श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 257, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २४१
मलमूत्र की गठरी है और नाशवान है यह तो दिखाई ही देता है इसलिये उसके प्रति होने वाला अहंकार नष्ट
होकर, उसके स्थान पर 'सोहं बुद्धि अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ' यह भावना दृढ़तर हो जाती है। सोहंभावना को दृढ़
बना कर उसने अहंभाव तथा ममता का त्याग किया रहता है। शिष्य के मन की यही 'निर्ममता' उसका चौथा गुण
है। शिष्य का हित साधने के काम में गुरु ही माता है, गुरु ही पिता है, सगे-सम्बन्धी भी गुरु ही हैं और बन्धु और
सुहृद भी गुरु ही हैं। गुरु की सेवा यही उसका नित्यकर्म है, गुरु सेवा ही उसका सच्चा धर्म है, गुरु ही आत्माराम
है, उसी प्रकार सुहृद का सारा गौरव भी सद्गुरु ही है। उसी प्रकार सद्गुरु को ही अपना हितैषी मानना चाहिये।
हे उद्धव! सद्शिष्य का यही पाँचवाँ लक्षण है। चित्त को वह कभी विचलित नहीं होने देता। सभी प्रकार से
सर्वकाल वह आत्मा में ही निश्चल रहता है। शरीर भले ही चंचल हो जाय लेकिन उसका चित्त गुरुचरण में ही
अटल रहता है। शरीर व्यापार चलता रहता है लेकिन उसके हृदय में कोई गड़बड़ी उत्पन्न नहीं होती, गुरुचरणों में
जो ऐसी निश्चलता रखता है वही सच्चा परमार्थी शिष्य है। जिसके हृदय में चंचलता होती है वह स्वहित साधने
वाला शिष्य है ही नहीं। जिसके हृदय में निश्चलता वास करती है वही परमार्थ का साधक है। इस प्रकार की
निश्चलता धारण कर जो अपने सच्चे हित की इच्छा रखता है, वही गुरुपदेश से एक क्षण में परमार्थ का पात्र हो
जाता है। जिस प्रकार एक दीपक से दूसरा जलाने पर वह भी उसकी ही तरह हो जाता है, उसी प्रकार निश्चल
वृत्ति के साधक को गुरु प्राप्त होते ही वह तत्काल तद्रूप हो जाता है। अर्थात् अंतःकरण की निश्चलता ही शिष्य
का श्रेष्ठ लक्षण है और वही शिष्य का छठवाँ गुण है, इसे ध्यान में रखो। इसी से षड्विकारों का विनाश होता है।
षड्विकार देह में ही होते हैं। लेकिन शिष्य देहबुद्धि को स्पर्श ही नहीं करता अतः गुरुपदेश के अनुसार आचरण
करने के कारण उसके विकार भी नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार की निश्चलता साध्य कर जो अर्थ जिज्ञासा से
परमार्थ की साधना के लिये तैयार होता है, वही गुरुचरणों को भजने लगता है। जिसे अर्थ की जिज्ञासा ही नहीं है
वह गुरु का भजन ही नहीं करेगा और अगर कभी करेगा भी तो विषय के लालच से ही करेगा। विषय का स्वार्थ
छोड़कर, पूर्ण तत्त्वार्थ जानने के लिये जो भजन करता है, उसी का नाम है 'जिज्ञासा'। ऐसी तत्त्व जिज्ञासा धारण
कर वह परमार्थ की चाह बढ़ाता रहता है। इस प्रकार स्वहित के लालच के कारण उसके चित्त को क्षणभर का भी
विश्राम नहीं मिलता। परमार्थ के प्रति नितान्त प्रेम तथा 'बढ़ती हुई आस्था' शिष्य का सातवाँ लक्षण है। यह
सातवाँ लक्षण जिज्ञासा के ही बल पर परमार्थ की दहलीज चढ़ने में सफल हुआ। अस्तु! सद्गुरु अनेक जनों के
लिये शीतल छाँह है शिष्यों की तो माँ ही है। उसके प्रति जो ईर्ष्या करेगा उसकी आत्मप्राप्ति दूर हुई समझिये।
इसलिये जो भी कोई गुरु का अनुगृहीत हो उसे गुरु समान ही मानना चाहिये। उसके चित्त को ईर्ष्या का स्मरण ही
नहीं होता। वह सबसे अत्यन्त विनम्रता से आचरण करता है। इसके विपरीत यदि कोई गुरुबन्धु कनिष्ठ हो तथा
गरीब हो, उसमें उत्तम गुण भी हों तो उसे न मानना, उस पर झूठे आरोप लगाना कुशिष्य का लक्षण है। दूसरे में
उत्तम गुण हो उसे दोष देकर उसका ज्ञान झूठा है यह कहना 'ईर्ष्या' का लक्षण है। साक्षात भेंट होने पर उसके
गुणों का स्रोत गाना विनम्र होकर उसके पैर छूना लेकिन उसके पीठ घुमाते ही उसकी निन्दा करने का नाम है
'ईर्ष्या'। 'सच्छिष्य' का आचरण इस सम्बन्ध में बिलकुल शुद्ध रहता है। वह अपने को 'ईर्ष्या' का स्पर्श नहीं
होने देता। सामने वाला उत्तम हो, मध्यम हो या साधारण हो वह सबको नमन करता है। छल उसे आता ही नहीं
है। गुरु ने उसे सर्वत्र ब्रह्मभावना धारण करने का पाठ पढ़ाया रहता है। उस पर सदा ध्यान देते हुए वह सबको
समभाव से वन्दन करता है। इस प्रकार, हे उद्धव! किसी भी प्राणी का छल करने की जानकारी न होना यही
शिष्य का 'अनसूया' आठवाँ गुण है। इन आठ मनकाओं की माला जिसके हृदयकमल में निरन्तर वास करती है