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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 869 में से

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पृष्ठ 41

द्वितीय अध्याय २५
श्रीशुक उवाच
राजन्नेवं कृतप्रश्नो वसुदेवेन धीमता।
प्रीतस्तमाह देवर्षिर्हरेः संस्मारितो गुणैः ॥ १० ॥
वसुदेव के इस प्रश्न का उत्तर देते समय शुक्राचार्यजी आनन्दमग्न हो गये। चैतन्यरूपी मेघरूपी नारद मुमुक्षु
लोगों पर चित्सुख की वर्षा करने लगे। श्रीशुक्राचार्य ने कहा, “हे राजा यह अपनी रुचि का प्रश्न सुनकर मन से
मन मिल जाने के कारण नारद ने कहा, “हे वसुदेव! तुम्हारी वाणी धन्य है। तुम्हारा यह प्रश्न सुनकर चिदानंद
स्वरूप से नारायण प्रकट हुए हैं।” यह कहते समय नारद आत्मानंद से अभिभूत हो उठा। उसके शरीर पर रोमांच
हो आये, शरीर पसीने-पसीने हो गया, आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे और वे स्वानंद के रंग में डोलने लगे। भक्त
श्रोता मिलने पर जिस वक्ता को पूर्ण आनन्द नहीं प्राप्त होता, उसे कथासारामृत का स्वाद ही मालूम नहीं है, वह
बिल्कुल शुष्क है। वसुदेव का प्रश्न सुनकर नारद को अत्यन्त आनन्द हुआ और फिर उस आनन्दयुक्त वाणी से
गर्जना करते हुए वसुदेव से क्या कहा, सुनो।
नारद उवाच
सम्यगेतद् व्यवसितं भवता सात्वतर्षभ।
यत् पृच्छसे भागवतान्धर्मांस्त्वं विश्वभावनानू ॥ ११ ॥
नारद ने कहा, हे यादवश्रेष्ठ! हे परमार्थनिष्ठ वसुदेव ! तुम्हारी उत्कंठा सचमुच ही धन्य है। भागवतधर्म पर
तुम्हारी बहुत अधिक भक्ति है इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रीकृष्ण जनक ! जिस धर्म के प्रश्नोत्तर से इस सारे विश्व
का उद्धार होगा, उसी धर्म के बारे में तुमने पूछा यह बहुत अच्छा हुआ। तुम्हारे प्रश्नोत्तर से साधकों का उद्धार
होगा इसमें आश्चर्य कैसा ? इसके योग से महापापी भी पावन हो जाएंगे।
श्रुतोऽनुपठितो ध्यात आदृतो वाऽनुमोदितः।
सद्यः पुनाति सद्धर्मो देवविश्वद्रुहोऽपि हि॥ १२ ॥
भागवत धर्म का गुण ही ऐसा है कि उसके श्रवण से ही कितनों का उद्धार होता है, कुछ उसके पठन से
तर जाते हैं। कुछ उसके चिन्तन से, संसार पाश से मुक्त हो जाते हैं। कुछ श्रोता को और वक्ता को देखकर मन में
आनन्द का अनुभव करते हैं, सद्भाव से उनकी प्रशंसा करते हैं वे इस भागवत धर्म से तर जाते हैं। इसमें भी
कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि जो देवताओं का द्रोही है या दुरात्मा है अथवा सारे विश्व का द्रोह करने
वाला दुष्ट चाण्डाल होता है, वह भी इस भागवत धर्म से तर जाता है, ऐसी इसकी महिमा है। यदि भागवत धर्म
हृदय में धारण किया जाय तो वह अकर्मी के कर्मों का विनाश करता है और अधर्मी के अधर्मों को रसातल तक
ले जाकर उन्हें उत्तम से उत्तम पद पर आरूढ़ कराता है। भागवतधर्म जहाँ पहुँचता है वहाँ वह कर्माकर्म का
विलय कर निंदा, द्वेष, क्रोध, अविद्या आदि का नाम भी शेष नहीं रहने देता। अब उस भागवत धर्म के सम्बन्ध
में ही तुमने अत्यन्त आदर से और भक्ति से गूढ़ प्रश्न किया है। इसलिए हे वसुदेव, तुम अत्यन्त पवित्र और
अत्यन्त उदार भाग्य के हो। तुम्हारी पवित्रता का कितना वर्णन किया जाय ? जिसके सुनाम से हम पावन और
जगतवंध्य हुए, वह श्रीकृष्ण तुम्हारा पुत्र है। वह श्रीकृष्ण तुम्हारे घर में नित्य रहता है। इसलिए तुम्हारे जैसा
भाग्यवान तो मुझे इस संसार में कोई और नहीं दिखाई देता। हे वसुदेव! तुम्हारे ही नाम से इस अनन्त को
'वासुदेव' कहते हैं। उस वासुदेव का नामस्मरण करने से प्राणी अति पावन हो जाता है।