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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 869 में से

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पृष्ठ 262

२४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं होता कि मैं देवताओं का भी देवता हूँ। उस स्वप्न के अभ्यास के कारण वह राजा, 'मैं भिखारी' कह कर
चिल्लाता रहता है। वह सुनकर सेवक लोगों को हँसी आ जाती है और वे कहने लगते हैं, राजा साहब स्वप्न में
बड़बड़ा रहे हैं। वे गहरी मूर्च्छा में घिरे रहते हैं। नींद में वे इधर-उधर डोलते रहते हैं। उन्हें होश भी नहीं रहता
कि वे निर्वस्त्र हैं या उनके शरीर पर कोई कपड़ा भी है। नींद में वे खुर्राटे भरते रहते हैं। पुरोहित उसे थपकी देता
है तब कहीं विस्मित होकर वह जागता है और शरीर को वस्त्र से ढँकता है। 'स्वप्न में मैं भिखारी था' यह कहने
में भी उसे लज्जा होती है उसी प्रकार अविद्या रूपी निद्रा की तंद्रा में वह 'मैं देहधारी' मैं कर्मदरिद्री, मैं श्रीमान्,
मैं ज्ञाता, मैं महान जैसी बातें देहात्म भाव के कारण करने लगता है। उस उनींदी अवस्था में कर्माकर्म पाँव
पसारने लगते हैं। देह के मोह के कारण ही जहाँ भ्राँति फैली हो वहाँ हित-अहित का कौन विचार करता है ?
वह उसी प्रकार गहरी मूढ़ अवस्था में करवटें बदलता रहता है। लालचवश वह 'मैं' और 'मेरा' की रट लगाता
रहता है। इस प्रकार करवट बदलकर लेटते हुए वह गुरु के चरणों पर गिर पड़ता है। उसे पास आये देख श्री गुरु
उस पर कृपा कर उसे निजबोध से थपथपाते हैं। 'ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) की वाणी एक बार कान तक पहुँचते
ही उसकी अविद्यारूपी निद्रा भाग जाती है और वह तत्क्षण जाग उठता है। जागते ही वह आश्चर्यचकित हो
उठता है और 'मैं मेरा देह' कहने में लज्जित होता है। वह देहकर्म की निन्दा करता है और कर्मातीत जो ब्रह्म हैं
वह 'मैं हूँ' कहने लगता है। संसार पाश में बँधने के कारण अविद्या ही है। उसे काटने का एकमेव शस्त्र
ब्रह्मविद्या ही है। ब्रह्मविद्या अविद्या को निरस्त करती है इसलिये वह अवश्य ही ब्रह्म से भिन्न होगी और इसे भिन्न
कहने से अद्वैतपन टूटता है यह कहोगे तो यह सिद्धान्त टिकने वाला नहीं है। अज्ञान से ही प्रपंच का विस्तार
हुआ है। उसमें ज्ञान की और अज्ञान की सूक्ष्म राहें हैं। काँटे से काँटा निकाल देने से सारी झंझट समाप्त हो जाती
है। अविद्या जीव को बन्धन में फँसाने वाली है तो ब्रह्मविद्या बन्धनों को काटने वाली है। उनके बारे में तुम्हें
विस्तार से बताया। अब वही ब्रह्मविद्या किस प्रकार हमें प्राप्त हो सकती है, उसके सम्बन्ध की पूर्वपीठिका का
विवेचन करता हूँ, सुनो।
तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम्।
संगम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम् ॥ ११ ॥
उद्धव ! इसीलिये जिज्ञासु को चित्त को सदा स्थिर रखना चाहिये जिससे सत्यासत्य विभाग द्वारा विवेक
जागृत होता है। उसमें जितना असत्य होगा उतनी ही अविद्या होगी। उसके कारण ही जीव को नितांत पीड़ा होती
है। उसका समूल विनाश करने के लिए 'सद्विद्या' प्राप्त करनी चाहिये। सद्विद्या साध्य करने के बाद सद्वस्तु
(परब्रह्म) अधिक दूर नहीं है। वह अपने स्थान पर, इसी देह में कूट-कूट कर भरा है। शरीर इन्द्रियों के समुदाय
में ब्रह्म व्याप्त रहता है किन्तु वह व्याप्त होते हुए भी अलिप्त और अपने स्वभाव के अनुसार मुक्त रहता है।
सद्विद्या साधकर तथा आत्मानुसंधान कर साधक को दोनों देहों का निराकरण कर लेना चाहिये। स्थूल देह नश्वर
होने के कारण मिथ्या ही होता है और सूक्ष्म देह वासनामय कल्पित है। उस कल्पना को भी मिथ्यत्व आता है
इसलिए जो शेष रह जाता है वह केवल निर्विकल्प ब्रह्म ही है जिस प्रकार आकाश में प्रचण्ड मेघ पंक्ति एकत्र
होकर अपने ही सामर्थ्य से पर्जन्यवृष्टि करते हैं किन्तु शरद ऋतु के अन्त में वे ही आकाश में लुप्त हो जाती हैं,
उसी प्रकार देह में जो आत्मबुद्धि दृढ़ हुई रहती है वही विवेक का उदय होते ही नष्ट हो जाती है। जुगनू के
प्रकाश की ज्योति सूर्य को कैसे दिखाई देगी ? उसी प्रकार ब्रह्मविद्या का उदय होने पर देह की सच्चाई कैसे टिक