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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 869 में से

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पृष्ठ 260

२४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह मन की दक्षता नहीं होती। जिस प्रकार प्राण के बिना राजा को भी अपना वैभव कभी दिखाई नहीं पड़ेगा,
शस्त्र के एक प्रहार से लौह बख्तर के भले ही टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाएँ लेकिन वह सामर्थ्य शस्त्र का नहीं
अपितु वह वीर का बल है। लोहे के बड़े गोले को यदि आग में डाला जाय तो वह तप्त होकर ज्वालाएँ निकलने
लगती हैं। लेकिन वह लोहे का सामर्थ्य नहीं है। उस लोहे की ही तरह मन भी जड़ है। ज्ञानप्रभा उसे प्रकाशित
कर, उसे श्रेष्ठत्व प्रदान कर प्रकृति में प्रवर्तन कराती है। मुरली के द्वारा सुमधुर गायन किया जाय या नाना प्रकार
के सुर निकाले जाएँ तो वह मुरली का गुण नहीं बल्कि बजाने वाले का कौशल है। उसी प्रकार मन का व्यापार
पराधीन ही समझो। उसका वह व्यापार स्वतंत्र नहीं होता क्योंकि मन जड़ है। सूर्य किरण का स्पर्श होते ही
सूर्यकांत में से अग्नि निकलता है, उसी प्रकार आत्मा के प्रकाश से मन अत्यन्त तीव्रता से विचरण करता रहता है।
जड़त्व के कारण ही मन जड़ है और आत्मा स्वप्रकाश से प्रकाशधन है। इसलिये मन आत्मा के अधीन है और
आत्मा आत्मत्व के कारण स्वतंत्र है। 'मेरा मन' इस प्रकार वह कहता है लेकिन 'मैं ही मन हूँ' ऐसा नहीं कहता।
इसलिये मन से आत्मा भिन्न है। वह अलग रहकर साक्ष्य के रूप में रहता है। दोनों देहों से भिन्न इस दृष्टि से
आत्मज्ञान साध्य कर शिष्य की देहबुद्धि का छेदन किया रहता है। इसलिये देहात्मवादी लोग जो उपाधि को सत्य
मानते हैं वे वास्तव में उसे मिथ्या सिद्ध करते हैं। अर्थात् यह शुद्ध, सात्त्विक बुद्धि नहीं है। तुम कहोगे कि मन से
अलग रहने वाला वह आत्मा ब्रह्मदेव होगा। क्योंकि वह सभी देवताओं में श्रेष्ठ है। लेकिन यह संदेह भी तुम मन
में धारण न करो। कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्मदेव भी मूढ़ ही था। वह सृष्टि की उत्पत्ति नहीं कर सका। उसकी बुद्धि
जड़ थी। उसे सावधान कर मैंने ही उसे आत्मज्ञान दिया। तब वह ज्ञानसम्पन्न होकर सृष्टि की उत्पत्ति कर सका।
केवल नाभिकमल में जन्म लेनेवाला ब्रह्मदेव मेरा बालक है। वह मेरे पेट पर ही खेलता है। वह विशुद्ध आत्मा
नहीं है। देवताओं का जो भी समुदाय है वह मुझसे ही प्रकाश प्राप्त करता है। सर्वप्रकाशक तथा अनादि ईश्वर मैं
हूँ, स्वयंप्रकाश-स्वभावी आत्मा मैं हूँ। दो देह और मन इनसे आत्मा बिलकुल भिन्न है। हिरण्यगर्भ अर्थात् ब्रह्माण्ड
के सूक्ष्म देह से भी आत्मा बिलकुल भिन्न है। हे भक्तोत्तम उद्धव! हिरण्यगर्भ यही परमात्मा है ऐसी भी बात नहीं
है क्योंकि हिरण्यगर्भ की आत्मा भी मैं ही हूँ। उसमें मेरी महिमा कहाँ से आयेगी? सारांश यह कि हिरण्यगर्भ की
उपासना भी एक साधन के रूप में ही करनी चाहिये लेकिन वह मायास्वरूप होने के कारण उसे सच्ची आत्मा का
स्वरूप नहीं प्राप्त होगा। जिस ढंग से वह विलक्षणता प्राप्त होती है उसके सम्बन्ध में भक्तों को वह दृष्टांत देकर
अभिव्यक्त करता है। अग्नि काष्ठ में ही रहता है लेकिन काष्ठ बन कर नहीं रहता। लकड़ी पर लकड़ी का घर्षण
करने से वह प्रकट होता है और तत्काल ही उन लकड़ियों को जला देता है। उसी प्रकार आत्मा भी देह में ही
रहता है लेकिन वह देह बनकर नहीं रहता, वह जब ब्रह्मज्ञान से प्रकाशित होता है तब वह अनायास ही देहभाव
को जला देता है। जिस प्रकार एक ही जगह रहकर दाह्य पदार्थ से दाहक भिन्न होता है उसी प्रकार प्रकाशित की
हुई वस्तु से स्वप्रकाश भिन्न होता है। अग्नि के दृष्टांत से आत्मा का सच्चा स्वरूप नित्यत्व और निजात्म बोध से
सिद्ध होता है। काष्ठ के संयोग से ही अग्नि को जन्म, नाश, नाम और रूप प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार आत्मा को
भी देह के कारण ही विकारभाव प्राप्त होता है।
निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान् गुणान्।
अन्तःप्रविष्ट आधत्त एवं देहगुणान् परः ॥९॥
अनेक प्रकार के काष्ठ एकत्र होने के कारण जगत को अग्नि में काष्ठ के गुण समाविष्ट हुए दिखाई देते हैं