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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 869 में से

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पृष्ठ 252

२३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्रिया करते समय भी मेरी ही धारणा करो। इस प्रकार कर्मों के आदि, अन्त और मध्य में अविनाशी मैं हूँ। मुझे
अंतःकरण में रखने से वे कर्म ही निष्कर्म में हो जाते हैं, इस बात को हे उद्धव, निश्चित रूप से समझ लो।
अन्वीक्षेत विशुद्धात्मा देहिनां विषयात्मनाम्।
गुणेषु तत्त्वध्यानेन सर्व्वारम्भविपर्ययम् ॥२॥
इस प्रकार जिसका अंतःकरण स्वधर्म के योग से शुद्ध हुआ रहता है, उन्हें पहचानने का यह लक्षण है
कि वे उदासीन रहते हैं। उनकी विषय के प्रति आस्था बिलकुल नहीं होती किन्तु विषयासक्त लोगों को
अपनी विषयासक्ति के कारण सारे कर्म विपरीत ही दिखाई देते हैं। मृगजल के तालाब कितने भी भरे क्यों न
हों लेकिन उसमें धान या केले की पैदावार नहीं हो सकती। उसी प्रकार जिनकी बुद्धि ही विषय लंपट है उन्हें
आत्मसुख के फल कभी भी प्राप्त नहीं होंगे। देखो, जो विषयासक्त होते हैं वे 'आयुःकामार्थ', आयुष्य की
वृद्धि हो तथा मनोरथ सिद्ध हों—'क्षेमार्थ' मेरा निरन्तर कल्याण हो, 'धनधान्यार्थ-समृद्धि' धनधान्य की समृद्धि
हो इस प्रकार का संकल्प कर्म करने के प्रारम्भ से ही करते रहते हैं। इसी हेतु से कर्म प्रारम्भ करने के कारण
वास्तव में स्वकर्म होता ही नहीं है। बल्कि स्वधर्म के बहाने वे सर्वदा मनोरथों की ही उपासना करते रहते
हैं। बैल को दुहने का प्रयास करने से सीप भर भी दूध नहीं निकलता, उसी प्रकार मनोरथ की उपासना करने
से आत्मसुख बिलकुल प्राप्त नहीं होता। इस प्रकार का कर्म वास्तव में कर्म होता ही नहीं है और उसे करने
से वह सिद्ध भी नहीं होता। उसमें अनेक बाधायें आकर उसका विनाश हो जाता है। इसके अतिरिक्त
देवताओं की ओर से भी बाधा आने की सम्भावना रहती है। विषयसेवन में सुख है यह सोच कर उसको
प्राप्त कराने में यज्ञकर्म ही श्रेष्ठ है यह मानकर मूर्ख लोग कष्ट कर असीम दुःख पाते हैं। तीनों वेद जानकर
यज्ञकर्म में पारंगत हुए लोग स्वर्गादि फलों की इच्छा कर, मुँह नीचे कर अधःपतन को प्राप्त होते हैं। विवेक
से दृष्टि प्रगल्भ होकर जो स्वर्ग को तृणवत मानकर उसे स्वीकार नहीं करते उसके पीछे वैराग्य लग जाता
है—बल्कि वह शीघ्रता से उसके घर में प्रवेश करता है। वह वैराग्य का मायका है, विश्राम का भी विश्राम
स्थल है। इतना नहीं बल्कि साक्षात विवेक ही उस पुरुष के रूप में साकार हुआ है ऐसा समझना चाहिये।
ऐसे विवेक से बनी विवेक दृष्टि से देखने पर स्वर्गादि विषय भी मिथ्यासृष्टि मालूम होते हैं। हे जगत्श्रेष्ठ
उद्धव! उस मिथ्यत्व का निरूपण अब सुनो।
सुप्तस्य विषयालोके ध्यायतो वा मनोरथः।
नानात्मकत्वाद विफलस्तथाभेदात्मधीर्गुणैः ॥ ३ ॥
स्वप्न और मनोरथ ये दोनों मन के ही खेल हैं। जो सो रहा है उसे वे सत्य ही मालूम होते हैं लेकिन जागृत
होने पर वही मिथ्या मालूम होते हैं। उसी प्रकार कामना के उल्हास तथा इन्द्रियों की आसक्ति से बुद्धि में
इहलोक और परलोक के भोग का मिथ्या पागलपन घुसा रहता है। सीप सीप ही रहती है किन्तु धन का लोभी
उसे रजत समझ बैठता है, उसी प्रकार विषय की अभिलाषा से भेद का पागलपन उसे जकड़ लेता है। स्वप्न में
मनुष्य को मृत अवस्था में देखता है और जागृत होने पर स्वयं ही उसे झूठ कहता है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में
जागृति आने पर उसे जन्म-मरण दिखायी ही नहीं देता। जीव और शिव का भेद जब तक कायम रहता है तब
तक जन्म-मरण की बाधा रहती है। जब वह भेद ही मिथ्या सिद्ध हो जाता है तो अद्वैत में वह बाधा नहीं रहती।
वह भेद किस तरह दूर होता है, स्वस्वरूप से भेंट किस प्रकार होती है, उसके लिये एक उत्तम साधन बताता हूँ,
ध्यान से सुनो।