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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 869 में से

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पृष्ठ 254

२३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
साधन किये उनमें गुरु भी एक साधन होगा। लेकिन यही बात अगर मुमुक्षु कहता है तो वह मूर्ख कहलाएगा।
उसका निजात्मसुख डूब जाएगा। सद्गुरु साधनरूप है और साध्य उससे अलग है यह कहने से वह लुट जायगा,
पूरी तरह लुट जायेगा। जो चित्सुख से सदा सम्पन्न है, जिसे चित्स्वरूप से समाधान प्राप्त होता है वह चिन्मात्र
से कभी भी अलग नहीं रह सकता। नमक जब समुद्र में पड़ता है तभी वह समुद्र कहलाता है। दीप जब
दावाग्नि को आलिंगन देता है तभी वह दीप तेज दावाग्नि बनकर रहता है। उसी प्रकार जिसे चिद्रूप का ज्ञान
होता है वह पूर्णरूप से चिद्रूप ही बनता है। उसी प्रकार गुरु और ब्रह्म भिन्न नहीं थे इस सम्बन्ध में उपनिषद में
प्रमाण है। यदि घृत की गुड़िया बनायी जाय तो वह घृत से भिन्न न होकर घी के रूप में ही आकारित होती है,
उसी प्रकार सद्गुरु की मूर्ति भी चिद्रूप में ही साकार हुई रहती है या सच्चिदानन्द की शोभा अपनी आँखों से
देखने के लिये उसने सहज ही देह धारण किया रहता है। उसकी भेंट होने के लिये सहस्र भाग्य होना चाहिये
ऐसा कहते-कहते शायद उससे भेंट हो जाय लेकिन ऐसी भी बात नहीं है। सद्गुरु जिधर भी दृष्टिक्षेप करता है,
उधर सुख की ही सृष्टि उत्पन्न होती है। वह जहाँ कहता है वहाँ महाबोध स्वानंद से रहता है। उस सद्गुरु के
चरण दिखायी देते ही भूख-प्यास तत्काल नष्ट हो जाती है। कल्पना तो उठ ही नहीं सकती। सारांश गुरु के
चरणों में निजसुख निवास करता है। उस सद्गुरु का लक्षण बताते समय शब्द रुक जाते हैं। जो सनातन पूर्णब्रह्म
है उसे लक्षण की क्या आवश्यकता है? फिर भी एक लक्षण बतलाने की स्फूर्ति आती है। वह यह कि उसमें
सर्वत्र शान्ति दिखायी देती है। शान्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं दिखायी देती। उद्धव! वह शान्ति ही
समाधान है। शान्ति ही ब्रह्मज्ञान है और शान्ति ही पूर्णब्रह्म है यह जान लो। सद्गुरु की ऐसी स्थिति जानकर
शिष्य के मन में गुरुभक्ति के प्रति प्रेम और भी अधिक बढ़ गया। इसलिए वह गुरु की खोज में निकल पड़ा
उसका अंतःकरण उसे विश्राम नहीं दिला रहा था। आठों पहर गुरु का ही लक्षण गुरु का ही ध्यान वह करने
लगा। उस सर्व समर्थ को मैं कब देख पाऊँगा? मेरा यह पाश कब छूटेगा? मन को शान्ति कब और कैसे प्राप्त
होगी? इस प्रकार वह सद्गुरु के लिये पागल हो गया। देखते-देखते यह आयु समाप्त हो गयी लेकिन मेरी
अभी सद्गुरु से भेंट नहीं होती, यह मनुष्य देह समान होते ही सब कुछ डूब जायेगा ऐसा उसे लगने लगता है।
गुरु का नाम सुनने मात्र से ही वह मन से आगे भागने लगता है और उस वार्ता के ही गले लग जाता है। उसकी
आतुरता अत्यधिक बढ़ जाती है। यदि सद्गुरु से प्रत्यक्ष भेंट नहीं होती तो वह मन से ही गुरुनाथ की पूजा
करने लगता है और परमभक्ति से पूजा करते समय उसका प्रेम इतना अधिक उफन उठता है कि वह हृदय में
नहीं समा पाता। सद्गुरु से भेंट करने के लिये वह तीर्थ और तपोवन भटकता रहता है। नित्यकर्म करते समय
भी वह एक क्षण के लिये गुरु को नहीं भूलता। सद्गुरु की प्राप्ति हो इसलिये वह हर छोटे बड़े की पूजा करने
लगता है। मेरा गुरु मुझे मिले इसलिये वह ब्राह्मणों का अत्यधिक सत्कार करता है। वह भालू की तरह निरन्तर
'गुरु-गुरु' का जप करता रहता है। गुरु के अतिरिक्त वह अन्य किसी का चिन्तन नहीं करता। उठते-बैठते खाते
समय, सोते समय कभी भी मन में गुरु का विस्मरण नहीं होने देता। जागृति में तथा स्वप्नावस्था में भी उसे गुरु
की चिन्ता लगी रहती है। कैसी विचित्र बात है। केवल गुरु का स्मरण करते ही उसकी भूख-प्यास समाप्त हो
जाती है। वह घर-बाहर के सुख को भूल कर सदा परमार्थ की ही ओर उन्मुख रहता है। सद्गुरु के प्रति
जिसका इतना प्रेम रहता है, उसकी आस्था स्पर्धा से बढ़ती ही जाती है। उसे गुरु के रूप में तत्काल मैं ही दर्शन
देता हूँ। उत्कंठा जितनी अधिक रहती है, उतनी ही भेंट अधिक निकट होती है। भेंट के लिये साधनों में 'विशेष
उत्कंठा' यही प्रमुख साधन है। अन्य कितने ही बड़े साधनों का प्रयोग क्यों न करें लेकिन उससे आत्मज्ञान का