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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 869 में से

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पृष्ठ 251

दसवाँ अध्याय २३५
जानते हैं। यहाँ कर्म चार प्रकार का है—नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा प्रायश्चित्त ये कर्म के चार विभाग हैं। ये
कर्म करते समय वृत्ति सावधान रखनी चाहिये। कर्म का आचरण कैसे करना चाहिये इसका मर्म मैं तुम्हें अभिनव
प्रकार से बताऊँगा। नित्य और नैमित्तिक कर्म अत्यन्त आवश्यक हैं। वह प्रत्येक व्यक्ति को करना ही चाहिये वह
कर्मफल की आशा किये बिना यथाविधि करना चाहिये। नित्यकर्म जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे नैमित्तिक
कर्म भी बढ़ने लगता है। फिर विषयप्राप्ति की इच्छा से काम्य कर्म उफनता है तब वह निषिद्ध हो जाता है।
इसलिये फल की अभिलाषा न कर नित्य नैमित्तिक कर्म समर्पण जानकर कृष्णार्पण करना चाहिये। काम्य अर्थात्
सकाम कर्मों का विशेष त्याग करना चाहिये जिस प्रकार उलटी किये हुए पदार्थ को लोग भूलकर भी नहीं देखते।
जब कामना ही छूट जाय तभी काम्य कर्मों का त्याग करना चाहिये। मन में कामना करने पर काम्य कर्मों का
त्याग सम्भव नहीं होता। मन में विविध प्रकार की कामनाओं का ताण्डव चल रहा हो और बाहर से विरक्ति का
ढोंग करना यह तो विडम्बना है। हे चतुर! उसे त्याग नहीं कहा जा सकता। कामना जब बढ़ने लगती है तो
निषिद्ध कर्म घटने लगते हैं। इसलिये कामना को ही समूल नष्ट करने से निषिद्ध कर्मों के घटने की सम्भावना
नहीं होती। या आँखों के समक्ष निषिद्ध कर्म होते देख यदि हरिनाम की गर्जना की जाय तो निषिद्ध कर्म बारह
मार्गों से भाग जाते हैं। हरिनाम के योग से सहस्र प्रायश्चित्तों का श्रेय मिलता है। जहाँ हरिनाम का जयघोष
चलता रहता है वहाँ निषिद्ध तत्काल भस्म हो जाता है। निषिद्ध अभक्तों के शरीर पर प्रहार करता है, भक्तों के
पास वह कभी भी नहीं आता। काम्य-निषिद्ध की हवा भक्तों को नहीं लगती। भगवान जब भक्तों की रक्षा करता
है तो उन्हें दोषों का सम्पर्क कैसे होगा? सहस्र प्रायश्चित्त केवल एक नामोच्चार से सम्भव होते हैं यह गोपनीय
बात किसी से न कहना। काम्य तथा निषिद्ध कर्मों का त्याग करने के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें विस्तार से बताया है।
अब नित्य और नैमित्तिकों के कर्म विभाग के बारे में भी सुनो। ईश्वर को अर्पण करने की दृष्टि से नित्यनैमित्तिक
कर्म अवश्य करने चाहिये। वही मन को निर्मल करता है तथा परमार्थ का प्रमुख साधन है। कुछ लोगों का
विचार है कि स्वधर्म बिलकुल निष्फल है लेकिन वे मूर्ख उसका मर्म नहीं जानते। स्वधर्म का आचरण करने से
जन्म सफल होता है और स्वधर्म के योग से परमार्थ का फल मिलता है। सुवर्ण की अशुद्धि को दूर करने के
लिये जब उसके पत्रे के दोनों ओर लेप लगा कर उसे आग दिखायी जाती है तो वह पुनः चमकने लगता है। उसी
प्रकार स्वधर्म मुझे अर्पण करने से उसका कर्म सफल होता है। यह गोपनीय मर्म कर्मठों को न मालूम होने से
उन्हें कर्म के सम्बन्ध में बहुत बड़ा भ्रम रहता है। कर्म मुझे अर्पण करने की बात कठिन अवश्य लगती है लेकिन
जिसे मुझसे प्रीति है उसकी दृष्टि से मुझे समर्पित रहती है। जिसका मन कृष्ण में सुनिश्चित हो गया है उसके
सारे कर्म कृष्णार्पण हो जाते हैं। भले ही वह मुझे अर्पण न करे लेकिन वे सहज ही मुझे अर्पण हो जाते हैं। जो
रथ में निश्चल बैठा दिखायी देता है, वह अपने स्थान से बिना हिले भी चलता हुआ-सा दिखाई देता है। उसी
प्रकार उसका (भक्त) स्वकर्म अनायास ही मुझे अर्पण हो जाता है। इस प्रकार निष्काम होकर सुखपूर्वक स्वधर्म
का आचरण करें। उसके योग से रज-तम बचाकर सत्व के योग से पुरुषोत्तम को प्राप्त होते हैं। वर्ण और आश्रम
की उत्पत्ति का मूल आधार जो मैं हूँ, उसे पहचानना चाहिये। अपने स्वभाव के अनुसार कुलधर्म से मेरी अकेले
की ही उपासना करनी चाहिये। वर्ण के लिये मैं ही आश्रय भूत हूँ। 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू' यह वचन
प्रसिद्ध है। उसी प्रकार आश्रमों की उत्पत्ति भी मेरे ही कारण है यह बात वेद गरज-गरज कर कह रहे हैं। देव,
देवी और कुलाचार का अधिष्ठान मैं हूँ। इस प्रकार मैं सभी का आधार हूँ। उद्धव तुम्हें मैं रहस्य की एक बात
बताता हूँ, सुनो। सारे कर्मों का अध्यक्ष मैं हूँ, यह समझ लो और कर्म करते समय मेरी ही अभिलाषा करो तथा