श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
गर्भवास सहन किया। ब्रह्मदेव को भी ज्ञान का अभिमान हुआ और उसने गोपाल वत्सों का हरण किया। ज्ञान के
अभिमान के भय से मुझे उनका रूप धारण कर रहना पड़ा। हे उद्धव! सभी प्रकार के अभिमानों में ज्ञान का
अभिमान बहुत कठिन है। वसिष्ठ और विश्वामित्र ज्ञानाभिमान के ही कारण परस्पर लड़ रहे थे। ऐसे ज्ञानाभिमान
के भय से ही मैं ग्वाला बना। याज्ञिक ब्राह्मणों ने तो मुझे मूर्ख कहा क्योंकि उन्हें कर्म का और ज्ञान का अभिमान
था। जब मेरी ही यह अवस्था है तो दूसरों के बारे में क्या कहा जाय? ज्ञानाभिमान के पाश से ज्ञानी जन
सरलतापूर्वक छूट नहीं पाते और ज्ञानाभिमान की जाति भी क्या है? वह मूर्खों के पास खड़ा नहीं रहता। ज्ञानियों
में ही बैर उत्पन्न कर ईर्ष्यापूर्वक रहता है। सारांश यह कि जिसे ईर्ष्या के बिना रहना है उसे ज्ञान का अभिमान
त्याग देना चाहिये। अन्यथा वह ज्ञानियों को ईर्ष्या से रहने को बाध्य करता है। अब ईर्ष्या की सामग्री के बारे में
सुनो। वह देह में देहाभिमान को दृढ़ करता है, ज्ञान का सहारा लेता है और द्रव्य की आशा से उसमें लोभ भी
घुस जाता है। जिसके पास इतनी सामग्री एकत्र हो जाती है वही ईर्ष्या के साथ द्वेष को चलाता है। सच्चे शिष्य को
यह सहन नहीं होता। वह ईर्ष्या का त्याग ही कर देता है। ईर्ष्या भी कैसी है? वह सदा ज्ञानी के ही पास रहती है।
पण्डितों में ईर्ष्या जबरदस्त होती है। वे इस जन्म में उसे नहीं छोड़ते। जितने भी पण्डित दिखायी देते हैं वे सब
ईर्ष्यालु ही होते हैं। वे दिखाने के लिए अत्यन्त विनम्र होकर मीठी बातें करते हैं। लेकिन उनकी बातें ईर्ष्या तथा
दूसरों के छल से भरी रहती हैं। ईर्ष्या के कारण पण्डित क्रोध करते हैं और एक-दूसरे पर गन्दे आरोप लगाकर
निन्दा करते रहते हैं। ईर्ष्या की ऐसी बाधा सच्चे शिष्य को कभी स्पर्श नहीं करती। जब ज्ञानीजनों को भी ईर्ष्या
नहीं छोड़ती तो औरों की क्या बिसात है? किन्तु शिष्य तो द्वेष की बात ही नहीं करता और ईर्ष्या को समूल तोड़
देता है। वास्तव में शिष्य को ईर्ष्या को छोड़कर ही रहना चाहिये। बिना ईर्ष्या के रहने के सम्बन्ध में एक कथा
सुनाता हूँ, सुनो। उसके सामने से कोई लाभ ही वस्तु छीन कर भी ले जाए तो वह मन में द्वेष भाव उत्पन्न नहीं
होने देता। समस्त प्राणियों में ईश्वर का वास है यह भावना मन में होने के कारण उसे द्वेष हो ही नहीं सकता।
दुर्जन निन्दारूपी वाग्बाण उसे कितना ही क्यों न बींधे लेकिन वह मन में द्वेष नहीं उत्पन्न होने देता। निन्दा में वह
अपना हित ही मानता है। जिसने मेरी निन्दा की है उसे वह हित चाहनेवाली माँ के समान समझता है। उसने मेरे
पापों का मल धो डाला है और मेरी वृत्ति निर्मल कर दी ऐसा ही वह मानता है। ऐसे विचारों से वह अपने मन को
द्वेष का स्पर्श नहीं होने देता। इसे ही 'मत्सररहित' होना कहते हैं और यह शिष्य का दूसरा लक्षण है। इसके बाद
तीसरा लक्षण है, 'दक्षता' जिसके सम्बन्ध में बताता हूँ। अपना हित साधने के लिये शिष्य की 'दक्षता' कितनी
उपयोगी होती है यह तुम्हारी समझ में आयेगा। 'सावधानी' अर्थात् जागरूकता का सूर्योदय होते ही वह निद्रा तथा
तंद्रा का अन्धकार झट नष्ट कर देता है और 'धारणा' के दिन की शुरुआत हो जाती है और धृति का मध्याह्न हो
जाता है। ऐसे दिन का उदय होते ही शमदमादि समुदाय भक्ति के मार्ग पर चलने लगता है। मार्ग में क्षण भर के
लिये भी नहीं रुकता। वहाँ पग-पग पर निजबोध का प्याऊ रहता है जहाँ राह चलने वालों की प्यास तो मिटती
ही है साथ ही तृषा की तृष्णा भी शान्त हो जाती है। इस मार्ग में गाँव के लोग (संत) मिले और वे 'सोहं' की
भावना से एक साथ हो लिये। इससे आगे का मार्ग चूकने का भय ही नहीं रह जाता। वे सीधे अपने गंतव्य स्थान
पर पहुँच जाते हैं। हे चतुर उद्धव, सुनो! 'आलस्य' या 'विलम्ब' मन को स्पर्श न करे इसी का नाम है 'दक्षता'।
यही शिष्य का तीसरा लक्षण है। पहले का पुराना संग्रह उसके पास था उसकी ममता भी वह छोड़ देता है और
आत्मज्ञान के अनुभव से उसे छोड़ने का दुःख भी उसे नहीं होता। देह के प्रति 'अहं' को दृढ़ करने से देह के
प्रति ममता जगती है। जब मन को देहाभिमान ही स्पर्श न करे तो ममता उसी क्षण नष्ट हो जाती है। शरीर