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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 869 में से

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पृष्ठ 269

दसवाँ अध्याय २५३
कारण पतंगा मृत्यु को प्राप्त होता है लेकिन उस पर न्योछावर होने में उसे सुख प्राप्त होता है। उसी प्रकार
कर्मठों के लिए कर्म ही दुःख का कारण होता है लेकिन अपने अभिमान के कारण ही वे उसमें सुख मानते
हैं। वास्तव में वे अभिमान के कारण ही जीव को स्वतंत्र मानते हैं। यदि विचार किया जाय तो उन्हें स्वतंत्रता
नहीं होती। अब उसी का निरूपण करता हूँ।
यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदुःखयोः।
तेऽप्यद्धा न विदुर्योंगं मृत्युर्न प्रभवेद्यथा ॥ १९॥
दुःख का नाश होकर सुख की प्राप्ति के लिये वे कर्म का आचरण करते हैं। कर्मवादी स्वयं को बहुत ज्ञानी
समझते हैं लेकिन दुःख का नाश कैसे किया जाय यह सचमुच उनकी समझ में नहीं आता। कर्म करने से भी
जिसका नाश नहीं होता ऐसा दुःख कौन-सा है? अगर इसका उत्तर पूछो तो क्रमवार बताता हूँ। मरने से अधिक
कोई दुःख नहीं है, लेकिन उसका ही नाश कैसे किया जाय यह उन बेचारों को नहीं मालूम होता। मृत्यु का प्रहार
इतना प्रखर है कि जैसे गरम पानी में हाथ डालने से हाथ जलता है लेकिन घर नहीं जलता, उसी प्रकार मृत्यु
प्रबल रूप से अनिवार्य होने के कारण वह कर्म से नहीं टलता। जो सबको मारता है उस मृत्यु को कैसे मारा जाय
यह बात उन कर्मठों की समझ में नहीं आती। जो कर्मों में रहते हैं उन्हें मृत्यु अचूक आती है। मरने का दुःख तो
आखिर आना ही है इसलिये जब तक जीवित हैं तब तक सुख भोग लिया जाय ऐसी बातें मूर्ख लोग करते हैं।
लेकिन जीवित अवस्था में भी उन्हें सुख किस बात का है?
कोन्वर्थः सुखयत्येनं कामो वा मृत्युरन्तिके।
आघात नीयमानस्य वध्यस्येव न तुष्टिदः॥ २०॥
हे उद्धव ! कर्मठ लोगों को जीवित अवस्था में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती, यही बात मैं अब तुम्हें बता
रहा हूँ। विष मिलाकर यदि मिष्टान्न तैयार किया जाय तो ज्ञानी लोग उसे मीठा नहीं कहेंगे, उससे मेरी मृत्यु होगी
यह जानकर वे उसे फेंक देंगे। जिस घर में आग लगी हुई हो उसमें बुद्धिमान व्यक्ति क्षण भर के लिये भी नहीं
रुकेगा। मृत्यु के आने से पहले ही वह उस मकान को छोड़कर कहीं दूर भाग जायेगा। जब दरवाजे पर डकैत
आ खड़े हों तो खीर भी मधुर नहीं लगेगी। उसी प्रकार शरीर को मृत्यु आ सकता है यह मालूम होने पर
विषयभोग में सुख कैसे मिलेगा? जिसकी दाढ़ी में आग लगी हो उसे वह चेहरे की शोभा कैसे मानेगा? उसी
प्रकार शरीर में नित्य नया मृत्यु दिखायी देते हुए विषय भोग में सुख कैसे मालूम होगा? जब मृत्यु काल की
व्यथा शुरु होती है तो जन, धन, अन्न तथा स्त्री सुख नहीं दे सकती। वे सारे व्यर्थ हो जाते हैं। अंतकाल में कनक
और कांता ये दोनों ही दुःख का कारण बन जाते हैं। वासना के कारण प्राण उनका शरीर नहीं छोड़ पाता। इसके
कारण वह छटपटाता रहता है। जिस प्रकार सूली पर ले जाते समय विविध प्रकार के समारोह किये जाते हैं और
उस व्यक्ति को पंचपकवान खिलाये जाते हैं किन्तु उनसे उसे सुख नहीं प्राप्त होता। उसी प्रकार सामने साक्षात्
मृत्यु दिखायी देने पर विषय सुख में किसे आनन्द आयेगा? इसलिये जो बुद्धिमान हैं वे विषयों का त्याग करते हैं
और जो मूर्ख हैं वे ही उसमें आसक्त होकर रहते हैं। शरीर में यदि क्षणभर के लिये भी दुःख हो तो करोड़ों
विषय सुख भी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये जो विषयसुख के लिये छटपटाते हैं वे पागल हैं। चिरमिठास निर्विषयों
में ही है। सारांश, इस लोक में सुख है ही नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि परलोक में सुख है लेकिन हे उद्धव वहाँ
भी सुख नहीं प्राप्त होता। किस तरह यह सुनो।