श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
की बकवास करते हैं जो सच नहीं है। जिस से जीव को सुख की प्राप्ति होती है उन इन्द्रियों को ही वे मिथ्या
कहते हैं। कोई आँखें फोड़ कर दर्शक बने वैसी ही यह वेदांतियों की बकवास है। यहाँ जब ईश्वर है ही नहीं
तो वह फल देगा यह बात भी मिथ्या होगी। अद्वैतवादी महामूर्ख होते हैं, वे वैराग्य के बहाने मूर्खों को गढ़े में
ढकेलते हैं। जिसका न कोई ठाँव है न ठिकाना और न सत्ता, ऐसे मिथ्या ईश्वर की मन में कल्पना कर वे
कर्मफल का त्याग कराते हैं। नरदेह में ज्ञान का उदय हुआ और उसने देह का ही नाश करा दिया। क्या किसी ने
फल को वृक्ष की जड़ काटते देखा है ? ज्ञान परिपक्व हो जाने पर सारे संसार का ही विनाश हो जाता है ऐसा
वेदांती कहते हैं। लेकिन जब यह सृष्टि प्रवाह रूप में नित्य ही है तो उसका विनाश कैसे होता है ? मनुष्य के
हृदय में स्थित ज्ञान से यदि संसार का नाश होता है तो जुगनू के तेज से चन्द्रमा, सूर्य आदि नवग्रह भी जलकर
भस्म हो जायेंगे। सारांश, निवृत्ति का स्वीकार करने पर किया हुआ परिश्रम व्यर्थ चला जाता है क्योंकि इन्द्रियों
के बिना जीव को कभी सुख की प्राप्ति नहीं होगी। इसलिये प्रवृत्ति ही सबके लिये श्रेष्ठ है। जमकर कर्म करने
चाहिये और उसके उत्तम से उत्तम फल भोगने चाहिये। जो संसार को केवल माया कहते हैं वे मूर्ख हैं, जीव को
संसार के अतिरिक्त दूसरा कोई सुख नहीं है। इसलिये देवतागण भी मनुष्य के होने की कामना करते हैं और
वेदांती मनुष्य देह की निन्दा करते हैं। उनकी युक्ति को कौन स्वीकार करेगा ? यह वेदवचन है, उसे कौन
झुठलायेगा ? सारांश, उनकी बात पर जो विश्वास करेगा उसका पूरी तरह नाश हो जायेगा। वेदवचन सदा
प्रमाणरूप रहता है उसे ही ये मिथ्या कहते हैं। इसका अर्थ यही न कि ये बहुत बड़े ज्ञानी बन गये ? (भगवान
कहते हैं) मीमांसकों की भाषा ऐसी होती है वे तर्क पर तर्क देकर अपना मत स्थापित करते हैं, लेकिन हे
उद्धव ! यह सरासर झूठ है। मीमांसावादियों का शब्द पांडित्य ध्यान में रखकर, प्रपंच की अनर्थता को दिखला
कर (भगवान) वैराग्य को सिद्ध कर रहे हैं।
एवमप्यङ्ग सर्वेषां देहिनां देहयोगतः।
कालावयवतः सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत् ॥ १६॥
श्रीकृष्ण ने कहा, हे उद्धव ! ये सारा मतवाद मिथ्या है। लेकिन उसे कैसे समझा जाय ? तो उन मतों पर
विचार करना पर्याप्त है। निवृत्ति कष्टप्रद है इसलिये प्रवृत्ति ही अत्यन्त श्रेष्ठ है ऐसा माना जाता है। किन्तु प्रवृत्ति
में भी अनेक कष्ट हैं और मृत्यु का भय तो अनिवार्य है। जन्म के मूल से ही काल जीव का अखण्ड पीछा
करता रहता है। लवनिमिष पल-पल काल 'समय साधता रहता है। जैसी चोर के साथ मित्रता होती है उसी प्रकार
काल का साथ रहता है। समय आते ही वह प्राण लूट लेता है कुछ भी शेष नहीं रहने देता। काल हाट बाजार
नहीं देखता, घंटा मिनट नहीं देखता, देश-विदेश नहीं देखता। अपने प्रभाव से वह सबको स्वाहा कर देता' है।
प्रवृत्ति के कष्ट सहते-सहते एकाएक मृत्यु का प्रहार होता है। ऐसा प्रसंग कभी न आये। जीव में वासना की डोर
जबरदस्त रहती है इसलिये वह मर गया, बचाओ आदि की गुहार करता है। लेकिन मृत्यु के प्रहार को कौन
निरस्त करेगा ? उस समय किसी का कोई उपाय काम नहीं करता। काल केवल मार कर ही छुटकारा नहीं करता,
अपितु भविष्य में भी काफी यातनायें भोगने के लिये बाध्य करता है। इनमें गर्भवास भी है जिसमें अनेक दुःख
होते हैं। माता की उदररूपी गुफा में, मलमूत्र के विस्तार में, नीचे मुड़ी कर नौ महीने तक उसे पकाता रहता है।
उस समय वह चारों ओर से मलमूत्र से लिपटा रहता है, नाक और मुँह में कीड़ों का प्रवेश होता रहता है।
गर्भवास के वे कष्ट किससे कहेंगे ? फिर गर्भवती स्त्री की दोहद की अवस्था आती है जब उसे कडुई, खट्टी