श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
दसवाँ अध्याय २३५
जानते हैं। यहाँ कर्म चार प्रकार का है—नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा प्रायश्चित्त ये कर्म के चार विभाग हैं। ये
कर्म करते समय वृत्ति सावधान रखनी चाहिये। कर्म का आचरण कैसे करना चाहिये इसका मर्म मैं तुम्हें अभिनव
प्रकार से बताऊँगा। नित्य और नैमित्तिक कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं। वह प्रत्येक व्यक्ति को करना ही चाहिये वह
कर्मफल की आशा किये बिना यथाविधि करना चाहिये। नित्यकर्म जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे नैमित्तिक
कर्म भी बढ़ने लगता है। फिर विषयप्राप्ति की इच्छा से काम्य कर्म उफनता है तब वह निषिद्ध हो जाता है।
इसलिये फल की अभिलाषा न कर नित्य नैमित्तिक कर्म समर्पण जानकर कृष्णार्पण करना चाहिये। काम्य अर्थात्
सकाम कर्मों का विशेष त्याग करना चाहिये जिस प्रकार उलटी किये हुए पदार्थ को लोग भूलकर भी नहीं देखते।
जब कामना ही छूट जाय तभी काम्य कर्मों का त्याग करना चाहिये। मन में कामना करने पर काम्य कर्मों का
त्याग सम्भव नहीं होता। मन में विविध प्रकार की कामनाओं का ताण्डव चल रहा हो और बाहर से विरक्ति का
ढोंग करना यह तो विडम्बना है। हे चतुर! उसे त्याग नहीं कहा जा सकता। कामना जब बढ़ने लगती है तो
निषिद्ध कर्म घटने लगते हैं। इसलिये कामना को ही समूल नष्ट करने से निषिद्ध कर्मों के घटने की सम्भावना
नहीं होती। या आँखों के समक्ष निषिद्ध कर्म होते देख यदि हरिनाम की गर्जना की जाय तो निषिद्ध कर्म बारह
मार्गों से भाग जाते हैं। हरिनाम के योग से सहस्र प्रायश्चित्तों का श्रेय मिलता है। जहाँ हरिनाम का जयघोष
चलता रहता है वहाँ निषिद्ध तत्काल भस्म हो जाता है। निषिद्ध अभक्तों के शरीर पर प्रहार करता है, भक्तों के
पास वह कभी भी नहीं आता। काम्य-निषिद्ध की हवा भक्तों को नहीं लगती। भगवान जब भक्तों की रक्षा करता
है तो उन्हें दोषों का सम्पर्क कैसे होगा? सहस्र प्रायश्चित्त केवल एक नामोच्चार से सम्भव होते हैं यह गोपनीय
बात किसी से न कहना। काम्य तथा निषिद्ध कर्मों का त्याग करने के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें विस्तार से बताया है।
अब नित्य और नैमित्तिकों के कर्म विभाग के बारे में भी सुनो। ईश्वर को अर्पण करने की दृष्टि से नित्यनैमित्तिक
कर्म अवश्य करने चाहिये। वही मन को निर्मल करता है तथा परमार्थ का प्रमुख साधन है। कुछ लोगों का
विचार है कि स्वधर्म बिलकुल निष्फल है लेकिन वे मूर्ख उसका मर्म नहीं जानते। स्वधर्म का आचरण करने से
जन्म सफल होता है और स्वधर्म के योग से परमार्थ का फल मिलता है। सुवर्ण की अशुद्धि को दूर करने के
लिये जब उसके पत्रे के दोनों ओर लेप लगा कर उसे आग दिखायी जाती है तो वह पुनः चमकने लगता है। उसी
प्रकार स्वधर्म मुझे अर्पण करने से उसका कर्म सफल होता है। यह गोपनीय मर्म कर्मठों को न मालूम होने से
उन्हें कर्म के सम्बन्ध में बहुत बड़ा भ्रम रहता है। कर्म मुझे अर्पण करने की बात कठिन अवश्य लगती है लेकिन
जिसे मुझसे प्रीति है उसकी दृष्टि से मुझे समर्पित रहती है। जिसका मन कृष्ण में सुनिश्चित हो गया है उसके
सारे कर्म कृष्णार्पण हो जाते हैं। भले ही वह मुझे अर्पण न करे लेकिन वे सहज ही मुझे अर्पण हो जाते हैं। जो
रथ में निश्चल बैठा दिखायी देता है, वह अपने स्थान से बिना हिले भी चलता हुआ-सा दिखाई देता है। उसी
प्रकार उसका (भक्त) स्वकर्म अनायास ही मुझे अर्पण हो जाता है। इस प्रकार निष्काम होकर सुखपूर्वक स्वधर्म
का आचरण करें। उसके योग से रज-तम बचाकर सत्व के योग से पुरुषोत्तम को प्राप्त होते हैं। वर्ण और आश्रम
की उत्पत्ति का मूल आधार जो मैं हूँ, उसे पहचानना चाहिये। अपने स्वभाव के अनुसार कुलधर्म से मेरी अकेले
की ही उपासना करनी चाहिये। वर्ण के लिये मैं ही आश्रय भूत हूँ। 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू' यह वचन
प्रसिद्ध है। उसी प्रकार आश्रमों की उत्पत्ति भी मेरे ही कारण है यह बात वेद गरज-गरज कर कह रहे हैं। देव,
देवी और कुलाचार का अधिष्ठान मैं हूँ। इस प्रकार मैं सभी का आधार हूँ। उद्धव तुम्हें मैं रहस्य की एक बात
बताता हूँ, सुनो। सारे कर्मों का अध्यक्ष मैं हूँ, यह समझ लो और कर्म करते समय मेरी ही अभिलाषा करो तथा
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क्रिया करते समय भी मेरी ही धारणा करो। इस प्रकार कर्मों के आदि, अन्त और मध्य में अविनाशी मैं हूँ। मुझे
अंतःकरण में रखने से वे कर्म ही निष्कर्म में हो जाते हैं, इस बात को हे उद्धव, निश्चित रूप से समझ लो।
अन्वीक्षेत विशुद्धात्मा देहिनां विषयात्मनाम्।
गुणेषु तत्त्वध्यानेन सर्व्वारम्भविपर्ययम् ॥२॥
इस प्रकार जिसका अंतःकरण स्वधर्म के योग से शुद्ध हुआ रहता है, उन्हें पहचानने का यह लक्षण है
कि वे उदासीन रहते हैं। उनकी विषय के प्रति आस्था बिलकुल नहीं होती किन्तु विषयासक्त लोगों को
अपनी विषयासक्ति के कारण सारे कर्म विपरीत ही दिखाई देते हैं। मृगजल के तालाब कितने भी भरे क्यों न
हों लेकिन उसमें धान या केले की पैदावार नहीं हो सकती। उसी प्रकार जिनकी बुद्धि ही विषय लंपट है उन्हें
आत्मसुख के फल कभी भी प्राप्त नहीं होंगे। देखो, जो विषयासक्त होते हैं वे 'आयुःकामार्थ', आयुष्य की
वृद्धि हो तथा मनोरथ सिद्ध हों—'क्षेमार्थ' मेरा निरन्तर कल्याण हो, 'धनधान्यार्थ-समृद्धि' धनधान्य की समृद्धि
हो इस प्रकार का संकल्प कर्म करने के प्रारम्भ से ही करते रहते हैं। इसी हेतु से कर्म प्रारम्भ करने के कारण
वास्तव में स्वकर्म होता ही नहीं है। बल्कि स्वधर्म के बहाने वे सर्वदा मनोरथों की ही उपासना करते रहते
हैं। बैल को दुहने का प्रयास करने से सीप भर भी दूध नहीं निकलता, उसी प्रकार मनोरथ की उपासना करने
से आत्मसुख बिलकुल प्राप्त नहीं होता। इस प्रकार का कर्म वास्तव में कर्म होता ही नहीं है और उसे करने
से वह सिद्ध भी नहीं होता। उसमें अनेक बाधायें आकर उसका विनाश हो जाता है। इसके अतिरिक्त
देवताओं की ओर से भी बाधा आने की सम्भावना रहती है। विषयसेवन में सुख है यह सोच कर उसको
प्राप्त कराने में यज्ञकर्म ही श्रेष्ठ है यह मानकर मूर्ख लोग कष्ट कर असीम दुःख पाते हैं। तीनों वेद जानकर
यज्ञकर्म में पारंगत हुए लोग स्वर्गादि फलों की इच्छा कर, मुँह नीचे कर अधःपतन को प्राप्त होते हैं। विवेक
से दृष्टि प्रगल्भ होकर जो स्वर्ग को तृणवत मानकर उसे स्वीकार नहीं करते उसके पीछे वैराग्य लग जाता
है—बल्कि वह शीघ्रता से उसके घर में प्रवेश करता है। वह वैराग्य का मायका है, विश्राम का भी विश्राम
स्थल है। इतना नहीं बल्कि साक्षात विवेक ही उस पुरुष के रूप में साकार हुआ है ऐसा समझना चाहिये।
ऐसे विवेक से बनी विवेक दृष्टि से देखने पर स्वर्गादि विषय भी मिथ्यासृष्टि मालूम होते हैं। हे जगत्श्रेष्ठ
उद्धव! उस मिथ्यत्व का निरूपण अब सुनो।
सुप्तस्य विषयालोके ध्यायतो वा मनोरथः।
नानात्मकत्वाद विफलस्तथाभेदात्मधीर्गुणैः ॥ ३ ॥
स्वप्न और मनोरथ ये दोनों मन के ही खेल हैं। जो सो रहा है उसे वे सत्य ही मालूम होते हैं लेकिन जागृत
होने पर वही मिथ्या मालूम होते हैं। उसी प्रकार कामना के उल्हास तथा इन्द्रियों की आसक्ति से बुद्धि में
इहलोक और परलोक के भोग का मिथ्या पागलपन घुसा रहता है। सीप सीप ही रहती है किन्तु धन का लोभी
उसे रजत समझ बैठता है, उसी प्रकार विषय की अभिलाषा से भेद का पागलपन उसे जकड़ लेता है। स्वप्न में
मनुष्य को मृत अवस्था में देखता है और जागृत होने पर स्वयं ही उसे झूठ कहता है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में
जागृति आने पर उसे जन्म-मरण दिखायी ही नहीं देता। जीव और शिव का भेद जब तक कायम रहता है तब
तक जन्म-मरण की बाधा रहती है। जब वह भेद ही मिथ्या सिद्ध हो जाता है तो अद्वैत में वह बाधा नहीं रहती।
वह भेद किस तरह दूर होता है, स्वस्वरूप से भेंट किस प्रकार होती है, उसके लिये एक उत्तम साधन बताता हूँ,
ध्यान से सुनो।
निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत्।
जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनान् ॥ ४॥
मन में वासनाओं का मैल रहता है, इसलिये यह भेद सबल मालूम होता है। इसलिये मन से मैल निकाल
कर उसे निर्मल करते रहना चाहिये। पहले जिस नित्य नैमित्तिक कर्म के सम्बन्ध में कहा गया है उसी का नाम
'निवृत्त कर्म' है। वैसा कर्म साधकों को करना चाहिये। जो मेरे भजन में प्रवृत्त हो गया उसे काम्यकर्म पूरी तरह
छोड़ देना चाहिये। मन में किसी भी प्रकार की कामना नहीं रखनी चाहिये। यह पहले भी विस्तार से बताया ही
गया है। प्रत्येक कर्म मुझे समर्पित करने का विश्वास रखकर निरन्तर निर्मल कर्म का आचरण करने से मन के
सारे मैल धुल जाते हैं। किसान खेत जोतता है और सरकार को उसका लगान दे देता है। गाँव के कंटकों से वह
नहीं डरता। कृष्णार्पण से भी वैसी ही स्थिति प्राप्त होती है। चित्त के सारे मैल धुल जाने पर मन में 'नित्य' वस्तु
का विचार उभरता है और इह परलोक के सुखों पर लात मार कर वैराग्य से 'अनित्य' का त्याग करता है। इस
प्रकार वैराग्य अटल हो जाने पर उससे सत्त्वगुण की वृद्धि होती है। तभी वृत्ति मुझे जानने लायक निर्मल होती है।
मेरा चिंतन करने से कामक्रोध का स्मरण ही नहीं होता। उसे अत्यन्त तीव्रता से मेरी लगन लगी रहती है। वह
क्षणभर के लिये भी मेरे चिन्तन के बिना नहीं रहता। चित्त की इस अवस्था में जिसे कर्म क्रिया के प्रति अरुचि
उत्पन्न हो जाती है उसे समस्त कर्मों का संन्यास कर ब्रह्मज्ञान में प्रविष्ट हो जाना चाहिये। श्रवण मनन कर्म में
यदि कोई त्रुटि आती है तो वह मेरे भक्तों को बाधक नहीं होती क्योंकि वह कर्मों का दास नहीं है। स्वधर्म करने
का क्या फल है? तो उससे चित्त का मैल निश्चय ही दूर हो जाता है। किन्तु मेरा भक्त भजन से ही निर्मल होने
के कारण उसे स्वकर्म बाधक नहीं होता। सारांश यह कि मेरे भक्तों पर कर्मों की आज्ञा लागू नहीं होती। श्रवण-
कीर्तन करते रहने के कारण वे कर्म बन्धन में नहीं फँसते। इस प्रकार जो जिज्ञासावस्था में रहते हैं वे कर्मबन्धन
में नहीं फँसते। उद्देश्य ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना होता है, यही बात भगवान् उद्धव से कहते हैं।
यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्परः क्वचित्।
मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम् ॥ ५॥
वृत्ति पर नियंत्रण करने के लिये अहिंसा, सत्य आदि धर्म बाह्य नियम का विरोध न करते हुए अविश्रांत
आचरण करना चाहिये। अहिंसा-सत्य आदि का आचरण करते समय उसकी स्थिति इतनी उज्ज्वल हो जाती है
कि उसकी गुरुभक्ति पर अटूट श्रद्धा हो जाती है, दिन-रात वह गुरु का ही चिन्ता करने लगता है क्योंकि
उपनिषद में अन्तिम निर्णय के रूप में वचन है कि सद्गुरु के बिना कभी भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं होगा। आँखों
से अच्छी तरह दिखायी देता है लेकिन यदि उसे सूर्य की सहायता न हो तो उसे सामने की वस्तु नहीं दिखायी
देगी। वह अन्धकार में ही निश्चल खड़ा रहेगा। यह सच है कि नौका पार कराती है लेकिन यदि केवट न हो तो
इधर से उधर जाना सम्भव नहीं होगा। वर्षा से भूमि में आर्द्रता आती है और टोकरी में बीज भी पड़े हैं, लेकिन
यदि तज्ञ व्यक्ति बीज न डाले तो फसल की बात करना व्यर्थ है। सहसा कोई रत्न दिखाई देता है तो मन में यह
सन्देह उठता है कि वह असली है या नकली है। फिर रत्न परीक्षक उसकी कीमत लगाता है तब कहीं उसे
प्राप्त करने के लिये लोग प्रयास करते हैं। उसी प्रकार आत्मस्वरूप सहज ही उपलब्ध रहता है, उसे श्रद्धापूर्वक
सद्गुरु के हाथ से शुद्ध कर ज्ञानी लोग आत्मसुख के लिये प्राप्त होते हैं। आत्मज्ञान सम्पादन करने के लिये
सद्गुरु की सेवा कर संत सज्जन शान्त होते हैं क्योंकि सद्गुरु आनन्दघन रहता है। तुम कहोगे कि जो अनेक
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साधन किये उनमें गुरु भी एक साधन होगा। लेकिन यही बात अगर मुमुक्षु कहता है तो वह मूर्ख कहलाएगा।
उसका निजात्मसुख डूब जाएगा। सद्गुरु साधनरूप है और साध्य उससे अलग है यह कहने से वह लुट जायगा,
पूरी तरह लुट जायेगा। जो चित्सुख से सदा सम्पन्न है, जिसे चित्स्वरूप से समाधान प्राप्त होता है वह चिन्मात्र
से कभी भी अलग नहीं रह सकता। नमक जब समुद्र में पड़ता है तभी वह समुद्र कहलाता है। दीप जब
दावाग्नि को आलिंगन देता है तभी वह दीप तेज दावाग्नि बनकर रहता है। उसी प्रकार जिसे चिद्रूप का ज्ञान
होता है वह पूर्णरूप से चिद्रूप ही बनता है। उसी प्रकार गुरु और ब्रह्म भिन्न नहीं थे इस सम्बन्ध में उपनिषद में
प्रमाण है। यदि घृत की गुड़िया बनायी जाय तो वह घृत से भिन्न न होकर घी के रूप में ही आकारित होती है,
उसी प्रकार सद्गुरु की मूर्ति भी चिद्रूप में ही साकार हुई रहती है या सच्चिदानन्द की शोभा अपनी आँखों से
देखने के लिये उसने सहज ही देह धारण किया रहता है। उसकी भेंट होने के लिये सहस्र भाग्य होना चाहिये
ऐसा कहते-कहते शायद उससे भेंट हो जाय लेकिन ऐसी भी बात नहीं है। सद्गुरु जिधर भी दृष्टिक्षेप करता है,
उधर सुख की ही सृष्टि उत्पन्न होती है। वह जहाँ कहता है वहाँ महाबोध स्वानंद से रहता है। उस सद्गुरु के
चरण दिखायी देते ही भूख-प्यास तत्काल नष्ट हो जाती है। कल्पना तो उठ ही नहीं सकती। सारांश गुरु के
चरणों में निजसुख निवास करता है। उस सद्गुरु का लक्षण बताते समय शब्द रुक जाते हैं। जो सनातन पूर्णब्रह्म
है उसे लक्षण की क्या आवश्यकता है? फिर भी एक लक्षण बतलाने की स्फूर्ति आती है। वह यह कि उसमें
सर्वत्र शान्ति दिखायी देती है। शान्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं दिखायी देती। उद्धव! वह शान्ति ही
समाधान है। शान्ति ही ब्रह्मज्ञान है और शान्ति ही पूर्णब्रह्म है यह जान लो। सद्गुरु की ऐसी स्थिति जानकर
शिष्य के मन में गुरुभक्ति के प्रति प्रेम और भी अधिक बढ़ गया। इसलिए वह गुरु की खोज में निकल पड़ा
उसका अंतःकरण उसे विश्राम नहीं दिला रहा था। आठों पहर गुरु का ही लक्षण गुरु का ही ध्यान वह करने
लगा। उस सर्व समर्थ को मैं कब देख पाऊँगा? मेरा यह पाश कब छूटेगा? मन को शान्ति कब और कैसे प्राप्त
होगी? इस प्रकार वह सद्गुरु के लिये पागल हो गया। देखते-देखते यह आयु समाप्त हो गयी लेकिन मेरी
अभी सद्गुरु से भेंट नहीं होती, यह मनुष्य देह समान होते ही सब कुछ डूब जायेगा ऐसा उसे लगने लगता है।
गुरु का नाम सुनने मात्र से ही वह मन से आगे भागने लगता है और उस वार्ता के ही गले लग जाता है। उसकी
आतुरता अत्यधिक बढ़ जाती है। यदि सद्गुरु से प्रत्यक्ष भेंट नहीं होती तो वह मन से ही गुरुनाथ की पूजा
करने लगता है और परमभक्ति से पूजा करते समय उसका प्रेम इतना अधिक उफन उठता है कि वह हृदय में
नहीं समा पाता। सद्गुरु से भेंट करने के लिये वह तीर्थ और तपोवन भटकता रहता है। नित्यकर्म करते समय
भी वह एक क्षण के लिये गुरु को नहीं भूलता। सद्गुरु की प्राप्ति हो इसलिये वह हर छोटे बड़े की पूजा करने
लगता है। मेरा गुरु मुझे मिले इसलिये वह ब्राह्मणों का अत्यधिक सत्कार करता है। वह भालू की तरह निरन्तर
'गुरु-गुरु' का जप करता रहता है। गुरु के अतिरिक्त वह अन्य किसी का चिन्तन नहीं करता। उठते-बैठते खाते
समय, सोते समय कभी भी मन में गुरु का विस्मरण नहीं होने देता। जागृति में तथा स्वप्नावस्था में भी उसे गुरु
की चिन्ता लगी रहती है। कैसी विचित्र बात है। केवल गुरु का स्मरण करते ही उसकी भूख-प्यास समाप्त हो
जाती है। वह घर-बाहर के सुख को भूल कर सदा परमार्थ की ही ओर उन्मुख रहता है। सद्गुरु के प्रति
जिसका इतना प्रेम रहता है, उसकी आस्था स्पर्धा से बढ़ती ही जाती है। उसे गुरु के रूप में तत्काल मैं ही दर्शन
देता हूँ। उत्कंठा जितनी अधिक रहती है, उतनी ही भेंट अधिक निकट होती है। भेंट के लिये साधनों में 'विशेष
उत्कंठा' यही प्रमुख साधन है। अन्य कितने ही बड़े साधनों का प्रयोग क्यों न करें लेकिन उससे आत्मज्ञान का
दसवाँ अध्याय २३९
अल्पांश भी हाथ नहीं लगेगा लेकिन यदि सद्गुरु के भजन में प्रवृत्त होंगे तो आत्मज्ञान की राशियाँ सामने लग
जायेंगी। मोक्ष भी चरणों पर गिर पड़ेगा। लेकिन गुरु का भक्त उसे भी स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह चरण
सेवा में ही तल्लीन रहता है। श्रीगुरुचरण का आकर्षण ऐसा विचित्र है कि उसके सामने मोक्षसुख का भी
विस्मरण होता है। जिसकी रुचि गुरुभजन में नहीं होती वही संसार के बन्धन में पड़ते हैं। संसार का बंधन
तोड़ने के लिये सद्गुरु की ही सेवा करना आवश्यक है। सद्गुरु की सेवा ही मेरा भजन है। क्योंकि गुरु में और
मुझमें कोई भेदभाव नहीं है। इस प्रकार गुरु भक्तों की श्रद्धा कितनी असीम होती है और उन्हें गुरुभजन के प्रति
कितना प्रेम रहता है उसे मैंने अपनी रुचि से स्पष्ट किया। कृष्ण कहते हैं, हे उद्धव! अब इसी प्रवाह में मैं तुम्हें
शिष्यों के लक्षण बताता हूँ।
अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृदः।
असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक् ॥६॥
जाल में फँसी हुई मछली जिस प्रकार छटपटाती है उसी प्रकार मान-सम्मान का प्रसंग आते ही सच्चा
शिष्य संकट में पड़ जाता है। हौवा का नाम सुनते ही जिस प्रकार बच्चा घबरा उठता है उसी प्रकार सम्मान की
बात सुनते ही भय से उसे संकट का आभास होता है। तेज हवा के झोंके से जिस प्रकार केले का वृक्ष काँपने
लगता है अथवा उफनती हुई लहरों के कारण पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब काँप उठता है, उसी प्रकार सम्मान को
वह आँख से भी नहीं देखना चाहता। बड़प्पन को वह एक बड़ा संकट मानता है और वह उसे अपने तक नहीं
आने देता। प्रेम से सम्मान स्वीकार करने से देहाभिमान दृढ़ होगा इसलिये वह मान अभिमान छोड़ कर सदा हीन
दीन होकर रहता है। मेरा नामरूप नष्ट हो जाय और कोई मेरी ओर न देखे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो ऐसा उपाय वह
करने लगता है। लौकिक को देखकर वह उद्विग्न हो उठता है, शरीर से और घर से वह ऊब जाता है, अकेलापन
ही उसे अच्छा लगता है इसलिये वह द्वैत का संग ही नहीं करता। उसके मन में यही अभिलाषा रहती है कि कोई
मुझे न देखे, कोई मुझे न पहचाने, कोई मुझसे न शरमाये। चोर पीछा करता है उस समय जिस प्रकार धनवान
व्यक्ति संकट के कारण छिप कर बैठ जाता है उसी प्रकार मान-सम्मान देखते ही वह देह में उपेक्षा का भाव
रखकर छिप जाता है। लोगों के बीच मैं भी हूँ यह कोई न जान पाये ऐसी स्थिति में वह रहता है इसलिये उसे
मान-सम्मान सहन नहीं होता। अहं की ममता छोड़ने के लिए वह मान-सम्मान की ओर नहीं देखता क्योंकि
कहीं उसे ग्रहण करने से अहं भाव स्थायी हो जायेगा ऐसा उसे लगता है। जिसके उदर में अभिमान समाया रहता
है वे ही हमेशा सम्मान की अपेक्षा करते रहते हैं। जो उस अभिमान को ही छोड़ने के लिये तैयार हो जाता है वह
मान-सम्मान की ओर नहीं देखता। जिसने सम्मान प्राप्त किया है उसे अपमान सहन नहीं होता अतः वहाँ सहज
ही देहाभिमान उत्पन्न होता है। इसलिये उसे सम्मान ही अच्छा नहीं लगता। वास्तव में देखा जाय तो ज्ञाता पुरुष
सम्मान प्राप्त करने की लालसा से ही अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता रहता है। इसमें आर्थिक स्वार्थ का लोभ भी
मन में रहता है। सारांश यही कि सम्मान की इच्छा न रखना ही शिष्य का पहला लक्षण है। अब 'निर्मत्सरता' का
लक्षण भी बताता हूँ, सुनो। ज्ञान की ईर्षा के कारण भी ज्ञानियों में परस्पर बैर उत्पन्न होता है। वहाँ अपने देह के
प्रति अभिमान पूरी तरह घर बनाकर बैठ जाता है। ज्ञान के अभिमान की कथा का क्या वर्णन किया जाय? असीम
तपश्चर्या कर विश्वामित्र दूसरी सृष्टि का निर्माण कर रहा था क्योंकि उसके मन में ज्ञान का अभिमान था। दुर्वासा
को भी ज्ञान का अभिमान था इसलिये उसने अम्बरीष को व्यर्थ ही शाप दे दिया। उसके शाप के भय से मैंने
२४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
गर्भवास सहन किया। ब्रह्मदेव को भी ज्ञान का अभिमान हुआ और उसने गोपाल वत्सों का हरण किया। ज्ञान के
अभिमान के भय से मुझे उनका रूप धारण कर रहना पड़ा। हे उद्धव! सभी प्रकार के अभिमानों में ज्ञान का
अभिमान बहुत कठिन है। वसिष्ठ और विश्वामित्र ज्ञानाभिमान के ही कारण परस्पर लड़ रहे थे। ऐसे ज्ञानाभिमान
के भय से ही मैं ग्वाला बना। याज्ञिक ब्राह्मणों ने तो मुझे मूर्ख कहा क्योंकि उन्हें कर्म का और ज्ञान का अभिमान
था। जब मेरी ही यह अवस्था है तो दूसरों के बारे में क्या कहा जाय? ज्ञानाभिमान के पाश से ज्ञानी जन
सरलतापूर्वक छूट नहीं पाते और ज्ञानाभिमान की जाति भी क्या है? वह मूर्खों के पास खड़ा नहीं रहता। ज्ञानियों
में ही बैर उत्पन्न कर ईर्ष्यापूर्वक रहता है। सारांश यह कि जिसे ईर्ष्या के बिना रहना है उसे ज्ञान का अभिमान
त्याग देना चाहिये। अन्यथा वह ज्ञानियों को ईर्ष्या से रहने को बाध्य करता है। अब ईर्ष्या की सामग्री के बारे में
सुनो। वह देह में देहाभिमान को दृढ़ करता है, ज्ञान का सहारा लेता है और द्रव्य की आशा से उसमें लोभ भी
घुस जाता है। जिसके पास इतनी सामग्री एकत्र हो जाती है वही ईर्ष्या के साथ द्वेष को चलाता है। सच्चे शिष्य को
यह सहन नहीं होता। वह ईर्ष्या का त्याग ही कर देता है। ईर्ष्या भी कैसी है? वह सदा ज्ञानी के ही पास रहती है।
पण्डितों में ईर्ष्या जबरदस्त होती है। वे इस जन्म में उसे नहीं छोड़ते। जितने भी पण्डित दिखायी देते हैं वे सब
ईर्ष्यालु ही होते हैं। वे दिखाने के लिए अत्यन्त विनम्र होकर मीठी बातें करते हैं। लेकिन उनकी बातें ईर्ष्या तथा
दूसरों के छल से भरी रहती हैं। ईर्ष्या के कारण पण्डित क्रोध करते हैं और एक-दूसरे पर गन्दे आरोप लगाकर
निन्दा करते रहते हैं। ईर्ष्या की ऐसी बाधा सच्चे शिष्य को कभी स्पर्श नहीं करती। जब ज्ञानीजनों को भी ईर्ष्या
नहीं छोड़ती तो औरों की क्या बिसात है? किन्तु शिष्य तो द्वेष की बात ही नहीं करता और ईर्ष्या को समूल तोड़
देता है। वास्तव में शिष्य को ईर्ष्या को छोड़कर ही रहना चाहिये। बिना ईर्ष्या के रहने के सम्बन्ध में एक कथा
सुनाता हूँ, सुनो। उसके सामने से कोई लाभ ही वस्तु छीन कर भी ले जाए तो वह मन में द्वेष भाव उत्पन्न नहीं
होने देता। समस्त प्राणियों में ईश्वर का वास है यह भावना मन में होने के कारण उसे द्वेष हो ही नहीं सकता।
दुर्जन निन्दारूपी वाग्बाण उसे कितना ही क्यों न बींधे लेकिन वह मन में द्वेष नहीं उत्पन्न होने देता। निन्दा में वह
अपना हित ही मानता है। जिसने मेरी निन्दा की है उसे वह हित चाहनेवाली माँ के समान समझता है। उसने मेरे
पापों का मल धो डाला है और मेरी वृत्ति निर्मल कर दी ऐसा ही वह मानता है। ऐसे विचारों से वह अपने मन को
द्वेष का स्पर्श नहीं होने देता। इसे ही 'मत्सररहित' होना कहते हैं और यह शिष्य का दूसरा लक्षण है। इसके बाद
तीसरा लक्षण है, 'दक्षता' जिसके सम्बन्ध में बताता हूँ। अपना हित साधने के लिये शिष्य की 'दक्षता' कितनी
उपयोगी होती है यह तुम्हारी समझ में आयेगा। 'सावधानी' अर्थात् जागरूकता का सूर्योदय होते ही वह निद्रा तथा
तंद्रा का अन्धकार झट नष्ट कर देता है और 'धारणा' के दिन की शुरुआत हो जाती है और धृति का मध्याह्न हो
जाता है। ऐसे दिन का उदय होते ही शमदमादि समुदाय भक्ति के मार्ग पर चलने लगता है। मार्ग में क्षण भर के
लिये भी नहीं रुकता। वहाँ पग-पग पर निजबोध का प्याऊ रहता है जहाँ राह चलने वालों की प्यास तो मिटती
ही है साथ ही तृषा की तृष्णा भी शान्त हो जाती है। इस मार्ग में गाँव के लोग (संत) मिले और वे 'सोहं' की
भावना से एक साथ हो लिये। इससे आगे का मार्ग चूकने का भय ही नहीं रह जाता। वे सीधे अपने गंतव्य स्थान
पर पहुँच जाते हैं। हे चतुर उद्धव, सुनो! 'आलस्य' या 'विलम्ब' मन को स्पर्श न करे इसी का नाम है 'दक्षता'।
यही शिष्य का तीसरा लक्षण है। पहले का पुराना संग्रह उसके पास था उसकी ममता भी वह छोड़ देता है और
आत्मज्ञान के अनुभव से उसे छोड़ने का दुःख भी उसे नहीं होता। देह के प्रति 'अहं' को दृढ़ करने से देह के
प्रति ममता जगती है। जब मन को देहाभिमान ही स्पर्श न करे तो ममता उसी क्षण नष्ट हो जाती है। शरीर
दसवाँ अध्याय २४१
मलमूत्र की गठरी है और नाशवान है यह तो दिखाई ही देता है इसलिये उसके प्रति होने वाला अहंकार नष्ट
होकर, उसके स्थान पर 'सोहं बुद्धि अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ' यह भावना दृढ़तर हो जाती है। सोहंभावना को दृढ़
बना कर उसने अहंभाव तथा ममता का त्याग किया रहता है। शिष्य के मन की यही 'निर्ममता' उसका चौथा गुण
है। शिष्य का हित साधने के काम में गुरु ही माता है, गुरु ही पिता है, सगे-सम्बन्धी भी गुरु ही हैं और बन्धु और
सुहृद भी गुरु ही हैं। गुरु की सेवा यही उसका नित्यकर्म है, गुरु सेवा ही उसका सच्चा धर्म है, गुरु ही आत्माराम
है, उसी प्रकार सुहृद का सारा गौरव भी सद्गुरु ही है। उसी प्रकार सद्गुरु को ही अपना हितैषी मानना चाहिये।
हे उद्धव! सद्शिष्य का यही पाँचवाँ लक्षण है। चित्त को वह कभी विचलित नहीं होने देता। सभी प्रकार से
सर्वकाल वह आत्मा में ही निश्चल रहता है। शरीर भले ही चंचल हो जाय लेकिन उसका चित्त गुरुचरण में ही
अटल रहता है। शरीर व्यापार चलता रहता है लेकिन उसके हृदय में कोई गड़बड़ी उत्पन्न नहीं होती, गुरुचरणों में
जो ऐसी निश्चलता रखता है वही सच्चा परमार्थी शिष्य है। जिसके हृदय में चंचलता होती है वह स्वहित साधने
वाला शिष्य है ही नहीं। जिसके हृदय में निश्चलता वास करती है वही परमार्थ का साधक है। इस प्रकार की
निश्चलता धारण कर जो अपने सच्चे हित की इच्छा रखता है, वही गुरुपदेश से एक क्षण में परमार्थ का पात्र हो
जाता है। जिस प्रकार एक दीपक से दूसरा जलाने पर वह भी उसकी ही तरह हो जाता है, उसी प्रकार निश्चल
वृत्ति के साधक को गुरु प्राप्त होते ही वह तत्काल तद्रूप हो जाता है। अर्थात् अंतःकरण की निश्चलता ही शिष्य
का श्रेष्ठ लक्षण है और वही शिष्य का छठवाँ गुण है, इसे ध्यान में रखो। इसी से षड्विकारों का विनाश होता है।
षड्विकार देह में ही होते हैं। लेकिन शिष्य देहबुद्धि को स्पर्श ही नहीं करता अतः गुरुपदेश के अनुसार आचरण
करने के कारण उसके विकार भी नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार की निश्चलता साध्य कर जो अर्थ जिज्ञासा से
परमार्थ की साधना के लिये तैयार होता है, वही गुरुचरणों को भजने लगता है। जिसे अर्थ की जिज्ञासा ही नहीं है
वह गुरु का भजन ही नहीं करेगा और अगर कभी करेगा भी तो विषय के लालच से ही करेगा। विषय का स्वार्थ
छोड़कर, पूर्ण तत्त्वार्थ जानने के लिये जो भजन करता है, उसी का नाम है 'जिज्ञासा'। ऐसी तत्त्व जिज्ञासा धारण
कर वह परमार्थ की चाह बढ़ाता रहता है। इस प्रकार स्वहित के लालच के कारण उसके चित्त को क्षणभर का भी
विश्राम नहीं मिलता। परमार्थ के प्रति नितान्त प्रेम तथा 'बढ़ती हुई आस्था' शिष्य का सातवाँ लक्षण है। यह
सातवाँ लक्षण जिज्ञासा के ही बल पर परमार्थ की दहलीज चढ़ने में सफल हुआ। अस्तु! सद्गुरु अनेक जनों के
लिये शीतल छाँह है शिष्यों की तो माँ ही है। उसके प्रति जो ईर्ष्या करेगा उसकी आत्मप्राप्ति दूर हुई समझिये।
इसलिये जो भी कोई गुरु का अनुगृहीत हो उसे गुरु समान ही मानना चाहिये। उसके चित्त को ईर्ष्या का स्मरण ही
नहीं होता। वह सबसे अत्यन्त विनम्रता से आचरण करता है। इसके विपरीत यदि कोई गुरुबन्धु कनिष्ठ हो तथा
गरीब हो, उसमें उत्तम गुण भी हों तो उसे न मानना, उस पर झूठे आरोप लगाना कुशिष्य का लक्षण है। दूसरे में
उत्तम गुण हो उसे दोष देकर उसका ज्ञान झूठा है यह कहना 'ईर्ष्या' का लक्षण है। साक्षात भेंट होने पर उसके
गुणों का स्रोत गाना विनम्र होकर उसके पैर छूना लेकिन उसके पीठ घुमाते ही उसकी निन्दा करने का नाम है
'ईर्ष्या'। 'सच्छिष्य' का आचरण इस सम्बन्ध में बिलकुल शुद्ध रहता है। वह अपने को 'ईर्ष्या' का स्पर्श नहीं
होने देता। सामने वाला उत्तम हो, मध्यम हो या साधारण हो वह सबको नमन करता है। छल उसे आता ही नहीं
है। गुरु ने उसे सर्वत्र ब्रह्मभावना धारण करने का पाठ पढ़ाया रहता है। उस पर सदा ध्यान देते हुए वह सबको
समभाव से वन्दन करता है। इस प्रकार, हे उद्धव! किसी भी प्राणी का छल करने की जानकारी न होना यही
शिष्य का 'अनसूया' आठवाँ गुण है। इन आठ मनकाओं की माला जिसके हृदयकमल में निरन्तर वास करती है
२४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वही सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त करता है। उस मिलन की अपूर्वता का क्या वर्णन किया जाय? इसके बाद का
नवाँ लक्षण भी नया ही है। व्यर्थ की बकवास छोड़कर वह सत्य और पवित्र भाषण करता है। सद्गुरु से वह
विनीत भाव से और मृदु वाणी से प्रश्न करता है और गुरु का वचन सत्य से भी सत्य है इसे भक्तिपूर्वक स्वीकार
करता है। नाना प्रकार की युक्तियों से अनेक प्रकार के मतों का प्रतिपादन कर असमय व्यर्थ की बहस करना,
पाखण्ड का सहारा लेकर महावाद का हो हल्ला करना, साधक-बाधक युक्ति की सहायता से शब्दच्छल करना
और अपनी ही शब्दक्रीड़ा पर प्रसन्न होना ये बातें शिष्य के मन में नहीं आतीं। सद्गुरु के सामने व्यर्थ की बातें
करना महान पाप है यह जानकर वह व्यर्थ की बकवास छोड़ देता है और मिथ्यावाद नहीं करता। शिष्य की बातें
कैसी होती हैं? मानों परिपक्व वाणी से निकला अमृत हो। प्रेमरस में सने शब्दों में वह एकान्त में स्वयं से प्रश्न
करता है। शरारती वादों के खट्टे कच्चे फल डंठल के साथ झड़ जाते हैं। वह प्रामाणिक तथा परिपक्व भाषण
करता है। कपटपूर्ण और मर्मभेदी भाषण करना उसे नहीं आता। दूसरे के ऐब को वह स्पर्श नहीं करता और
जिससे किसी के मन को दुःख हो या अधर्म हो ऐसी बातें वह नहीं करता। कभी व्यर्थ की शंका नहीं करता।
निन्दा के प्रति तो वह मूक ही रहता है। चाहे कोई बच्चा हो कोई अनाड़ी हो या पण्डित हो किसी को भी धोखा
देना वह नहीं जानता। उसे कर्कश स्वर में बात करना नहीं आता। दूसरों का उपहास करना उसे नहीं आता अथवा
बात करते समय वह किसी चीज की आशा भी नहीं करता। केवल निर्मल मन से और वैराग्य से वह बात करता
है। वह बैरभाव से बात करना नहीं जानता, शब्दच्छल से घिनौनी बात भी वह नहीं करता, अधिक बात करने से
वह ऊब जाता है, अधिकतर वह मौन ही रहता है। उसे वाद-विवाद या वितंडावाद नहीं रुचता, किसी से व्यर्थ
बात करना भी अच्छा नहीं लगता। वह किसी से हँसी मजाक भी नहीं करता और लौकिक बात भी नहीं करता।
उसे टेढ़ी बात करना नहीं आता, उसकी भाषा में कभी छल-कपट नहीं होता। वह किसी से प्रतारणा नहीं करता
और न झूठ ही बोलता है। मन में किसी का काम करने की इच्छा न होते हुए भी ऊपर से 'हाँ' कह कर वह उसे
धोखे में नहीं. डालता। वह सदा हरिनाम का पाठ करता रहता है। पश्चिम की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ जिस
प्रकार थोड़ी-सी हवा आने पर खड़खड़ाने लगती हैं, उस प्रकार वह व्यर्थ की बकवास कर मुँह नहीं बजाता।
शब्द ब्रह्म के सम्बन्ध में बात करते समय विपक्ष द्वारा बात काटने पर उसे सहज ही क्रोध आता है। साधक के
मार्ग में यह बहुत बड़ी बाधा है यह जानकर वह व्यर्थ की बहस नहीं करता। शब्दज्ञान का वह गर्व भी नहीं
करता अथवा मौन भी नहीं रहता। वह अपनी बात का अभिमान नहीं करता, सदैव सद्गुरु का स्मरण करता रहता
है। अपनी बात से वह किसी में उद्वेग उत्पन्न नहीं करता, स्वयं बात करने का प्रयत्न नहीं करता, बात करते समय
आवेश का प्रदर्शन नहीं करता, जिससे उद्वेग उत्पन्न न हो ऐसी ही बात करता है। सत्य, मधुर, सुनने में आल्हाद
प्रदान करने वाली तथा सब के लिये हितकर सुमधुर हरिकथा का वह निरूपण करता है। सद्गुरु की प्रार्थना करते
समय भी वह अधिक बातें नहीं करता। आत्मसुख प्राप्त करने का साधन वह एक ही शब्द में कहता है। इस
प्रकार शिष्य के ये नौ लक्षण हैं। ये नवखण्ड पृथ्वी के भूषण हैं जो नारायण ने कृपापूर्वक भक्तों को प्रदान किये
हैं। यह नवरत्नों की सुन्दर माला जो सद्गुरु के कंठ में पहनायेगा वह देखते-देखते सायुज्य सिंहासन पर आसीन
होगा। इन नवरत्नों का पदक जिस शिष्य के हृदय पर सुशोभित होगा वही सद्गुरु का निश्चयपूर्वक विश्वासपात्र
बनेगा। इन नवरत्नों का अभिनव गुलदस्ता जो सद्गुरु को भेंट स्वरूप देगा वह स्वराज्य के मुकुट का महामणि
बनकर सुशोभित होगा। उद्धव! अब तुम शंका प्रस्तुत करोगे कि पत्नी, बच्चे तथा धन धान्य से सम्पन्न शिष्य को
ऐसी निर्लोभता कैसे सम्भव होगी।
दसवाँ अध्याय २४३
जायापत्यगृहक्षेत्रस्वजनद्रविणादिषु।
उदासीनः समं पश्यन् सर्वेष्वर्थमिवात्मनः॥७॥
तो उसके सम्बन्ध में भी ध्यान देकर सुनो। शिष्य अपना दुःख नष्ट करने के लिये और आत्मसुख की
प्राप्ति के लिये विवेक के साधन साध्य करता रहता है। आत्मसुख का विचार किया जाय तो वह सारे देह में एक
समान रहता है। स्त्री और पुरुष ये दो व्यक्ति विजातीय होते हुए भी उनमें सुख अलग-अलग प्रकार का नहीं
होता। देह में भेद होते हुए भी स्त्री और पुरुष में 'आत्मा' और 'आत्मी' नहीं होते। आत्मसुख नाम की जो वस्तु
है वह प्रत्येक व्यक्ति में स्वतःसिद्ध होती है। सुख के ही लिये सब प्रपंच से लिपटे रहते हैं। लेकिन जिस पर
गुरु की कृपा होती है उसे अद्वैत निजात्मसुख का लाभ होता है। एकत्व से नित्य और निर्दोष आत्मसुख हाथ
आने पर भी, उसे नष्ट करने के लिये जो द्वैत की इच्छा करता है वह महामूर्ख है। यदि प्रपंच में ही सुख होता तो
सनकादिक जैसे लोगों ने उसका त्याग क्यों किया होता? क्योंकि द्वैत नाम से जो भी कुछ है वह पूर्णतयः
दुःखमय ही है और अद्वैत में परमसुख है। यही ज्ञान सम्पादन करने के कारण साधक स्त्री, बच्चे, सगे-सम्बन्धी,
सम्पत्ति आदि के प्रति उदासीन हो गये और अद्वैत में ही उनका मन रमा। फिर कैसा घर, कैसा खेत? स्त्री और
बच्चों को भी कौन पूछता है? तरह-तरह के धनधान्य से समृद्ध होते हुए भी 'वह भी मेरा' और 'देह भी मेरा'
ऐसी बात वह नहीं करता। हे उद्धव, सुनो। इस प्रकार मेरे भक्त तत्त्व विचार से लिपटे होने के कारण वे संसार के
प्रति उदासीन रहते हैं। वे गुरु के चरणों से लिपट कर प्रपंच पर झाडू लगा देते हैं और आत्मसुख देने वाले
गुरुराया के भजन में भक्तिभाव से तल्लीन रहते हैं। वह आठों पहर गुरु की ही सेवा करता रहता है। निरन्तर
भक्तिभाव से वह अपना अंतःकरण गुरु के चरणों में ही समर्पित कर देता है। हे उद्धव! अब तुम कहोगे 'देह के
सिवा भिन्न ऐसी कौन सी वस्तु देख कर उसे आत्मसुख प्राप्त होता है? और विदेहपन का अनुभव कैसे आता
है? तो देह में रह कर विदेहता तथा प्रपंच में रहकर शिष्य को अद्वैतता कैसे प्राप्त होती है, उसकी कथा सुनो।'
विलक्षणःस्थूलसूक्ष्माद् देहादात्मेक्षिता स्वदृक्।
यथाग्निर्दारुणो दाह्यात् दाहकोऽन्यः प्रकाशकः॥८॥
आत्मा स्थूल तथा सूक्ष्म देह से सदासर्वदा भिन्न है। इस भिन्नता के साथ ही वह हर समय प्रपंच में विचरण
करता रहता है। दोनों देहों में जीव विचरण करता है उस समय भी जीवों में देहातीत भाव का स्फुरण होता रहता
है। लेकिन उन्हें इसका अनुभव नहीं होता। वह कहता है, 'मेरी आँख में दर्द है' लेकिन नहीं जानता कि 'मैं ही
दर्द कर रहा हूँ' वह कहता है 'मेरा पैर टूट गया' लेकिन यह नहीं कहता है कि मैं ही टूट गया हूँ। इस प्रकार देह
में विचरण करते हुए भी मैं देह से भिन्न हूँ, ऐसी बात करता है। लेकिन भ्रान्ति के कारण मनुष्य को उसकी
देहातीत अवस्था का अनुभव नहीं होता। द्रष्टा अर्थात् देखने वाला कभी दृश्य अर्थात् देखने की वस्तु नहीं हो
सकता। देखने की वस्तु अर्थात् दृश्य जड़ होता है और देखनेवाला अर्थात् द्रष्टा उस दृश्य को चेतना करने वाला
अर्थात् जानने वाला होता है। इसीलिये आत्मा देह से विलक्षण अर्थात् विपरीत लक्षण वाला होता है। आत्मा दो
कारण से विलक्षण है। एक तो देखने वाले की दृष्टि से तथा दूसरा स्वप्रकाशकत्व से स्वसंवेद्यत्व से। इसलिये वह
दोनों देहों से विलक्षण अर्थात् बिलकुल भिन्न है। दृश्य से द्रष्टा भिन्न है। तो फिर वह मन है ऐसा चार्वाक का मत
है। आत्मा को मन नहीं कह सकते क्योंकि ग्यारह इन्द्रियों में आत्मा को भी एक इन्द्रिय माना गया है। इन्द्रिय होने
के कारण वह जड़ है। इसीलिए मन आत्मा नहीं है। प्रपंच में मन की दक्षता दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में
२४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह मन की दक्षता नहीं होती। जिस प्रकार प्राण के बिना राजा को भी अपना वैभव कभी दिखाई नहीं पड़ेगा,
शस्त्र के एक प्रहार से लौह बख्तर के भले ही टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाएँ लेकिन वह सामर्थ्य शस्त्र का नहीं
अपितु वह वीर का बल है। लोहे के बड़े गोले को यदि आग में डाला जाय तो वह तप्त होकर ज्वालाएँ निकलने
लगती हैं। लेकिन वह लोहे का सामर्थ्य नहीं है। उस लोहे की ही तरह मन भी जड़ है। ज्ञानप्रभा उसे प्रकाशित
कर, उसे श्रेष्ठत्व प्रदान कर प्रकृति में प्रवर्तन कराती है। मुरली के द्वारा सुमधुर गायन किया जाय या नाना प्रकार
के सुर निकाले जाएँ तो वह मुरली का गुण नहीं बल्कि बजाने वाले का कौशल है। उसी प्रकार मन का व्यापार
पराधीन ही समझो। उसका वह व्यापार स्वतंत्र नहीं होता क्योंकि मन जड़ है। सूर्य किरण का स्पर्श होते ही
सूर्यकांत में से अग्नि निकलता है, उसी प्रकार आत्मा के प्रकाश से मन अत्यन्त तीव्रता से विचरण करता रहता है।
जड़त्व के कारण ही मन जड़ है और आत्मा स्वप्रकाश से प्रकाशधन है। इसलिये मन आत्मा के अधीन है और
आत्मा आत्मत्व के कारण स्वतंत्र है। 'मेरा मन' इस प्रकार वह कहता है लेकिन 'मैं ही मन हूँ' ऐसा नहीं कहता।
इसलिये मन से आत्मा भिन्न है। वह अलग रहकर साक्ष्य के रूप में रहता है। दोनों देहों से भिन्न इस दृष्टि से
आत्मज्ञान साध्य कर शिष्य की देहबुद्धि का छेदन किया रहता है। इसलिये देहात्मवादी लोग जो उपाधि को सत्य
मानते हैं वे वास्तव में उसे मिथ्या सिद्ध करते हैं। अर्थात् यह शुद्ध, सात्त्विक बुद्धि नहीं है। तुम कहोगे कि मन से
अलग रहने वाला वह आत्मा ब्रह्मदेव होगा। क्योंकि वह सभी देवताओं में श्रेष्ठ है। लेकिन यह संदेह भी तुम मन
में धारण न करो। कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्मदेव भी मूढ़ ही था। वह सृष्टि की उत्पत्ति नहीं कर सका। उसकी बुद्धि
जड़ थी। उसे सावधान कर मैंने ही उसे आत्मज्ञान दिया। तब वह ज्ञानसम्पन्न होकर सृष्टि की उत्पत्ति कर सका।
केवल नाभिकमल में जन्म लेनेवाला ब्रह्मदेव मेरा बालक है। वह मेरे पेट पर ही खेलता है। वह विशुद्ध आत्मा
नहीं है। देवताओं का जो भी समुदाय है वह मुझसे ही प्रकाश प्राप्त करता है। सर्वप्रकाशक तथा अनादि ईश्वर मैं
हूँ, स्वयंप्रकाश-स्वभावी आत्मा मैं हूँ। दो देह और मन इनसे आत्मा बिलकुल भिन्न है। हिरण्यगर्भ अर्थात् ब्रह्माण्ड
के सूक्ष्म देह से भी आत्मा बिलकुल भिन्न है। हे भक्तोत्तम उद्धव! हिरण्यगर्भ यही परमात्मा है ऐसी भी बात नहीं
है क्योंकि हिरण्यगर्भ की आत्मा भी मैं ही हूँ। उसमें मेरी महिमा कहाँ से आयेगी? सारांश यह कि हिरण्यगर्भ की
उपासना भी एक साधन के रूप में ही करनी चाहिये लेकिन वह मायास्वरूप होने के कारण उसे सच्ची आत्मा का
स्वरूप नहीं प्राप्त होगा। जिस ढंग से वह विलक्षणता प्राप्त होती है उसके सम्बन्ध में भक्तों को वह दृष्टांत देकर
अभिव्यक्त करता है। अग्नि काष्ठ में ही रहता है लेकिन काष्ठ बन कर नहीं रहता। लकड़ी पर लकड़ी का घर्षण
करने से वह प्रकट होता है और तत्काल ही उन लकड़ियों को जला देता है। उसी प्रकार आत्मा भी देह में ही
रहता है लेकिन वह देह बनकर नहीं रहता, वह जब ब्रह्मज्ञान से प्रकाशित होता है तब वह अनायास ही देहभाव
को जला देता है। जिस प्रकार एक ही जगह रहकर दाह्य पदार्थ से दाहक भिन्न होता है उसी प्रकार प्रकाशित की
हुई वस्तु से स्वप्रकाश भिन्न होता है। अग्नि के दृष्टांत से आत्मा का सच्चा स्वरूप नित्यत्व और निजात्म बोध से
सिद्ध होता है। काष्ठ के संयोग से ही अग्नि को जन्म, नाश, नाम और रूप प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार आत्मा को
भी देह के कारण ही विकारभाव प्राप्त होता है।
निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान् गुणान्।
अन्तःप्रविष्ट आधत्त एवं देहगुणान् परः ॥९॥
अनेक प्रकार के काष्ठ एकत्र होने के कारण जगत को अग्नि में काष्ठ के गुण समाविष्ट हुए दिखाई देते हैं
लेकिन अग्नि उनसे अलिप्त ही रहता है। लकड़ी पर लकड़ी रगड़ने से जब अग्नि बाहर आता है तो अग्नि
उत्पन्न होने की बात की जाती है। उसी प्रकार लकड़ी के आकार की तरह वह छोटा बड़ा हुआ दिखाई देता है।
अग्नि लकड़ी के आकार की तरह तिकोना, गोल तथा वक्र होने का आभास होता है और उसमें की लकड़ियाँ
पूरी तरह जल जाने पर आग नष्ट हो गयी ऐसा कहा जाता है। उसी प्रकार अजन्मा, शाश्वत तथा अव्यय आत्मा
को भी देह का ही आकार, विकार, जन्म, नाश आदि मिथ्या विशेषण लगाये जाते हैं। अग्नि का दृष्टांत देकर जो
बात उद्धव को बतायी वह शायद उसे न जँचे इसलिये श्रीकृष्ण ने वही निरूपण बताना प्रारम्भ किया। उन्होंने
कहा, "हे उद्धव! तुम कहोगे कि अग्नि का और काष्ठ का संयोग यह बात मूलतः ही सिद्ध है, इसलिये लकड़ी
का धर्म अग्नि को लगता है यह बात मैं मानता हूँ किन्तु आत्मा मूलतः ही नित्यसिद्ध तथा अविकारी है। वह
स्वयं गगन को भी स्पर्श नहीं करता फिर उसे देह का संग कैसे स्पर्श करेगा? और उसके कारण वह विकारयुक्त
कैसे होगा ? आत्मा का देह से संग होता है यह बात ही मिथ्या है। कभी न घटने वाली यह बात अगर होगी तो
वह देहबुद्धि में ही होगी और जो देहबुद्धि में मिलेगा वह विशुद्ध देहधारी ही हो जायेगा। फिर उससे देहबुद्धि का
त्याग कैसे सम्भव होगा ? यही शंका मन में आती है।" श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, "ऐसी शंका तुम्हारे मन में
आयेगी इसलिये तुम मन ही मन इसका विचार सुनो। हे जगच्छ्रेष्ठ भक्त ! यह बात केवल शाब्दिक चतुराई से
हाथ नहीं आयेगी। मेरी यह अत्यन्त गोपनीय बात है। वह केवल तुम्हें सुनाता हूँ।"
योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि।
संसारस्तन्निबन्धोऽयं पुंसो विद्याच्छिदात्मनः ॥१०॥
सुनो उद्धव! पुरुषोत्तम नाम का जो पुरुष है, जिसमें माया के सारे गुण हैं, शास्त्रों ने जिसे 'ईश्वर' का नाम
दिया है, उस ईश्वर की ही वह माया जिसे जीव को संसार में लाने और भ्रम बढ़ाने जैसे अनेक कार्यों के लिये
उत्पन्न किया है उस माया में ही जो चैतन्य प्रतिबिम्बित हुआ है, उसे ही 'जीव' कहते हैं। जिस प्रकार मूर्ख
व्यक्ति को गढ़े के जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब डूबा दिखाई देता है, वैसा ही है यह। लेकिन चन्द्रमा गढ़े को
छुए बिना आकाश में ही अलिप्त रहता है। उसी प्रकार आत्मा भी अविद्या से अलग ही है। जब अविद्या
प्रतिबिम्ब को स्पर्श नहीं करती तो वह बिम्ब को कैसे स्पर्श करेगी? 'अहं' के प्रति लगन वासना की आसक्ति से
उत्पन्न लिंग शरीर माया के वश में अनेक अनर्थ उत्पन्न करता है। लिंगदेह बलवान होने पर विषयभोग का मूल
कारण बनता है। लेकिन लिंगदोह स्थूल भोग नहीं कर सकता। सूक्ष्मभूतसमूह ही स्थूल भूताकार बनता है। इसके
अनंतर पंचमहाभूतों से स्थूल देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार दोनों देहों का जन्म होता है। इन दो देहों के बीच
विचरण करते समय जीव की देहबुद्धि दृढ़ हो जाती है। इससे अहं ममता बढ़ती है और वह यह भूल जाता है
कि मैं वास्तव में कौन हूँ। आत्मसुख की मधुरता समझ में नहीं आती, इसलिये विषय के प्रति आसक्ति बढ़ती
है। वह पापपुण्य का हिसाब जोड़ने लगता है, इस प्रकार सुबुद्ध रहते हुए भी पैर में बंधन पड़ जाता है। 'देह' ही
मैं हूँ यह भावना दृढ़ होने के बाद देह के धर्म अर्थात् स्थूल, कृश आदि की उसे लगन हो जाती है और वह
वर्णाश्रम के धर्म सच मानने लगता है और फलवैभव की इच्छा कर कर्म का आचरण करने लगता है। कोई
सार्वभौम राजा अपने मन्दिर में पुष्पशैया पर सोया रहता है, वही स्वप्न में किसी अंत्यज के घर अन्न की भीख
माँगने जाता है। भीख का टुकड़ा मिले इसलिये वह उस नीच से कहता है, "अरे! तुम सचमुच राजा हो"
लेकिन वह भूल जाता है कि वह स्वयं राजा है। स्वप्न में वह स्वयं को भिखारी ही मानता है। उसी प्रकार अपनी
निजात्मता को भूलकर वह देवताओं से फल की आकांक्षा करने लगता है। लेकिन उसे इस बात का स्मरण भी
२४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं होता कि मैं देवताओं का भी देवता हूँ। उस स्वप्न के अभ्यास के कारण वह राजा, 'मैं भिखारी' कह कर
चिल्लाता रहता है। वह सुनकर सेवक लोगों को हँसी आ जाती है और वे कहने लगते हैं, राजा साहब स्वप्न में
बड़बड़ा रहे हैं। वे गहरी मूर्च्छा में घिरे रहते हैं। नींद में वे इधर-उधर डोलते रहते हैं। उन्हें होश भी नहीं रहता
कि वे निर्वस्त्र हैं या उनके शरीर पर कोई कपड़ा भी है। नींद में वे खुर्राटे भरते रहते हैं। पुरोहित उसे थपकी देता
है तब कहीं विस्मित होकर वह जागता है और शरीर को वस्त्र से ढँकता है। 'स्वप्न में मैं भिखारी था' यह कहने
में भी उसे लज्जा होती है उसी प्रकार अविद्या रूपी निद्रा की तंद्रा में वह 'मैं देहधारी' मैं कर्मदरिद्री, मैं श्रीमान्,
मैं ज्ञाता, मैं महान जैसी बातें देहात्म भाव के कारण करने लगता है। उस उनींदी अवस्था में कर्माकर्म पाँव
पसारने लगते हैं। देह के मोह के कारण ही जहाँ भ्राँति फैली हो वहाँ हित-अहित का कौन विचार करता है ?
वह उसी प्रकार गहरी मूढ़ अवस्था में करवटें बदलता रहता है। लालचवश वह 'मैं' और 'मेरा' की रट लगाता
रहता है। इस प्रकार करवट बदलकर लेटते हुए वह गुरु के चरणों पर गिर पड़ता है। उसे पास आये देख श्री गुरु
उस पर कृपा कर उसे निजबोध से थपथपाते हैं। 'ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) की वाणी एक बार कान तक पहुँचते
ही उसकी अविद्यारूपी निद्रा भाग जाती है और वह तत्क्षण जाग उठता है। जागते ही वह आश्चर्यचकित हो
उठता है और 'मैं मेरा देह' कहने में लज्जित होता है। वह देहकर्म की निन्दा करता है और कर्मातीत जो ब्रह्म हैं
वह 'मैं हूँ' कहने लगता है। संसार पाश में बँधने के कारण अविद्या ही है। उसे काटने का एकमेव शस्त्र
ब्रह्मविद्या ही है। ब्रह्मविद्या अविद्या को निरस्त करती है इसलिये वह अवश्य ही ब्रह्म से भिन्न होगी और इसे भिन्न
कहने से अद्वैतपन टूटता है यह कहोगे तो यह सिद्धान्त टिकने वाला नहीं है। अज्ञान से ही प्रपंच का विस्तार
हुआ है। उसमें ज्ञान की और अज्ञान की सूक्ष्म राहें हैं। काँटे से काँटा निकाल देने से सारी झंझट समाप्त हो जाती
है। अविद्या जीव को बन्धन में फँसाने वाली है तो ब्रह्मविद्या बन्धनों को काटने वाली है। उनके बारे में तुम्हें
विस्तार से बताया। अब वही ब्रह्मविद्या किस प्रकार हमें प्राप्त हो सकती है, उसके सम्बन्ध की पूर्वपीठिका का
विवेचन करता हूँ, सुनो।
तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम्।
संगम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम् ॥ ११ ॥
उद्धव ! इसीलिये जिज्ञासु को चित्त को सदा स्थिर रखना चाहिये जिससे सत्यासत्य विभाग द्वारा विवेक
जागृत होता है। उसमें जितना असत्य होगा उतनी ही अविद्या होगी। उसके कारण ही जीव को नितांत पीड़ा होती
है। उसका समूल विनाश करने के लिए 'सद्विद्या' प्राप्त करनी चाहिये। सद्विद्या साध्य करने के बाद सद्वस्तु
(परब्रह्म) अधिक दूर नहीं है। वह अपने स्थान पर, इसी देह में कूट-कूट कर भरा है। शरीर इन्द्रियों के समुदाय
में ब्रह्म व्याप्त रहता है किन्तु वह व्याप्त होते हुए भी अलिप्त और अपने स्वभाव के अनुसार मुक्त रहता है।
सद्विद्या साधकर तथा आत्मानुसंधान कर साधक को दोनों देहों का निराकरण कर लेना चाहिये। स्थूल देह नश्वर
होने के कारण मिथ्या ही होता है और सूक्ष्म देह वासनामय कल्पित है। उस कल्पना को भी मिथ्यत्व आता है
इसलिए जो शेष रह जाता है वह केवल निर्विकल्प ब्रह्म ही है जिस प्रकार आकाश में प्रचण्ड मेघ पंक्ति एकत्र
होकर अपने ही सामर्थ्य से पर्जन्यवृष्टि करते हैं किन्तु शरद ऋतु के अन्त में वे ही आकाश में लुप्त हो जाती हैं,
उसी प्रकार देह में जो आत्मबुद्धि दृढ़ हुई रहती है वही विवेक का उदय होते ही नष्ट हो जाती है। जुगनू के
प्रकाश की ज्योति सूर्य को कैसे दिखाई देगी ? उसी प्रकार ब्रह्मविद्या का उदय होने पर देह की सच्चाई कैसे टिक
दसवाँ अध्याय २४७
पायेगी ? रस्सी की जगह साँप का जो भ्रम हुआ था उसकी सत्यता मालूम होने पर साँप का आकार समाप्त हुआ
और वह डोर के रूप में ही शेष रहा। विवेक के निर्णय के अनुसार जब साँप का भास उड़ जाता है, उसी प्रकार
ब्रह्म के सत्य के सामने देह का सत्यत्व शेष नहीं रह जाता। नरदेह का आश्रय लेकर ब्रह्मविद्या का विकास होता
है। उसका जन्मस्थान देह है, उसी का निर्मूलन वह कैसे करेगा ? उद्धव ! इस प्रकार की शंका शायद तुम्हारे मन
में आयेगी तो उसके समाधान के लिये तुम्हें अग्नि की उत्पत्ति का दृष्टांत सुनाता हूँ।
आचार्योऽरणिराद्यः स्यादन्तेवास्युत्तरारणि।
तत्संधानं प्रवचनं विद्यासंधिः सुखावहः ॥ १२ ॥
दो लकड़ियों को एक-दूसरे पर रगड़ने से उस घर्षण से अग्नि उत्पन्न किया जाय तो वह उन लकड़ियों को
ही जला देता है और अग्नि के रूप में प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार ब्रह्मविद्या गुरुशिष्य के संवादरूपी मंथन
से उत्पन्न होती है। उस मंथन का निरूपण ध्यान देकर सुनो। उसमें गुरु 'आद्य अरणि' अर्थात् अग्नि उत्पन्न करने
वाली नीचे की लकड़ी है और शिष्य 'उत्तरारणि' अर्थात् ऊपर का काष्ठ है, उपदेश 'मंथा' अथवा मथनी है। गुरु
शिष्य का संवाद मंथन क्रिया है। इस प्रकार मंथन करना चाहिये। इस मंथन में अर्थात् संवाद में शिथिलता आयी
तो ज्ञानाग्नि उत्पन्न नहीं होगा। स्वयं से ही विडम्बना होकर किये कराये पर पानी फिर जायेगा। आलस का मार्ग
स्वीकार करने पर इतना बड़ा अनर्थ हो जाता है। इस योग को साध्य करने के लिये योगी आठों पहर कष्ट करते
रहते हैं। अपने हित के लिये जागृत रह कर गुरुवचन पर विश्वास रख कर लगातार मंथन करते रहना चाहिये,
तभी ब्रह्मज्ञान प्रकट होता है। एक बार वह ब्रह्मज्ञान प्रकट हो जाने पर देह का भान ही नहीं रहता। दृश्य, द्रष्टा
और दर्शन तत्काल विलुप्त हो जाता है। आत्मज्ञान से आत्मसुख सिद्ध होते ही कार्य-कर्म-कर्ता अथवा ज्ञान-
ज्ञेय-ज्ञाता आदि का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। आत्मज्ञान से संसार दुःख का विलय होकर आत्मसुख का लाभ
होता है और आत्मसुख में माया के गुणदोषों का झट विनाश हो जाता है।
वैशारदी सातिविशुद्धबुद्धिर्धुनोति मायां गुणसम्पसूताम्।
गुणांश्च संदह्य यदात्ममेतत् स्वयं च शाम्यत्यसमिद् यथाग्निः ॥ १३ ॥
आत्ममाया के गुण का निराकरण करने के लिये शिष्य चतुर, बुद्धिमान एवं दैवी सम्पत्ति का आश्रय कर
सदा सद्गुण सम्पन्न होना चाहिये। ऐसे प्रकार के अधिकारी मुमुक्षु के मस्तक पर शास्त्र पारंगत तथा
स्वानुभवसम्पन्न गुरु का वरदहस्त होने पर उसे तत्काल निजबोध प्राप्त होता है। उस निजबोध में दृष्टि स्थिर होते
ही गुणों का कार्य गुणों के पेट में ही समा जाते हैं। गुण ही गुणों का प्राशन करते हैं। तम का प्राशन रजोगुण
करता है। तम को खाकर जब रजोगुण उन्मत्त हो जाता है तो उसे देखकर सत्त्वगुण भी खौलने लगता है।
सत्त्वगुण जब उबलने लगता है तो उसे द्वैतभाव सहन नहीं होता और वह तत्काल रजोगुण को निगल लेता है।
शुद्धसत्त्व का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उससे आत्मसुख का अनुभव होता है। वह अनुभव भी कैसा
आश्चर्यजनक है। वह सदा चिर नूतन ही मालूम होता है और एक बात यह भी है कि सुखानुभव से सृष्टि उत्पन्न
करने में सहायक होने वाले जिस रजतम के बीजों के अवशेष शेष रह जाते हैं वे भी नष्ट हो जाते हैं। अर्थात्
गुणों को उत्पन्न करने वाली माया भी उस शुद्ध सत्त्व में विलीन हो जाती है और वह सत्त्वृत्ति अकेली अद्वैतरूप
से बची रह जाती है। फिर 'ब्रह्माहमस्मि' — अर्थात् में ही ब्रह्म हूँ यह भावना भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है
और तभी 'सोहंहंसा' की भी छुट्टी हो जाती है। उस समय देह का देहत्व ही समाप्त हो जाता है और जन्म-
२४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरण की ही मृत्यु हो जाती है। विश्व का भान नष्ट हो जाता है और चारों ओर घनानंद भर जाता है। तब सारी
दृष्टि सुखमय हो जाती है और सारी सृष्टिभी आनन्दमय हो जाती है। आत्मानंद से मिलन के कारण परमानन्द
का वातावरण हो जाता है। उस सुख की बराबरी कभी किसी बात से नहीं हो सकती। जहाँ वेद भी मौन हो जाते
हैं और वृत्ति तत्पदा को प्राप्त होती है। फिर द्वैत शेष नहीं रह जाता और वृत्ति की वृद्धि रुक जाती है। सुखस्वरूप
में ही डूब जाने के कारण उसकी वृद्धि तथा नाश रुक जाता है। लकड़ी के बिना अग्नि जिस प्रकार अपने मूल
तेज में मिल जाती है उसी प्रकार वृत्ति भी अद्वैत रूप में सुखस्वरूप में मिलकर एकरूप हो जाती है। गंगा सागर
में मिलकर सागर ही बन जाती है। या जल और नमक का मिलन होने पर वह सब जलरूप ही हो जाता है। एक
दीपक दूसरे दीपक से मिल कर एकरूप हो जाते हैं उसी प्रकार वृत्ति का लय होने पर निर्व्यंग आत्मसुख प्राप्त
होता है। फिर उस समय यह कहना भी शेष नहीं रह जाता कि आत्मा एक अद्वैत है। अर्थात्, आत्मा द्वैताद्वैत से
भिन्न, नित्य और सत्यस्वरूप है। वह ज्ञानस्वरूप, स्वयंप्रकाश, अविकारी, अविनाशी, अकर्त्ता, अभोक्ता, उदास
तथा निर्निवेश निजात्मरूप है। उसकी देह नहीं है, कुल नहीं है, उसके नेत्र नहीं हैं, उसके कान नहीं हैं, उसका
कोई नहीं है, वह समस्त मंत्र एवं मंत्रार्थस्वरूप है। वह अजन्मा, आद्य, अप्रमेय, अतर्क्य, अलक्ष्य, अव्यय
नामरूप से आकलन न होने वाला भावाभावशून्य है। जो भाग्य, भोक्ता और भोग भी नहीं है, जो कार्य, कर्त्ता और
कर्म भी नहीं है, जहाँ कर्त्ता और अकर्त्ता की ही समाप्ति हो गयी है वह अविनाशी, अभंग, शुद्ध, बुद्ध, असंगह,
देहद्वय का संग जिसे स्पर्श नहीं करता। आत्मा के सिवा सब कुछ अनित्य है यह निश्चय दृढ़ हो जाने पर नित्य
और अनित्य दोनों ही डूब जाते हैं और अंतर्वाह्य केवल आत्मस्वरूप ही बच जाता है। अज्ञान पूरी तरह नष्ट हो
जाता है और ज्ञान की भी कोई स्थिति नहीं रहती। गुण, गुणी और गुणातीत ये भी इस अवस्था में नष्ट हो जाते
हैं। हे उद्धव ! सचमुच परमेश्वर वही है ऐसा मेरा निश्चय है। उपनिषदों द्वारा अभिव्यक्त तथा आत्मत्व से
प्रतिपादित वही है। वृत्ति ऐसी स्थिति में पहुँचते ही संसारकी निवृत्ति होती है। वेदांत तथा सिद्धांत का यही
अन्तिम निर्णय है। सचमुच ही निजात्मरूप की प्राप्ति हो जाने के बाद कार्य, कर्म, कर्त्तव्य यह सब पूरी तरह
खत्म हो जाता है। अद्वैत प्रतिपादक श्रुति के मनन से और गुरुकृपा के प्रकाश से वृत्ति निजात्मपद को प्राप्त कर
लेती है। कैसा अहोभाग्य है यह ? हे उद्धव ! देवादिदेव भी मेरा वन्दन करते हैं। मेरे उस ज्ञान की सारी धरोहर
परम कृपा से मैंने तुम्हें सौंपी है। हे उद्धव ! तुम्हें सचमुच ही निवृत्ति प्राप्त हो इसलिये मैंने तुम्हें यही विषय
अनेक श्रुतियों का आधार लेकर प्रेमपूर्वक समझाया। अब तुम देह आदि जो भी कुछ मिथ्या, निन्दनीय, तिरस्कार
योग्य है उसका अपने चित्त से स्पर्श न होने दो। उससे अलिप्त होकर तुम परमार्थी बनो। तुम्हें यह अलभ्य लाभ
प्राप्त हुआ है लेकिन उसके लिये तुम्हें कठिन प्रयास करना होगा। अनेक मत-मतान्तर तुम्हें परेशान करने
आयेंगे। उनके बारे में भी सुनो।
अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः।
नानात्वमथनित्यत्वं लोककालागमात्मनाम्॥ १४॥
अनेक प्रकार के फलों की इच्छा कर और उसके अनुसार सुख दुःख भोगने वाले अनंत जीव हैं। उनका
यह कहना है कि जो लोग मानते हैं कि सारे जीव एकरूप हैं, वह सच नहीं है क्योंकि यदि वैसा होता तो एक के
सुख से सभी सुखी हुए होते अथवा एक के पाप से सभी पापी हो जाते। लेकिन ऐसा सब जगह नहीं होता।
कर्मवादियों का मत है कि जीव नित्य और अनंत है, मुख्य ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं है, हमारा कर्म ही
दसवाँ अध्याय २४९
हमारा कर्त्ता है। मन में जो 'अहं' की भावना उत्पन्न होती है वह प्रत्येक शरीर में भिन्न होती है, इसलिये जीव भी
भिन्न-भिन्न हैं, कर्त्तापन और भोक्तापन उनके स्वरूप का प्रमाण है। इससे सम्बन्धित विचार ध्यानपूर्वक सुनो।
लोक, काल, श्रुति तथा जीवित ये अनेक कारणों से अनित्य हैं, ऐसा मेरा वेदांतिक मत है। शायद कर्मवादियों का
मत तुम्हें सच मालूम होगा लेकिन इससे तुम्हारे स्वार्थ की हानि होगी और तुम पर बहुत बड़ा अनर्थ होगा। वह
अनर्थ क्या है जानना चाहते हो तो सुनो। कर्मवादियों का यह भाव पूर्वपक्ष ही है। परमात्मा निर्विकार है तथा
सर्वस्वरूप एक है यह बात उन्हें स्वीकार नहीं। 'संन्यास' का नाम सुनते ही वे उसे महान पातक मानते हैं। इस
प्रकार मताभिमानियों की बक-बक चालू रहती है। त्याग अथवा संन्यास करने वालों को वे अनधिकारी कहते हैं।
वे कर्म को ही प्रधान मानते हैं और तदनुसार वैराग्य की निन्दा करते हैं। उनका मत है कि कर्म करो और सुख
का उपभोग करो। वह कर्म ही जो त्याग देते हैं उन निष्कर्मियों को सुख किस बात का मिलेगा? त्याग समस्त
दुःखों का मूल है। वैराग्य तो होता ही नहीं है। इसके लिये वे चार कारण बताते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। वे कहते हैं
यदि अनित्य अर्थात् अशाश्वत जैसी कोई बात होती तो उसमें वैराग्य तो होता ही नहीं है। इसके लिये वे चार
कारण बताते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। वे कहते हैं कि यदि अनित्य अर्थात् अशाश्वत जैसी कोई बात होती तो उसमें
वैराग्य हो सकता था लेकिन यहाँ जब अनित्य जैसी कोई बात है ही नहीं तो बैरागी किस चीज का त्याग करेगा?
मीमांसकों का मत है कि वैराग्य चार कारणों से होता है। वे चार बातों को नित्य मानते हैं। नित्यत्व के कारण
चारों बातें सच हैं इस मत पर उन्हें गर्व है। कर्म-प्रकाशक वेद नित्य और अटल है ऐसा वे मानते हैं जीव नित्य
हैं उसी प्रकार भोग और काल भी नित्य हैं ऐसा उनका कथन है। वेदों ने भी स्वर्ग को भोग भोगने का स्थान
बताया है। वह बात तो झूठ नहीं हो सकती। इससे यह सिद्ध है कि ये चारों नित्य हैं। हे उद्धव! देखो, इस प्रकार
यहाँ अनित्य जैसी कोई बात नहीं है तो यहाँ वैराग्य का क्या काम है? तात्पर्य यह है कि बैरागी लोग मिथ्या होते
हैं। भोगने की चीजें यदि नश्वर होतीं अथवा मायावी होतीं तो वैराग्य सम्भव था। ऐसी तो कोई बात यहाँ नहीं है,
(ऐसा उनका मत है) उसी प्रकार
मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी यथा।
तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः ॥ १५॥
जीव के भोग्य पदार्थ हैं गंध, पुष्प, स्त्री आदि। प्रवाहरूप में वे नित्य हैं ऐसा वे अपने मतानुसार कहते हैं।
आत्मा है और संसार नहीं है ऐसा तो कभी नहीं हो सकता क्योंकि जल के बिना समुद्र हो ही नहीं सकता। सृष्टि
यह सदा शुरु ही है अर्थात् नित्य है। पिता पुत्र के रूप में वह अखण्ड चल रही है। यह सारी यातायात कर्म के
कारण है। यह कभी नहीं हो सकता कि सृष्टि अनित्य हो। फिर जो नित्य है उसे ईश्वर नाम का एक कर्त्ता होना
सम्भव नहीं है। नित्य का कर्त्ता कोई नहीं होता इसलिये वहाँ कोई ईश्वर नहीं है। वेदांती लोग स्वरूपभूत आत्मा
को ज्ञानस्वरूप कहते हैं। वह भी यहाँ नहीं होता ऐसा मत वे प्रतिपादित करते हैं। घट पट आदि आकार देखते
समय ज्ञान की क्षणभंगुर अवस्था दिखाई देती है ऐसा होते हुए उन्हें आत्मा को ज्ञानस्वरूप कहने में लज्जा क्यों
नहीं आती? कुल मिलाकर वेदांत में भी आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में पक्का निश्चय नहीं है, फिर जिसे मोक्ष
कहते हैं वह भी मिथ्या ही है। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सुख के अतिरिक्त मोक्षसुख को कुछ अलग बताया
गया है, लेकिन वह भी अविचार ही है क्योंकि इन्द्रियों के द्वारा ही जीवों को प्रत्यक्ष सुख प्राप्त होते हुए भी, ये
मूर्ख लोग उसे स्वीकार नहीं करते। देह के सिवा विदेह अवस्था में क्या कोई सुख भोगता है? अद्वैतवादी व्यर्थ
२५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
की बकवास करते हैं जो सच नहीं है। जिस से जीव को सुख की प्राप्ति होती है उन इन्द्रियों को ही वे मिथ्या
कहते हैं। कोई आँखें फोड़ कर दर्शक बने वैसी ही यह वेदांतियों की बकवास है। यहाँ जब ईश्वर है ही नहीं
तो वह फल देगा यह बात भी मिथ्या होगी। अद्वैतवादी महामूर्ख होते हैं, वे वैराग्य के बहाने मूर्खों को गढ़े में
ढकेलते हैं। जिसका न कोई ठाँव है न ठिकाना और न सत्ता, ऐसे मिथ्या ईश्वर की मन में कल्पना कर वे
कर्मफल का त्याग कराते हैं। नरदेह में ज्ञान का उदय हुआ और उसने देह का ही नाश करा दिया। क्या किसी ने
फल को वृक्ष की जड़ काटते देखा है ? ज्ञान परिपक्व हो जाने पर सारे संसार का ही विनाश हो जाता है ऐसा
वेदांती कहते हैं। लेकिन जब यह सृष्टि प्रवाह रूप में नित्य ही है तो उसका विनाश कैसे होता है ? मनुष्य के
हृदय में स्थित ज्ञान से यदि संसार का नाश होता है तो जुगनू के तेज से चन्द्रमा, सूर्य आदि नवग्रह भी जलकर
भस्म हो जायेंगे। सारांश, निवृत्ति का स्वीकार करने पर किया हुआ परिश्रम व्यर्थ चला जाता है क्योंकि इन्द्रियों
के बिना जीव को कभी सुख की प्राप्ति नहीं होगी। इसलिये प्रवृत्ति ही सबके लिये श्रेष्ठ है। जमकर कर्म करने
चाहिये और उसके उत्तम से उत्तम फल भोगने चाहिये। जो संसार को केवल माया कहते हैं वे मूर्ख हैं, जीव को
संसार के अतिरिक्त दूसरा कोई सुख नहीं है। इसलिये देवतागण भी मनुष्य के होने की कामना करते हैं और
वेदांती मनुष्य देह की निन्दा करते हैं। उनकी युक्ति को कौन स्वीकार करेगा ? यह वेदवचन है, उसे कौन
झुठलायेगा ? सारांश, उनकी बात पर जो विश्वास करेगा उसका पूरी तरह नाश हो जायेगा। वेदवचन सदा
प्रमाणरूप रहता है उसे ही ये मिथ्या कहते हैं। इसका अर्थ यही न कि ये बहुत बड़े ज्ञानी बन गये ? (भगवान
कहते हैं) मीमांसकों की भाषा ऐसी होती है वे तर्क पर तर्क देकर अपना मत स्थापित करते हैं, लेकिन हे
उद्धव ! यह सरासर झूठ है। मीमांसावादियों का शब्द पांडित्य ध्यान में रखकर, प्रपंच की अनर्थता को दिखला
कर (भगवान) वैराग्य को सिद्ध कर रहे हैं।
एवमप्यङ्ग सर्वेषां देहिनां देहयोगतः।
कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् ॥ १६॥
श्रीकृष्ण ने कहा, हे उद्धव ! ये सारा मतवाद मिथ्या है। लेकिन उसे कैसे समझा जाय ? तो उन मतों पर
विचार करना पर्याप्त है। निवृत्ति कष्टप्रद है इसलिये प्रवृत्ति ही अत्यन्त श्रेष्ठ है ऐसा माना जाता है। किन्तु प्रवृत्ति
में भी अनेक कष्ट हैं और मृत्यु का भय तो अनिवार्य है। जन्म के मूल से ही काल जीव का अखण्ड पीछा
करता रहता है। लवनिमिष पल-पल काल 'समय साधता रहता है। जैसी चोर के साथ मित्रता होती है उसी प्रकार
काल का साथ रहता है। समय आते ही वह प्राण लूट लेता है कुछ भी शेष नहीं रहने देता। काल हाट बाजार
नहीं देखता, घंटा मिनट नहीं देखता, देश-विदेश नहीं देखता। अपने प्रभाव से वह सबको स्वाहा कर देता' है।
प्रवृत्ति के कष्ट सहते-सहते एकाएक मृत्यु का प्रहार होता है। ऐसा प्रसंग कभी न आये। जीव में वासना की डोर
जबरदस्त रहती है इसलिये वह मर गया, बचाओ आदि की गुहार करता है। लेकिन मृत्यु के प्रहार को कौन
निरस्त करेगा ? उस समय किसी का कोई उपाय काम नहीं करता। काल केवल मार कर ही छुटकारा नहीं करता,
अपितु भविष्य में भी काफी यातनायें भोगने के लिये बाध्य करता है। इनमें गर्भवास भी है जिसमें अनेक दुःख
होते हैं। माता की उदररूपी गुफा में, मलमूत्र के विस्तार में, नीचे मुड़ी कर नौ महीने तक उसे पकाता रहता है।
उस समय वह चारों ओर से मलमूत्र से लिपटा रहता है, नाक और मुँह में कीड़ों का प्रवेश होता रहता है।
गर्भवास के वे कष्ट किससे कहेंगे ? फिर गर्भवती स्त्री की दोहद की अवस्था आती है जब उसे कडुई, खट्टी
दसवाँ अध्याय २५१
तथा नमकीन चीजें खाने की इच्छा होती है। उस समय गर्भ के शरीर पर पूरी चमड़ी न होने के कारण शरीर
खौलने लगता है और उस दुःख से वह करवटें बदलता रहता है। उस गर्भ को पेट में क्या यातनायें हो रही हैं
इसका अनुमान माँ-बाप को नहीं होता। उनसे छुटकारा दिलाने वाला वहाँ कोई नहीं होता। उस जीव की व्यथा
वह स्वयं ही जानता है। जिस स्थान का उच्चार कोई मुँह से भी नहीं करता, जो स्थान कोई किसी को देखने भी
नहीं देता, ऐसे उस योनिद्वार से अत्यन्त संकट से, आखिर प्राणी का जन्म होता है। जो नित्य का मूत्रालय है,
नरक की खान है और रजस्वला के रुधिर का प्रवाह है, वहाँ से प्राणी का जन्म होता है। रजस्वला स्त्री के गन्दे
रक्त से यह शरीर बनता है और गन्दे रक्त से पुरुष का जन्म होता है, फिर भी वह अपने को पवित्र कहता है।
गर्भवास से अधिक दुःख और कौन सा है? मताभिमानी जो कहते हैं वह मिथ्या है। प्रवृत्ति में सुख बिलकुल
नहीं है। एक जन्म से न जन्म की समाप्ति होती है और न एक मृत्यु से मृत्यु ही समाप्त होती है। काल योनि के
द्वार से असंख्य जन्मों के फेरे लगवाता है। बार-बार जन्म और बार-बार मृत्यु, यह बराबर चल रहा है। ऐसी
प्रवृत्ति में सुख क्या होगा? हाँ, भयंकर दुःख अवश्य सहना पड़ता है। जन्म और मृत्यु के रिक्त स्थान में बड़े-
बड़े दुःख पीड़ा देते हैं। उनका दुःख देने का ढंग भी बताता हूँ। चोरों के हमले के भय से तेजी से भागो तो चोर
बीच में ही लूट लेते हैं, उसी प्रकार जन्म-मरण के अंतराल में षड्विकार रहते हैं। षड्विकारों की पतिव्रता
षडर्मी जीव से जोंक की तरह चिपक जाती हैं। सब मिला कर देखा जाय तो प्रवृत्ति में नितांत दुःख है, सुख जरा
भी नहीं है। अब कर्मवादी जीव को स्वतंत्र कर्मकर्त्ता मानते हैं, लेकिन उनका यह कहना मिथ्या है क्योंकि
पराधीनता उसे स्वयं अपनी आँखों से दिखायी देती है।
अत्रापि कर्मणां कर्तुस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते।
भोक्तुश्चदुःखसुखयोः को न्वर्थो विवशं भजेत्॥ १७॥
यदि जीव स्वतंत्र होता तो उसे कभी दुःख न भोगना पड़ता, सदा सुखी ही रहता। दुःख का मूल जो पाप है
उसे वह न करता। बेचारा जीव हमेशा से ही दीन, कर्म करके कर्माधीन रहने वाला, उसे कर्म का फल देने वाला
कोई दूसरा ही रहता है, वही उसे सुख-दुःख का भोग कराता है, इसे ध्यान में रखो। इसलिये ईश्वर की सत्ता ही
श्रेष्ठ है। वही कर्म का फल देने वाला है। जीव सुख-दुःख का भोक्ता है, वह स्वतंत्र नहीं है। इस पराधीनता के
कारण ही वह भयानक सुख-दुःख भोगता है। दुःख की इच्छा कोई नहीं करता लेकिन फिर भी उसे वह प्राप्त
होता है। इससे भी प्रकट होता है कि उसे स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है। वह पराधीन होकर आचरण करता है इसलिये
उसे बिना माँगे सुख-दुःख भोगना पड़ता है। इस पर विपक्षी कहेंगे कि जो विधिपूर्वक कर्म करना नहीं जानते
वही जीव दुःखी होते हैं और जो कर्म करना जानते हैं वे सुखी रहते हैं। जो सदाचार सम्पन्न श्रोत्रिय हैं या जो
याज्ञिक और अग्निहोत्री हैं वे इस लोक और परलोक के लिये विधिपूर्वक कर्म करते हैं। जिनके इन्द्रिय अव्यंग
हैं, उनमें कोई न्यूनता नहीं है, वे विधिपूर्वक कर्म कर दोनों लोकों के सुखों का कर्मयोग द्वारा उपभोग करते हैं।
किन्तु (भगवान कहते हैं) कर्म में भी जो श्रेष्ठ रहता है उसे सुख का उपभोग सदा करने को मिलता ही है, ऐसी
बात नहीं है। उसके बारे में भी बताता हूँ।
न देहिनां सुखं किंचिद् विद्यते विदुषामपि।
तथा च दुःखं मूढानां वृथाहंकरणं परम्॥ १८॥
जो कर्म के सच्चे ज्ञाता हैं वे भी दुःखी दिखाई देते हैं और जो कर्म का स्पर्श भी नहीं करते वे मूर्ख
२५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लोग भी सुखी दिखायी देते हैं। जो यज्ञपुरुष अच्युत हैं वे उसे छोड़ अग्निहोत्री यज्ञ करते हैं, उनका वह
स्वकर्म ही उन्हें विपरीत फल देता है। अग्नि तो मेरा ही स्वरूप है और श्रुतिमंत्र तो सारे मेरे ही बीज हैं।
होमद्रव्य के रूप में जो है वह भी मेरा ही स्वरूप है। इस मेरे जैसे सर्वव्यापी को अपने मन से नास्तिक समझ
अनीश्वरवादी लोग यज्ञ करते हैं। वही उन्हें बाधक होता है। स्त्रुक, स्त्रुवा, प्रणीतापात्र आदि सामग्री से कर्मतंत्र
अच्छी तरह करना जानते हैं किन्तु मुझ आत्माराम का सूत्र चुकने से यह याग अपवित्र हो जाता है। वास्तव में
वह सब मैं विश्वतोमुखी होने के कारण मुझ यज्ञपुरुष को ही अर्पण होता रहता है लेकिन याज्ञिक लोग इसे
स्वीकार नहीं करते। उनकी बुद्धि क्षुद्र और सकाम होती है। मुझे अर्पण किये बिना जो पुण्य प्राप्त करते हैं वह
दुःख होता है। जैसे विष को अमृत कहा जाय उसी प्रकार सकाम का पुण्य रहता है। मुझे छोड़ कर जो स्वर्ग
है उसे पीड़ा ही समझो और उससे मिलने वाले भोग को बड़ा रोग समझो। ऐसे याज्ञिकों का प्रयास मूर्खतापूर्ण
होता है। कर्म करते समय यदि उसमें कोई न्यूनता हो तो मैं अर्थात् श्रीकृष्ण का स्मरण करो ताकि उस नाम से
ही उसमें का न्यून कम हो जाय। मेरे नाम का इतना सामर्थ्य है। वही मैं जब याज्ञिकों के पास अन्न माँगने गया
तो उन्होंने मुझे वह नहीं दिया। यही उस कर्म की कर्मठता है। वे मुझ इन्द्रपुरुष को छोड़कर इंद्रादि देवताओं
का भजन करते हैं। लेकिन वे इंद्रादि देव मेरे ही अधीन हैं, इसे वे नहीं जानते। यही उस कर्म की कमी है।
जो अपना कर्म कृष्णार्पण नहीं करता उसका भाग्य फूटा समझो। ऐसा करने से इस लोक में भी दारिद्र्य में
रहना पड़ता है और परलोक में भी विघ्न आता है। अपना मुँह छोड़कर यदि पूरे शरीर को खीर चटायी जाय
तो उससे भूख तो शान्त नहीं होती उलटे दुःख होता है। उसी प्रकार मुझ यज्ञपति को छोड़कर यज्ञयाग करते
हैं, उस यज्ञ को बालविधवा के गर्भ प्राप्ति की तरह फल आते हैं। मैं यज्ञ करने जा रहा हूँ इसके लिये दूसरे
से धन माँगने पर उस यज्ञ का लाभ धन देने वाला हो जाता है। यज्ञ करने वाला सूखा ही रह जाता है।
अवश्य ही कर्त्ता होने का अभिमान सिर पर सवार रहता है। खीर के चम्मच से लोगों को खीर परोसी जाती
है। वह चम्मच जब गन्दा हो जाता है तो उसे एक ओर रख देते हैं। लेकिन खीर खाने वाले खीर खाकर चले
जाते हैं। गन्ना घानी में डालने पर घानी उसका रस निकाल कर बर्तन भर देती है और स्वयं नीरस चीथड़े
लेकर कटकटाती रहती है। वही दशा याज्ञिकों की होती है। याज्ञिक भी उसी प्रकार यज्ञ करते हैं और उसका
फल धन देने वाले को प्राप्त होता है। यज्ञ में पशु हिंसा करनी पड़ती है वह दोष अवश्य ही कर्तृत्वाभिमान के
कारण याज्ञिक के पल्ले पड़ता है। सारांश कर्म में निष्णात याज्ञिक इस प्रकार का दुःख भोगते हैं। लेकिन जिन
मूर्खों को कर्म का ज्ञान भी नहीं होता वे परमसुख प्राप्त करते हैं। उन्हें कर्म का खटराग मालूम नहीं रहता
लेकिन उनके मन में मेरे प्रति असीम श्रद्धा का भाव रहता है। इसलिये वे अगणित दुःखों को पार कर
आत्मसुख का स्वाद चखते हैं। वे कर्म के प्रति आदर रखना नहीं जानते लेकिन मेरे प्रति उनके मन में श्रद्धा
रहती है। ऐसे सीधे-सादे भक्त अत्यन्त सुख प्राप्त करते हैं। जो गोपाल गोकुल में निरन्तर मेरे साथ थे उन्होंने
कौन सा कर्म किया था? लेकिन उन्होंने कर्म की होली जला कर नित्य नये आत्मसुख का अनुभव आखिर ले
ही लिया। कर्ममार्ग के अनुसार यदि गोपियों के कर्म का विचार किया जाय तो उनका धर्म निन्दनीय था
लेकिन उन्हें पुरुषोत्तम की आसक्ति होने के कारण वे भी परमधाम पहुँच गयीं। इतना ही नहीं बल्कि गोकुल
के पशु, पक्षी, गौएँ और सर्प आदि सभी प्राणी मेरे पद पर पहुँच गये। लेकिन याज्ञिक लोगों को कर्माभिमान
का अत्यन्त गर्व होने के कारण वे अपने ही कर्म में दुःख भोगने लगे। जो केवल कर्मठ होते हैं वे कर्म के
कारण जड़बुद्धि होकर स्वयं सर्वज्ञ होने की मूर्खता के अभिमान में असहनीय दुःख भोगते हैं। दीपक के
दसवाँ अध्याय २५३
कारण पतंगा मृत्यु को प्राप्त होता है लेकिन उस पर न्योछावर होने में उसे सुख प्राप्त होता है। उसी प्रकार
कर्मठों के लिए कर्म ही दुःख का कारण होता है लेकिन अपने अभिमान के कारण ही वे उसमें सुख मानते
हैं। वास्तव में वे अभिमान के कारण ही जीव को स्वतंत्र मानते हैं। यदि विचार किया जाय तो उन्हें स्वतंत्रता
नहीं होती। अब उसी का निरूपण करता हूँ।
यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः।
तेऽप्यद्धा न विदुर्योंगं मृत्युर्न प्रभवेद्यथा ॥ १९॥
दुःख का नाश होकर सुख की प्राप्ति के लिये वे कर्म का आचरण करते हैं। कर्मवादी स्वयं को बहुत ज्ञानी
समझते हैं लेकिन दुःख का नाश कैसे किया जाय यह सचमुच उनकी समझ में नहीं आता। कर्म करने से भी
जिसका नाश नहीं होता ऐसा दुःख कौन-सा है? अगर इसका उत्तर पूछो तो क्रमवार बताता हूँ। मरने से अधिक
कोई दुःख नहीं है, लेकिन उसका ही नाश कैसे किया जाय यह उन बेचारों को नहीं मालूम होता। मृत्यु का प्रहार
इतना प्रखर है कि जैसे गरम पानी में हाथ डालने से हाथ जलता है लेकिन घर नहीं जलता, उसी प्रकार मृत्यु
प्रबल रूप से अनिवार्य होने के कारण वह कर्म से नहीं टलता। जो सबको मारता है उस मृत्यु को कैसे मारा जाय
यह बात उन कर्मठों की समझ में नहीं आती। जो कर्मों में रहते हैं उन्हें मृत्यु अचूक आती है। मरने का दुःख तो
आखिर आना ही है इसलिये जब तक जीवित हैं तब तक सुख भोग लिया जाय ऐसी बातें मूर्ख लोग करते हैं।
लेकिन जीवित अवस्था में भी उन्हें सुख किस बात का है?
कोन्वर्थः सुखयत्येनं कामो वा मृत्युरन्तिके।
आघात नीयमानस्य वध्यस्येव न तुष्टिदः॥ २०॥
हे उद्धव ! कर्मठ लोगों को जीवित अवस्था में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती, यही बात मैं अब तुम्हें बता
रहा हूँ। विष मिलाकर यदि मिष्टान्न तैयार किया जाय तो ज्ञानी लोग उसे मीठा नहीं कहेंगे, उससे मेरी मृत्यु होगी
यह जानकर वे उसे फेंक देंगे। जिस घर में आग लगी हुई हो उसमें बुद्धिमान व्यक्ति क्षण भर के लिये भी नहीं
रुकेगा। मृत्यु के आने से पहले ही वह उस मकान को छोड़कर कहीं दूर भाग जायेगा। जब दरवाजे पर डकैत
आ खड़े हों तो खीर भी मधुर नहीं लगेगी। उसी प्रकार शरीर को मृत्यु आ सकता है यह मालूम होने पर
विषयभोग में सुख कैसे मिलेगा? जिसकी दाढ़ी में आग लगी हो उसे वह चेहरे की शोभा कैसे मानेगा? उसी
प्रकार शरीर में नित्य नया मृत्यु दिखायी देते हुए विषय भोग में सुख कैसे मालूम होगा? जब मृत्यु काल की
व्यथा शुरु होती है तो जन, धन, अन्न तथा स्त्री सुख नहीं दे सकती। वे सारे व्यर्थ हो जाते हैं। अंतकाल में कनक
और कांता ये दोनों ही दुःख का कारण बन जाते हैं। वासना के कारण प्राण उनका शरीर नहीं छोड़ पाता। इसके
कारण वह छटपटाता रहता है। जिस प्रकार सूली पर ले जाते समय विविध प्रकार के समारोह किये जाते हैं और
उस व्यक्ति को पंचपकवान खिलाये जाते हैं किन्तु उनसे उसे सुख नहीं प्राप्त होता। उसी प्रकार सामने साक्षात्
मृत्यु दिखायी देने पर विषय सुख में किसे आनन्द आयेगा? इसलिये जो बुद्धिमान हैं वे विषयों का त्याग करते हैं
और जो मूर्ख हैं वे ही उसमें आसक्त होकर रहते हैं। शरीर में यदि क्षणभर के लिये भी दुःख हो तो करोड़ों
विषय सुख भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये जो विषयसुख के लिये छटपटाते हैं वे पागल हैं। चिरमिठास निर्विषयों
में ही है। सारांश, इस लोक में सुख है ही नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि परलोक में सुख है लेकिन हे उद्धव वहाँ
भी सुख नहीं प्राप्त होता। किस तरह यह सुनो।
२५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रुतं च दृष्टवद् दुष्टं स्पर्धासूयात्ययव्ययैः।
बह्वन्तरायकामत्वात् कृषिवच्चापि निष्फलम् ॥ २१॥
जैसा यह लोक है उसी प्रकार स्वर्गादि लोकों के बारे में भी हम सुनते हैं लेकिन वे भी पहले से ही
दोषयुक्त हैं। मूर्ख लोग वैसे दोषयुक्त लोक की भी इच्छा करते हैं। अब तुम पूछोगे कि स्वर्ग में कैसा दोष है तो
सुनो। वहाँ भी स्पर्धा, ईर्षा और विनाश रहते हैं। फिर वहाँ भोग के कारण तप भी क्षीण होता रहता है। अपने ही
समान दूसरे का तप देखने पर वह उसके साथ स्पर्धा करने लगता है। अपने ही तरह दूसरा सुख भोग रहा है यह
देखकर मन सुखी नहीं होता। अपने से ऊँचे पद पर किसी को आसीन होते देख उस पर किसी प्रकार का
दोषारोपण कर उसकी निन्दा करते हैं। जब वहाँ भी विषम भाव उत्पन्न होता है तो वहाँ वास्तव में सुख कैसे
मिलेगा ? इसलिये स्वर्ग प्राप्ति के बाद भी सबको एक जैसा सुख नहीं प्राप्त होता। लोग अपने-अपने कर्म और
तप के अनुसार कम-अधिक सुख भोगते रहते हैं। कोई उर्वशी का भोग करता है तो किसी को काली और विद्रूप
हिडिंबा प्राप्त होती है। सारांश, भोग के कारण तप का क्षय होकर विनाश अवश्य होता है। जैसे-जैसे लोग स्वर्ग
का भोग भोगते हैं वैसे-वैसे तप की शक्ति क्षीण होती जाती है। इस प्रकार वे स्वर्ग के लोग तप के क्षय के कारण
नष्ट हो जाते हैं। हे उद्धव ! स्वर्ग प्राप्ति के लिये विधिपूर्वक कर्म करने से विघ्नों की बाधा आती है। इसलिये
वास्तविक स्वर्ग की प्राप्ति तो होती नहीं। जो गर्भ में ही मर जाता है उसका नामकरण नहीं होता। उसी प्रकार
कर्म में विघ्न उत्पन्न हो जाने पर स्वर्ग की प्राप्ति भी रुक जाती है। अब यदि पूछोगे कि कर्म में विघ्न कौन उत्पन्न
करता है तो कर्म अपनी प्रक्रिया में ही दूषित होता रहता है। वह कर्म ही उस कर्म में भयानक बाधा उत्पन्न करता
है। कर्म ही कर्म का साधक भी है और बाधक भी। कर्म ही कर्म से मुक्त कराने वाला है। लेकिन यह बात न
जानने के कारण लोग उसमें उलझे रहते हैं। काम्य कर्म में विलक्षण बाधायें होती है। उसमें देश, काल, मंत्र, तंत्र,
द्रव्य, दक्षिणा विधि और पात्र सभी कुछ शुद्ध होना आवश्यक है। जिस प्रकार तपेदिक के रोगी के लिये थोड़ा
कुपथ्य भी बाधक होता है उसी प्रकार कामनिक कर्म में थोड़ा सा दोष भी विघ्न उत्पन्न करता है। दूध से भरे बड़े
बर्तन में यदि कांजी का एक बूँद भी पड़ जाय तो उस दूध से दही, दूध या घी कुछ भी प्राप्त नहीं होता। उसी
प्रकार कामनिक कर्म थोड़े से भी दोष के कारण फलरहित हो जाता है। इतना ही नहीं बल्कि वह कर्म ही
भयानक बाधा उत्पन्न करता है। साल भर खटकर किसान खेती करता है लेकिन फसल तैयार होने तक अनेक
बाधायें उपस्थित होती हैं और किसान का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। पहले अच्छा खेत चाहिये, फिर उसके लिये
अच्छा बीज मिलना चाहिये, समय पर वर्षा होनी चाहिये, खेत में कीड़ों का प्रकोप नहीं होना चाहिये। खेती में
काम आने वाले औजार भी अच्छे होने चाहिए। बुआई होने के बाद भी उसकी अच्छी देखरेख होनी चाहिये और
बिना आलस किये सुबह होने तक पहरेदारी आवश्यक है। फसल हाथ में आने पर भी वर्षा उसे भिंगो देती है,
बाल रोग के कारण काले हो जाते हैं, जंगली घास उग आती है। उसी प्रकार कर्म पर अहंकार का रोग लगता है
अथवा अधर्म का कीड़ा उस कर्म का फल नष्ट कर देता है। फसल की यदि समुचित व्यवस्था नहीं हुई तो आशा
तृष्णारूपी पंछी फसल को खा जाते हैं और उसमें अनाज का एक भी दाना नहीं रहने देते। तिल पर यदि अहंकार
की मार पड़ जाय तो फिर क्या पूछना ? सेम दिखायी तो देती है लेकिन उसमें से दाना नदारद। कामक्रोधरूपी
चूहे तो फसल को मूल से ही खा जाते हैं। यदि विकल्प का हमला हो जाय तो फिर खेत में लकड़ी मिलना भी
दूभर हो जाता है और दुर्वासना रूपी टिड्डी दल आ जाए तो फिर ऊपर से लेकर नीचे तक सब खूँट ही रह जाते
हैं। इस प्रकार खेतिहर की ही तरह कामनिक कर्म में भी अनेक बाधायें उत्पन्न होती हैं। फल मिलना तो दूर,