। वह मेरे चरणों पर मस्तक रखता है और कहता है, मैं तुम्हारा
बालक हूँ। इस कारण से हमें श्रीकृष्ण से ज्ञानप्राप्ति नहीं होती। हृषीकेशी श्रीकृष्ण सचमुच परमात्मा है यह मैं
जानता हूँ। मैंने उसे जन्म दिया इसीलिए मुझे श्रद्धा है और इसीलिए तुम भी संतुष्ट हुए हो। तो अब उसी प्रकार
अपनी कृपा से मेरा उद्धार करो। जिस माया के भुलावे में हम फँसे हुए हैं, वह समूल किस प्रकार नष्ट होगी,
इसका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें दीजिये। इससे अधिक कुछ कहने से क्या लाभ है ?
यथा विचित्रव्यसनाद्भवद्विश्वतोभयात्।
मुच्येमह्यञ्जसैवाद्धा तथा नः शाधि सुव्रत ॥ ९ ॥
मायारूपी जल से यह संसार-सागर बिलकुल लबालब भरा हुआ है। उसे पार करना अत्यन्त कठिन हो
गया है। तो हे मुनिवर! उसे पार करने के लिए आप नौका बनें। इस सागर का जल बिलकुल खारा है और
प्रचण्ड जलचरों की भरमार हो गयी है। वे इतने उन्मत्त हो गये हैं कि उन्होंने अपने सामर्थ्य से सारे चराचर
को निगल लिया है। अविवेक रूपी तट पर मोह की दुर्धर लहरें चल रही हैं और धैर्य के तट को उध्वस्त कर
रही हैं। अहंकार का तूफान 'रों रों रों रों' की आवाज करता रहता है जिससे सम्पूर्ण सागर क्षुब्ध हो उठता है
और बड़े कर्कश स्वर में 'मैं और मेरा' यह गर्जना करता रहता है। उसी प्रकार अनेक प्रकार की वासनाओं के
भँवर देखो कैसे घूम रहे हैं। इसलिए देवताओं को भी इस सागर को पार करने का साहस नहीं होता। ईर्ष्या
की खाड़ियों में क्रोध का ज्वार भरता रहता है और ईर्ष्या तिरस्कार के काँटे राह में बिखेर देती है। कामरूप
पर्वतों के असंख्य ऊँचे-नीचे शिखर दिखायी देते हैं और उन पर वासनाओं के बड़े-बड़े वृक्ष विषयांकुर से
बढ़ते रहते हैं। इस समुद्र में संकल्प-विकल्प रूपी मछलियाँ तथा निंदारूपी भयानक मगरमच्छ हैं और
ब्रह्मद्वेष रूपी मगर मत्त होकर समुद्र में विचरण करते रहते हैं। संसारसागर इतना प्रचण्ड है, फिर भी उसको
सोखने वाले तुम अगस्ति हो। इसलिए तुम्हारी सहायता से इस समुद्र को पार करने का हमें पूर्ण विश्वास है।
इसकी लहरों का भय सारे ब्रह्माण्ड को है लकिन तुम्हारी कृपा से वे हमें बाधक नहीं होंगी। तो हे नारददेव !
हे दयानिधान ! आप इस जन्म-मरण रूपी संसार सागर से मेरा उद्धार करें। यह संसार समुद्र केवल पैर से
चलकर उस पार जा सकूँ ऐसा भागवत धर्म का विचारं मुझे बताइये। वसुदेव का यह भाषण सुनकर नारद के
मन को परम संतोष हुआ। उसकी उसी आनन्दमय स्थिति का वर्णन शुक्राचार्य अपने मुँह से राजा परीक्षित को
सुनाते हैं।