श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २३९
अल्पांश भी हाथ नहीं लगेगा लेकिन यदि सद्गुरु के भजन में प्रवृत्त होंगे तो आत्मज्ञान की राशियाँ सामने लग
जायेंगी। मोक्ष भी चरणों पर गिर पड़ेगा। लेकिन गुरु का भक्त उसे भी स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह चरण
सेवा में ही तल्लीन रहता है। श्रीगुरुचरण का आकर्षण ऐसा विचित्र है कि उसके सामने मोक्षसुख का भी
विस्मरण होता है। जिसकी रुचि गुरुभजन में नहीं होती वही संसार के बन्धन में पड़ते हैं। संसार का बंधन
तोड़ने के लिये सद्गुरु की ही सेवा करना आवश्यक है। सद्गुरु की सेवा ही मेरा भजन है। क्योंकि गुरु में और
मुझमें कोई भेदभाव नहीं है। इस प्रकार गुरु भक्तों की श्रद्धा कितनी असीम होती है और उन्हें गुरुभजन के प्रति
कितना प्रेम रहता है उसे मैंने अपनी रुचि से स्पष्ट किया। कृष्ण कहते हैं, हे उद्धव! अब इसी प्रवाह में मैं तुम्हें
शिष्यों के लक्षण बताता हूँ।
अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृदः।
असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक् ॥६॥
जाल में फँसी हुई मछली जिस प्रकार छटपटाती है उसी प्रकार मान-सम्मान का प्रसंग आते ही सच्चा
शिष्य संकट में पड़ जाता है। हौवा का नाम सुनते ही जिस प्रकार बच्चा घबरा उठता है उसी प्रकार सम्मान की
बात सुनते ही भय से उसे संकट का आभास होता है। तेज हवा के झोंके से जिस प्रकार केले का वृक्ष काँपने
लगता है अथवा उफनती हुई लहरों के कारण पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब काँप उठता है, उसी प्रकार सम्मान को
वह आँख से भी नहीं देखना चाहता। बड़प्पन को वह एक बड़ा संकट मानता है और वह उसे अपने तक नहीं
आने देता। प्रेम से सम्मान स्वीकार करने से देहाभिमान दृढ़ होगा इसलिये वह मान अभिमान छोड़ कर सदा हीन
दीन होकर रहता है। मेरा नामरूप नष्ट हो जाय और कोई मेरी ओर न देखे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो ऐसा उपाय वह
करने लगता है। लौकिक को देखकर वह उद्विग्न हो उठता है, शरीर से और घर से वह ऊब जाता है, अकेलापन
ही उसे अच्छा लगता है इसलिये वह द्वैत का संग ही नहीं करता। उसके मन में यही अभिलाषा रहती है कि कोई
मुझे न देखे, कोई मुझे न पहचाने, कोई मुझसे न शरमाये। चोर पीछा करता है उस समय जिस प्रकार धनवान
व्यक्ति संकट के कारण छिप कर बैठ जाता है उसी प्रकार मान-सम्मान देखते ही वह देह में उपेक्षा का भाव
रखकर छिप जाता है। लोगों के बीच मैं भी हूँ यह कोई न जान पाये ऐसी स्थिति में वह रहता है इसलिये उसे
मान-सम्मान सहन नहीं होता। अहं की ममता छोड़ने के लिए वह मान-सम्मान की ओर नहीं देखता क्योंकि
कहीं उसे ग्रहण करने से अहं भाव स्थायी हो जायेगा ऐसा उसे लगता है। जिसके उदर में अभिमान समाया रहता
है वे ही हमेशा सम्मान की अपेक्षा करते रहते हैं। जो उस अभिमान को ही छोड़ने के लिये तैयार हो जाता है वह
मान-सम्मान की ओर नहीं देखता। जिसने सम्मान प्राप्त किया है उसे अपमान सहन नहीं होता अतः वहाँ सहज
ही देहाभिमान उत्पन्न होता है। इसलिये उसे सम्मान ही अच्छा नहीं लगता। वास्तव में देखा जाय तो ज्ञाता पुरुष
सम्मान प्राप्त करने की लालसा से ही अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता रहता है। इसमें आर्थिक स्वार्थ का लोभ भी
मन में रहता है। सारांश यही कि सम्मान की इच्छा न रखना ही शिष्य का पहला लक्षण है। अब 'निर्मत्सरता' का
लक्षण भी बताता हूँ, सुनो। ज्ञान की ईर्षा के कारण भी ज्ञानियों में परस्पर बैर उत्पन्न होता है। वहाँ अपने देह के
प्रति अभिमान पूरी तरह घर बनाकर बैठ जाता है। ज्ञान के अभिमान की कथा का क्या वर्णन किया जाय? असीम
तपश्चर्या कर विश्वामित्र दूसरी सृष्टि का निर्माण कर रहा था क्योंकि उसके मन में ज्ञान का अभिमान था। दुर्वासा
को भी ज्ञान का अभिमान था इसलिये उसने अम्बरीष को व्यर्थ ही शाप दे दिया। उसके शाप के भय से मैंने