श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २५१
तथा नमकीन चीजें खाने की इच्छा होती है। उस समय गर्भ के शरीर पर पूरी चमड़ी न होने के कारण शरीर
खौलने लगता है और उस दुःख से वह करवटें बदलता रहता है। उस गर्भ को पेट में क्या यातनायें हो रही हैं
इसका अनुमान माँ-बाप को नहीं होता। उनसे छुटकारा दिलाने वाला वहाँ कोई नहीं होता। उस जीव की व्यथा
वह स्वयं ही जानता है। जिस स्थान का उच्चार कोई मुँह से भी नहीं करता, जो स्थान कोई किसी को देखने भी
नहीं देता, ऐसे उस योनिद्वार से अत्यन्त संकट से, आखिर प्राणी का जन्म होता है। जो नित्य का मूत्रालय है,
नरक की खान है और रजस्वला के रुधिर का प्रवाह है, वहाँ से प्राणी का जन्म होता है। रजस्वला स्त्री के गन्दे
रक्त से यह शरीर बनता है और गन्दे रक्त से पुरुष का जन्म होता है, फिर भी वह अपने को पवित्र कहता है।
गर्भवास से अधिक दुःख और कौन सा है? मताभिमानी जो कहते हैं वह मिथ्या है। प्रवृत्ति में सुख बिलकुल
नहीं है। एक जन्म से न जन्म की समाप्ति होती है और न एक मृत्यु से मृत्यु ही समाप्त होती है। काल योनि के
द्वार से असंख्य जन्मों के फेरे लगवाता है। बार-बार जन्म और बार-बार मृत्यु, यह बराबर चल रहा है। ऐसी
प्रवृत्ति में सुख क्या होगा? हाँ, भयंकर दुःख अवश्य सहना पड़ता है। जन्म और मृत्यु के रिक्त स्थान में बड़े-
बड़े दुःख पीड़ा देते हैं। उनका दुःख देने का ढंग भी बताता हूँ। चोरों के हमले के भय से तेजी से भागो तो चोर
बीच में ही लूट लेते हैं, उसी प्रकार जन्म-मरण के अंतराल में षड्विकार रहते हैं। षड्विकारों की पतिव्रता
षडर्मी जीव से जोंक की तरह चिपक जाती हैं। सब मिला कर देखा जाय तो प्रवृत्ति में नितांत दुःख है, सुख जरा
भी नहीं है। अब कर्मवादी जीव को स्वतंत्र कर्मकर्त्ता मानते हैं, लेकिन उनका यह कहना मिथ्या है क्योंकि
पराधीनता उसे स्वयं अपनी आँखों से दिखायी देती है।
अत्रापि कर्मणां कर्तुस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते।
भोक्तुश्चदुःखसुखयोः को न्वर्थो विवशं भजेत्॥ १७॥
यदि जीव स्वतंत्र होता तो उसे कभी दुःख न भोगना पड़ता, सदा सुखी ही रहता। दुःख का मूल जो पाप है
उसे वह न करता। बेचारा जीव हमेशा से ही दीन, कर्म करके कर्माधीन रहने वाला, उसे कर्म का फल देने वाला
कोई दूसरा ही रहता है, वही उसे सुख-दुःख का भोग कराता है, इसे ध्यान में रखो। इसलिये ईश्वर की सत्ता ही
श्रेष्ठ है। वही कर्म का फल देने वाला है। जीव सुख-दुःख का भोक्ता है, वह स्वतंत्र नहीं है। इस पराधीनता के
कारण ही वह भयानक सुख-दुःख भोगता है। दुःख की इच्छा कोई नहीं करता लेकिन फिर भी उसे वह प्राप्त
होता है। इससे भी प्रकट होता है कि उसे स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है। वह पराधीन होकर आचरण करता है इसलिये
उसे बिना माँगे सुख-दुःख भोगना पड़ता है। इस पर विपक्षी कहेंगे कि जो विधिपूर्वक कर्म करना नहीं जानते
वही जीव दुःखी होते हैं और जो कर्म करना जानते हैं वे सुखी रहते हैं। जो सदाचार सम्पन्न श्रोत्रिय हैं या जो
याज्ञिक और अग्निहोत्री हैं वे इस लोक और परलोक के लिये विधिपूर्वक कर्म करते हैं। जिनके इन्द्रिय अव्यंग
हैं, उनमें कोई न्यूनता नहीं है, वे विधिपूर्वक कर्म कर दोनों लोकों के सुखों का कर्मयोग द्वारा उपभोग करते हैं।
किन्तु (भगवान कहते हैं) कर्म में भी जो श्रेष्ठ रहता है उसे सुख का उपभोग सदा करने को मिलता ही है, ऐसी
बात नहीं है। उसके बारे में भी बताता हूँ।
न देहिनां सुखं किंचिद् विद्यते विदुषामपि।
तथा च दुःखं मूढानां वृथाहंकरणं परम्॥ १८॥
जो कर्म के सच्चे ज्ञाता हैं वे भी दुःखी दिखाई देते हैं और जो कर्म का स्पर्श भी नहीं करते वे मूर्ख