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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 869 में से

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पृष्ठ 44

२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही वह ध्यान छोड़कर खड़बड़ा कर उठ जाता था। इस प्रकार उस मृग से उसकी ममता हो गयी। एक दिन वह
मृग स्वेच्छा से जंगल में चला गया। इसलिए भरत को बड़ा दुःख हुआ और तभी मृत्यु ने उसे आ दबोचा।
इसलिए जहाँ ममता है वहाँ मृत्यु अवश्यमेव रहती है। जो पूरी तरह ममताशून्य रहता है, उसे जन्म अथवा मृत्यु
स्पर्श भी नहीं करती। भरत स्वयं बड़ा तपस्वी था, फिर वहाँ काल ने कैसे प्रवेश किया ? तो ममता का मौका
पाकर मृत्यु ने उसे आ दबोचा। जिस समय उसके शरीर की मृत्यु हुई उस समय भरत को मृग का ही ध्यान हो
रहा था। इसलिए उसे अगला जन्म मृग का ही प्राप्त हुआ। इस प्रकार उसके लिए पुनर्जन्म का कारण हो गया।
कृपा के ही कारण क्यों न हो लेकिन संग करने से वह योगी के लिए योगभंग का कारण बनता है। इसलिए जो
निःसंग होता है, वही अभंग साधक होता है। मृग का स्मरण करते-करते ही उसे मृत्यु आयी इसीलिए उसे मृग
का जन्म प्राप्त हुआ। जो कृष्ण का स्मरण करते हुए मरता है वह मृत्यु के बाद कृष्णस्वरूप ही हो जाता है। अंत
समय प्राणि की जैसी मति होती है उसी प्रकार उसे गति प्राप्त होती है। इसलिए मन में रात-दिन श्रीकृष्ण का ही
स्मरण करना चाहिए। भरत मृग बना लेकिन उस मृग के शरीर में भी उसे श्रीकृष्ण का स्मरण था क्योंकि पूर्वजन्म
में किया हुआ अनुष्ठान कभी व्यर्थ नहीं जाता यह निश्चित है। उसके बाद तीसरे जन्म में वह 'जड़-भरत' इस
नाम से प्रसिद्ध हुआ। वहाँ वह मायापाश से बिल्कुल अलिप्त रहने के कारण नित्यमुक्त हो गया। पिछले अनेक
जन्मों की कमी उसने इस जन्म में पूरी की। उसने अपने को आत्मस्वरूप में लीन कर लिया और परब्रह्म पद
प्राप्त कर लिया। इस प्रकार ऋषभ को सौ पुत्र हुए उनमें जो सबसे बड़ा था उसके बारे में बतलाया, अब शेष के
बारे में सुनो।
तेषां नवद्वीपपतयोऽस्य समन्ततः ।
कर्मतन्त्रप्रणेतार एकाशीतिर्द्विजातयः ॥ १९॥
प्रत्येक खण्ड पर एक इस प्रकार नौ खण्डों पर नौ को अधिपति बना रखा था। इक्यासी पुरुष कर्ममार्ग के
प्रवर्तक थे। शेष जो नौ असामी थे वे सारे भाग्य के भूषण एवं ब्रह्मज्ञान के मानों अधिष्ठान ही थे। उनके लक्षण
बताता हूँ, सुनो।
नवाभवन् महाभागा मुनयो ह्यर्थशंसिनः ।
श्रमणा वातरशना आत्मविद्याविशारदाः ॥ २० ॥
ये नौ भाई मानो ऋषभकुल को बिना तेल-बाती के प्रकाशित करने वाले दीपक ही थे। वे नौ के नौ
सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए सायुज्यस्वरूप के प्रकाशक अर्थात् साधकों को सायुज्यस्वरूप का दर्शन कराने वाले
थे। उन्होंने आत्माभ्यास के परिश्रम से कर्माकर्म को नष्ट कर दिया था। इसलिए वे भ्रमरहित होकर बिना किसी
आश्रम का स्वीकार कर रहे थे। वे शब्दज्ञान और ब्रह्मज्ञान में पारंगत थे तथा शिष्यप्रबोधन में समर्थ तथा परम
अद्भुत और अत्यन्त दक्ष थे। वे ब्रह्म विद्या के सचल पुतले थे तथा उनके अवयव मानों ब्रह्म को निकले हुए
अंकुर थे। वे विद्या के प्रतिबिम्ब एवं स्वतः सिद्ध परब्रह्म का स्वरूप थे। उन मुनीश्वरों ने दसों दिशाओं को एक
डोर में पिरोकर चद्दर बना दी थी और वायु को बँट कर उसकी करधनी बना दी थी। आकाश का ही उन्होंने वस्त्र
बना दिया था। नौ पुरुष चिदाकाश का ही वस्त्र ओढ़े खड़े थे। प्राण और अपान को रस्सी बट कर उसे नाभि के
पास गाँठ बाँध दिया तभी मानो जीव की ग्रन्थि खुल गयी और वही उन नौ पुरुषों का ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत
बन गया। इस प्रकार परब्रह्म के वैभव और आत्मस्वरूप के अनुभव से वे बिल्कुल परिपक्व हो गये थे। अब उन