श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 253, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत्।
जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचोदनान् ॥ ४॥
मन में वासनाओं का मैल रहता है, इसलिये यह भेद सबल मालूम होता है। इसलिये मन से मैल निकाल
कर उसे निर्मल करते रहना चाहिये। पहले जिस नित्य नैमित्तिक कर्म के सम्बन्ध में कहा गया है उसी का नाम
'निवृत्त कर्म' है। वैसा कर्म साधकों को करना चाहिये। जो मेरे भजन में प्रवृत्त हो गया उसे काम्यकर्म पूरी तरह
छोड़ देना चाहिये। मन में किसी भी प्रकार की कामना नहीं रखनी चाहिये। यह पहले भी विस्तार से बताया ही
गया है। प्रत्येक कर्म मुझे समर्पित करने का विश्वास रखकर निरन्तर निर्मल कर्म का आचरण करने से मन के
सारे मैल धुल जाते हैं। किसान खेत जोतता है और सरकार को उसका लगान दे देता है। गाँव के कंटकों से वह
नहीं डरता। कृष्णार्पण से भी वैसी ही स्थिति प्राप्त होती है। चित्त के सारे मैल धुल जाने पर मन में 'नित्य' वस्तु
का विचार उभरता है और इह परलोक के सुखों पर लात मार कर वैराग्य से 'अनित्य' का त्याग करता है। इस
प्रकार वैराग्य अटल हो जाने पर उससे सत्त्वगुण की वृद्धि होती है। तभी वृत्ति मुझे जानने लायक निर्मल होती है।
मेरा चिंतन करने से कामक्रोध का स्मरण ही नहीं होता। उसे अत्यन्त तीव्रता से मेरी लगन लगी रहती है। वह
क्षणभर के लिये भी मेरे चिन्तन के बिना नहीं रहता। चित्त की इस अवस्था में जिसे कर्म क्रिया के प्रति अरुचि
उत्पन्न हो जाती है उसे समस्त कर्मों का संन्यास कर ब्रह्मज्ञान में प्रविष्ट हो जाना चाहिये। श्रवण मनन कर्म में
यदि कोई त्रुटि आती है तो वह मेरे भक्तों को बाधक नहीं होती क्योंकि वह कर्मों का दास नहीं है। स्वधर्म करने
का क्या फल है? तो उससे चित्त का मैल निश्चय ही दूर हो जाता है। किन्तु मेरा भक्त भजन से ही निर्मल होने
के कारण उसे स्वकर्म बाधक नहीं होता। सारांश यह कि मेरे भक्तों पर कर्मों की आज्ञा लागू नहीं होती। श्रवण-
कीर्तन करते रहने के कारण वे कर्म बन्धन में नहीं फँसते। इस प्रकार जो जिज्ञासावस्था में रहते हैं वे कर्मबन्धन
में नहीं फँसते। उद्देश्य ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना होता है, यही बात भगवान् उद्धव से कहते हैं।
यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान् मत्परः क्वचित्।
मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम् ॥ ५॥
वृत्ति पर नियंत्रण करने के लिये अहिंसा, सत्य आदि धर्म बाह्य नियम का विरोध न करते हुए अविश्रांत
आचरण करना चाहिये। अहिंसा-सत्य आदि का आचरण करते समय उसकी स्थिति इतनी उज्ज्वल हो जाती है
कि उसकी गुरुभक्ति पर अटूट श्रद्धा हो जाती है, दिन-रात वह गुरु का ही चिन्ता करने लगता है क्योंकि
उपनिषद में अन्तिम निर्णय के रूप में वचन है कि सद्गुरु के बिना कभी भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं होगा। आँखों
से अच्छी तरह दिखायी देता है लेकिन यदि उसे सूर्य की सहायता न हो तो उसे सामने की वस्तु नहीं दिखायी
देगी। वह अन्धकार में ही निश्चल खड़ा रहेगा। यह सच है कि नौका पार कराती है लेकिन यदि केवट न हो तो
इधर से उधर जाना सम्भव नहीं होगा। वर्षा से भूमि में आर्द्रता आती है और टोकरी में बीज भी पड़े हैं, लेकिन
यदि तज्ञ व्यक्ति बीज न डाले तो फसल की बात करना व्यर्थ है। सहसा कोई रत्न दिखाई देता है तो मन में यह
सन्देह उठता है कि वह असली है या नकली है। फिर रत्न परीक्षक उसकी कीमत लगाता है तब कहीं उसे
प्राप्त करने के लिये लोग प्रयास करते हैं। उसी प्रकार आत्मस्वरूप सहज ही उपलब्ध रहता है, उसे श्रद्धापूर्वक
सद्गुरु के हाथ से शुद्ध कर ज्ञानी लोग आत्मसुख के लिये प्राप्त होते हैं। आत्मज्ञान सम्पादन करने के लिये
सद्गुरु की सेवा कर संत सज्जन शान्त होते हैं क्योंकि सद्गुरु आनन्दघन रहता है। तुम कहोगे कि जो अनेक