श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलेकिन अग्नि उनसे अलिप्त ही रहता है। लकड़ी पर लकड़ी रगड़ने से जब अग्नि बाहर आता है तो अग्नि
उत्पन्न होने की बात की जाती है। उसी प्रकार लकड़ी के आकार की तरह वह छोटा बड़ा हुआ दिखाई देता है।
अग्नि लकड़ी के आकार की तरह तिकोना, गोल तथा वक्र होने का आभास होता है और उसमें की लकड़ियाँ
पूरी तरह जल जाने पर आग नष्ट हो गयी ऐसा कहा जाता है। उसी प्रकार अजन्मा, शाश्वत तथा अव्यय आत्मा
को भी देह का ही आकार, विकार, जन्म, नाश आदि मिथ्या विशेषण लगाये जाते हैं। अग्नि का दृष्टांत देकर जो
बात उद्धव को बतायी वह शायद उसे न जँचे इसलिये श्रीकृष्ण ने वही निरूपण बताना प्रारम्भ किया। उन्होंने
कहा, "हे उद्धव! तुम कहोगे कि अग्नि का और काष्ठ का संयोग यह बात मूलतः ही सिद्ध है, इसलिये लकड़ी
का धर्म अग्नि को लगता है यह बात मैं मानता हूँ किन्तु आत्मा मूलतः ही नित्यसिद्ध तथा अविकारी है। वह
स्वयं गगन को भी स्पर्श नहीं करता फिर उसे देह का संग कैसे स्पर्श करेगा? और उसके कारण वह विकारयुक्त
कैसे होगा ? आत्मा का देह से संग होता है यह बात ही मिथ्या है। कभी न घटने वाली यह बात अगर होगी तो
वह देहबुद्धि में ही होगी और जो देहबुद्धि में मिलेगा वह विशुद्ध देहधारी ही हो जायेगा। फिर उससे देहबुद्धि का
त्याग कैसे सम्भव होगा ? यही शंका मन में आती है।" श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, "ऐसी शंका तुम्हारे मन में
आयेगी इसलिये तुम मन ही मन इसका विचार सुनो। हे जगच्छ्रेष्ठ भक्त ! यह बात केवल शाब्दिक चतुराई से
हाथ नहीं आयेगी। मेरी यह अत्यन्त गोपनीय बात है। वह केवल तुम्हें सुनाता हूँ।"
योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि।
संसारस्तन्निबन्धोऽयं पुंसो विद्याच्छिदात्मनः ॥१०॥
सुनो उद्धव! पुरुषोत्तम नाम का जो पुरुष है, जिसमें माया के सारे गुण हैं, शास्त्रों ने जिसे 'ईश्वर' का नाम
दिया है, उस ईश्वर की ही वह माया जिसे जीव को संसार में लाने और भ्रम बढ़ाने जैसे अनेक कार्यों के लिये
उत्पन्न किया है उस माया में ही जो चैतन्य प्रतिबिम्बित हुआ है, उसे ही 'जीव' कहते हैं। जिस प्रकार मूर्ख
व्यक्ति को गढ़े के जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब डूबा दिखाई देता है, वैसा ही है यह। लेकिन चन्द्रमा गढ़े को
छुए बिना आकाश में ही अलिप्त रहता है। उसी प्रकार आत्मा भी अविद्या से अलग ही है। जब अविद्या
प्रतिबिम्ब को स्पर्श नहीं करती तो वह बिम्ब को कैसे स्पर्श करेगी? 'अहं' के प्रति लगन वासना की आसक्ति से
उत्पन्न लिंग शरीर माया के वश में अनेक अनर्थ उत्पन्न करता है। लिंगदेह बलवान होने पर विषयभोग का मूल
कारण बनता है। लेकिन लिंगदोह स्थूल भोग नहीं कर सकता। सूक्ष्मभूतसमूह ही स्थूल भूताकार बनता है। इसके
अनंतर पंचमहाभूतों से स्थूल देह उत्पन्न होता है। इस प्रकार दोनों देहों का जन्म होता है। इन दो देहों के बीच
विचरण करते समय जीव की देहबुद्धि दृढ़ हो जाती है। इससे अहं ममता बढ़ती है और वह यह भूल जाता है
कि मैं वास्तव में कौन हूँ। आत्मसुख की मधुरता समझ में नहीं आती, इसलिये विषय के प्रति आसक्ति बढ़ती
है। वह पापपुण्य का हिसाब जोड़ने लगता है, इस प्रकार सुबुद्ध रहते हुए भी पैर में बंधन पड़ जाता है। 'देह' ही
मैं हूँ यह भावना दृढ़ होने के बाद देह के धर्म अर्थात् स्थूल, कृश आदि की उसे लगन हो जाती है और वह
वर्णाश्रम के धर्म सच मानने लगता है और फलवैभव की इच्छा कर कर्म का आचरण करने लगता है। कोई
सार्वभौम राजा अपने मन्दिर में पुष्पशैया पर सोया रहता है, वही स्वप्न में किसी अंत्यज के घर अन्न की भीख
माँगने जाता है। भीख का टुकड़ा मिले इसलिये वह उस नीच से कहता है, "अरे! तुम सचमुच राजा हो"
लेकिन वह भूल जाता है कि वह स्वयं राजा है। स्वप्न में वह स्वयं को भिखारी ही मानता है। उसी प्रकार अपनी
निजात्मता को भूलकर वह देवताओं से फल की आकांक्षा करने लगता है। लेकिन उसे इस बात का स्मरण भी