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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 869 में से

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पृष्ठ 264

२४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरण की ही मृत्यु हो जाती है। विश्व का भान नष्ट हो जाता है और चारों ओर घनानंद भर जाता है। तब सारी
दृष्टि सुखमय हो जाती है और सारी सृष्टिभी आनन्दमय हो जाती है। आत्मानंद से मिलन के कारण परमानन्द
का वातावरण हो जाता है। उस सुख की बराबरी कभी किसी बात से नहीं हो सकती। जहाँ वेद भी मौन हो जाते
हैं और वृत्ति तत्पदा को प्राप्त होती है। फिर द्वैत शेष नहीं रह जाता और वृत्ति की वृद्धि रुक जाती है। सुखस्वरूप
में ही डूब जाने के कारण उसकी वृद्धि तथा नाश रुक जाता है। लकड़ी के बिना अग्नि जिस प्रकार अपने मूल
तेज में मिल जाती है उसी प्रकार वृत्ति भी अद्वैत रूप में सुखस्वरूप में मिलकर एकरूप हो जाती है। गंगा सागर
में मिलकर सागर ही बन जाती है। या जल और नमक का मिलन होने पर वह सब जलरूप ही हो जाता है। एक
दीपक दूसरे दीपक से मिल कर एकरूप हो जाते हैं उसी प्रकार वृत्ति का लय होने पर निर्व्यंग आत्मसुख प्राप्त
होता है। फिर उस समय यह कहना भी शेष नहीं रह जाता कि आत्मा एक अद्वैत है। अर्थात्, आत्मा द्वैताद्वैत से
भिन्न, नित्य और सत्यस्वरूप है। वह ज्ञानस्वरूप, स्वयंप्रकाश, अविकारी, अविनाशी, अकर्त्ता, अभोक्ता, उदास
तथा निर्निवेश निजात्मरूप है। उसकी देह नहीं है, कुल नहीं है, उसके नेत्र नहीं हैं, उसके कान नहीं हैं, उसका
कोई नहीं है, वह समस्त मंत्र एवं मंत्रार्थस्वरूप है। वह अजन्मा, आद्य, अप्रमेय, अतर्क्य, अलक्ष्य, अव्यय
नामरूप से आकलन न होने वाला भावाभावशून्य है। जो भाग्य, भोक्ता और भोग भी नहीं है, जो कार्य, कर्त्ता और
कर्म भी नहीं है, जहाँ कर्त्ता और अकर्त्ता की ही समाप्ति हो गयी है वह अविनाशी, अभंग, शुद्ध, बुद्ध, असंगह,
देहद्वय का संग जिसे स्पर्श नहीं करता। आत्मा के सिवा सब कुछ अनित्य है यह निश्चय दृढ़ हो जाने पर नित्य
और अनित्य दोनों ही डूब जाते हैं और अंतर्वाह्य केवल आत्मस्वरूप ही बच जाता है। अज्ञान पूरी तरह नष्ट हो
जाता है और ज्ञान की भी कोई स्थिति नहीं रहती। गुण, गुणी और गुणातीत ये भी इस अवस्था में नष्ट हो जाते
हैं। हे उद्धव ! सचमुच परमेश्वर वही है ऐसा मेरा निश्चय है। उपनिषदों द्वारा अभिव्यक्त तथा आत्मत्व से
प्रतिपादित वही है। वृत्ति ऐसी स्थिति में पहुँचते ही संसारकी निवृत्ति होती है। वेदांत तथा सिद्धांत का यही
अन्तिम निर्णय है। सचमुच ही निजात्मरूप की प्राप्ति हो जाने के बाद कार्य, कर्म, कर्त्तव्य यह सब पूरी तरह
खत्म हो जाता है। अद्वैत प्रतिपादक श्रुति के मनन से और गुरुकृपा के प्रकाश से वृत्ति निजात्मपद को प्राप्त कर
लेती है। कैसा अहोभाग्य है यह ? हे उद्धव ! देवादिदेव भी मेरा वन्दन करते हैं। मेरे उस ज्ञान की सारी धरोहर
परम कृपा से मैंने तुम्हें सौंपी है। हे उद्धव ! तुम्हें सचमुच ही निवृत्ति प्राप्त हो इसलिये मैंने तुम्हें यही विषय
अनेक श्रुतियों का आधार लेकर प्रेमपूर्वक समझाया। अब तुम देह आदि जो भी कुछ मिथ्या, निन्दनीय, तिरस्कार
योग्य है उसका अपने चित्त से स्पर्श न होने दो। उससे अलिप्त होकर तुम परमार्थी बनो। तुम्हें यह अलभ्य लाभ
प्राप्त हुआ है लेकिन उसके लिये तुम्हें कठिन प्रयास करना होगा। अनेक मत-मतान्तर तुम्हें परेशान करने
आयेंगे। उनके बारे में भी सुनो।
अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदुःखयोः।
नानात्वमथनित्यत्वं लोककालागमात्मनाम्॥ १४॥
अनेक प्रकार के फलों की इच्छा कर और उसके अनुसार सुख दुःख भोगने वाले अनंत जीव हैं। उनका
यह कहना है कि जो लोग मानते हैं कि सारे जीव एकरूप हैं, वह सच नहीं है क्योंकि यदि वैसा होता तो एक के
सुख से सभी सुखी हुए होते अथवा एक के पाप से सभी पापी हो जाते। लेकिन ऐसा सब जगह नहीं होता।
कर्मवादियों का मत है कि जीव नित्य और अनंत है, मुख्य ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं है, हमारा कर्म ही