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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 869 में से

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पृष्ठ 259

दसवाँ अध्याय २४३
जायापत्यगृहक्षेत्रस्वजनद्रविणादिषु।
उदासीनः समं पश्यन् सर्वेष्वर्थमिवात्मनः॥७॥
तो उसके सम्बन्ध में भी ध्यान देकर सुनो। शिष्य अपना दुःख नष्ट करने के लिये और आत्मसुख की
प्राप्ति के लिये विवेक के साधन साध्य करता रहता है। आत्मसुख का विचार किया जाय तो वह सारे देह में एक
समान रहता है। स्त्री और पुरुष ये दो व्यक्ति विजातीय होते हुए भी उनमें सुख अलग-अलग प्रकार का नहीं
होता। देह में भेद होते हुए भी स्त्री और पुरुष में 'आत्मा' और 'आत्मी' नहीं होते। आत्मसुख नाम की जो वस्तु
है वह प्रत्येक व्यक्ति में स्वतःसिद्ध होती है। सुख के ही लिये सब प्रपंच से लिपटे रहते हैं। लेकिन जिस पर
गुरु की कृपा होती है उसे अद्वैत निजात्मसुख का लाभ होता है। एकत्व से नित्य और निर्दोष आत्मसुख हाथ
आने पर भी, उसे नष्ट करने के लिये जो द्वैत की इच्छा करता है वह महामूर्ख है। यदि प्रपंच में ही सुख होता तो
सनकादिक जैसे लोगों ने उसका त्याग क्यों किया होता? क्योंकि द्वैत नाम से जो भी कुछ है वह पूर्णतयः
दुःखमय ही है और अद्वैत में परमसुख है। यही ज्ञान सम्पादन करने के कारण साधक स्त्री, बच्चे, सगे-सम्बन्धी,
सम्पत्ति आदि के प्रति उदासीन हो गये और अद्वैत में ही उनका मन रमा। फिर कैसा घर, कैसा खेत? स्त्री और
बच्चों को भी कौन पूछता है? तरह-तरह के धनधान्य से समृद्ध होते हुए भी 'वह भी मेरा' और 'देह भी मेरा'
ऐसी बात वह नहीं करता। हे उद्धव, सुनो। इस प्रकार मेरे भक्त तत्त्व विचार से लिपटे होने के कारण वे संसार के
प्रति उदासीन रहते हैं। वे गुरु के चरणों से लिपट कर प्रपंच पर झाडू लगा देते हैं और आत्मसुख देने वाले
गुरुराया के भजन में भक्तिभाव से तल्लीन रहते हैं। वह आठों पहर गुरु की ही सेवा करता रहता है। निरन्तर
भक्तिभाव से वह अपना अंतःकरण गुरु के चरणों में ही समर्पित कर देता है। हे उद्धव! अब तुम कहोगे 'देह के
सिवा भिन्न ऐसी कौन सी वस्तु देख कर उसे आत्मसुख प्राप्त होता है? और विदेहपन का अनुभव कैसे आता
है? तो देह में रह कर विदेहता तथा प्रपंच में रहकर शिष्य को अद्वैतता कैसे प्राप्त होती है, उसकी कथा सुनो।'
विलक्षणःस्थूलसूक्ष्माद् देहादात्मेक्षिता स्वदृक्।
यथाग्निर्दारुणो दाह्यात् दाहकोऽन्यः प्रकाशकः॥८॥
आत्मा स्थूल तथा सूक्ष्म देह से सदासर्वदा भिन्न है। इस भिन्नता के साथ ही वह हर समय प्रपंच में विचरण
करता रहता है। दोनों देहों में जीव विचरण करता है उस समय भी जीवों में देहातीत भाव का स्फुरण होता रहता
है। लेकिन उन्हें इसका अनुभव नहीं होता। वह कहता है, 'मेरी आँख में दर्द है' लेकिन नहीं जानता कि 'मैं ही
दर्द कर रहा हूँ' वह कहता है 'मेरा पैर टूट गया' लेकिन यह नहीं कहता है कि मैं ही टूट गया हूँ। इस प्रकार देह
में विचरण करते हुए भी मैं देह से भिन्न हूँ, ऐसी बात करता है। लेकिन भ्रान्ति के कारण मनुष्य को उसकी
देहातीत अवस्था का अनुभव नहीं होता। द्रष्टा अर्थात् देखने वाला कभी दृश्य अर्थात् देखने की वस्तु नहीं हो
सकता। देखने की वस्तु अर्थात् दृश्य जड़ होता है और देखनेवाला अर्थात् द्रष्टा उस दृश्य को चेतना करने वाला
अर्थात् जानने वाला होता है। इसीलिये आत्मा देह से विलक्षण अर्थात् विपरीत लक्षण वाला होता है। आत्मा दो
कारण से विलक्षण है। एक तो देखने वाले की दृष्टि से तथा दूसरा स्वप्रकाशकत्व से स्वसंवेद्यत्व से। इसलिये वह
दोनों देहों से विलक्षण अर्थात् बिलकुल भिन्न है। दृश्य से द्रष्टा भिन्न है। तो फिर वह मन है ऐसा चार्वाक का मत
है। आत्मा को मन नहीं कह सकते क्योंकि ग्यारह इन्द्रियों में आत्मा को भी एक इन्द्रिय माना गया है। इन्द्रिय होने
के कारण वह जड़ है। इसीलिए मन आत्मा नहीं है। प्रपंच में मन की दक्षता दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में