श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रुतं च दृष्टवद् दुष्टं स्पर्धासूयात्ययव्ययैः।
बह्वन्तरायकामत्वात् कृषिवच्चापि निष्फलम् ॥ २१॥
जैसा यह लोक है उसी प्रकार स्वर्गादि लोकों के बारे में भी हम सुनते हैं लेकिन वे भी पहले से ही
दोषयुक्त हैं। मूर्ख लोग वैसे दोषयुक्त लोक की भी इच्छा करते हैं। अब तुम पूछोगे कि स्वर्ग में कैसा दोष है तो
सुनो। वहाँ भी स्पर्धा, ईर्षा और विनाश रहते हैं। फिर वहाँ भोग के कारण तप भी क्षीण होता रहता है। अपने ही
समान दूसरे का तप देखने पर वह उसके साथ स्पर्धा करने लगता है। अपने ही तरह दूसरा सुख भोग रहा है यह
देखकर मन सुखी नहीं होता। अपने से ऊँचे पद पर किसी को आसीन होते देख उस पर किसी प्रकार का
दोषारोपण कर उसकी निन्दा करते हैं। जब वहाँ भी विषम भाव उत्पन्न होता है तो वहाँ वास्तव में सुख कैसे
मिलेगा ? इसलिये स्वर्ग प्राप्ति के बाद भी सबको एक जैसा सुख नहीं प्राप्त होता। लोग अपने-अपने कर्म और
तप के अनुसार कम-अधिक सुख भोगते रहते हैं। कोई उर्वशी का भोग करता है तो किसी को काली और विद्रूप
हिडिंबा प्राप्त होती है। सारांश, भोग के कारण तप का क्षय होकर विनाश अवश्य होता है। जैसे-जैसे लोग स्वर्ग
का भोग भोगते हैं वैसे-वैसे तप की शक्ति क्षीण होती जाती है। इस प्रकार वे स्वर्ग के लोग तप के क्षय के कारण
नष्ट हो जाते हैं। हे उद्धव ! स्वर्ग प्राप्ति के लिये विधिपूर्वक कर्म करने से विघ्नों की बाधा आती है। इसलिये
वास्तविक स्वर्ग की प्राप्ति तो होती नहीं। जो गर्भ में ही मर जाता है उसका नामकरण नहीं होता। उसी प्रकार
कर्म में विघ्न उत्पन्न हो जाने पर स्वर्ग की प्राप्ति भी रुक जाती है। अब यदि पूछोगे कि कर्म में विघ्न कौन उत्पन्न
करता है तो कर्म अपनी प्रक्रिया में ही दूषित होता रहता है। वह कर्म ही उस कर्म में भयानक बाधा उत्पन्न करता
है। कर्म ही कर्म का साधक भी है और बाधक भी। कर्म ही कर्म से मुक्त कराने वाला है। लेकिन यह बात न
जानने के कारण लोग उसमें उलझे रहते हैं। काम्य कर्म में विलक्षण बाधायें होती है। उसमें देश, काल, मंत्र, तंत्र,
द्रव्य, दक्षिणा विधि और पात्र सभी कुछ शुद्ध होना आवश्यक है। जिस प्रकार तपेदिक के रोगी के लिये थोड़ा
कुपथ्य भी बाधक होता है उसी प्रकार कामनिक कर्म में थोड़ा सा दोष भी विघ्न उत्पन्न करता है। दूध से भरे बड़े
बर्तन में यदि कांजी का एक बूँद भी पड़ जाय तो उस दूध से दही, दूध या घी कुछ भी प्राप्त नहीं होता। उसी
प्रकार कामनिक कर्म थोड़े से भी दोष के कारण फलरहित हो जाता है। इतना ही नहीं बल्कि वह कर्म ही
भयानक बाधा उत्पन्न करता है। साल भर खटकर किसान खेती करता है लेकिन फसल तैयार होने तक अनेक
बाधायें उपस्थित होती हैं और किसान का परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। पहले अच्छा खेत चाहिये, फिर उसके लिये
अच्छा बीज मिलना चाहिये, समय पर वर्षा होनी चाहिये, खेत में कीड़ों का प्रकोप नहीं होना चाहिये। खेती में
काम आने वाले औजार भी अच्छे होने चाहिए। बुआई होने के बाद भी उसकी अच्छी देखरेख होनी चाहिये और
बिना आलस किये सुबह होने तक पहरेदारी आवश्यक है। फसल हाथ में आने पर भी वर्षा उसे भिंगो देती है,
बाल रोग के कारण काले हो जाते हैं, जंगली घास उग आती है। उसी प्रकार कर्म पर अहंकार का रोग लगता है
अथवा अधर्म का कीड़ा उस कर्म का फल नष्ट कर देता है। फसल की यदि समुचित व्यवस्था नहीं हुई तो आशा
तृष्णारूपी पंछी फसल को खा जाते हैं और उसमें अनाज का एक भी दाना नहीं रहने देते। तिल पर यदि अहंकार
की मार पड़ जाय तो फिर क्या पूछना ? सेम दिखायी तो देती है लेकिन उसमें से दाना नदारद। कामक्रोधरूपी
चूहे तो फसल को मूल से ही खा जाते हैं। यदि विकल्प का हमला हो जाय तो फिर खेत में लकड़ी मिलना भी
दूभर हो जाता है और दुर्वासना रूपी टिड्डी दल आ जाए तो फिर ऊपर से लेकर नीचे तक सब खूँट ही रह जाते
हैं। इस प्रकार खेतिहर की ही तरह कामनिक कर्म में भी अनेक बाधायें उत्पन्न होती हैं। फल मिलना तो दूर,