श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय २४९
हमारा कर्त्ता है। मन में जो 'अहं' की भावना उत्पन्न होती है वह प्रत्येक शरीर में भिन्न होती है, इसलिये जीव भी
भिन्न-भिन्न हैं, कर्त्तापन और भोक्तापन उनके स्वरूप का प्रमाण है। इससे सम्बन्धित विचार ध्यानपूर्वक सुनो।
लोक, काल, श्रुति तथा जीवित ये अनेक कारणों से अनित्य हैं, ऐसा मेरा वेदांतिक मत है। शायद कर्मवादियों का
मत तुम्हें सच मालूम होगा लेकिन इससे तुम्हारे स्वार्थ की हानि होगी और तुम पर बहुत बड़ा अनर्थ होगा। वह
अनर्थ क्या है जानना चाहते हो तो सुनो। कर्मवादियों का यह भाव पूर्वपक्ष ही है। परमात्मा निर्विकार है तथा
सर्वस्वरूप एक है यह बात उन्हें स्वीकार नहीं। 'संन्यास' का नाम सुनते ही वे उसे महान पातक मानते हैं। इस
प्रकार मताभिमानियों की बक-बक चालू रहती है। त्याग अथवा संन्यास करने वालों को वे अनधिकारी कहते हैं।
वे कर्म को ही प्रधान मानते हैं और तदनुसार वैराग्य की निन्दा करते हैं। उनका मत है कि कर्म करो और सुख
का उपभोग करो। वह कर्म ही जो त्याग देते हैं उन निष्कर्मियों को सुख किस बात का मिलेगा? त्याग समस्त
दुःखों का मूल है। वैराग्य तो होता ही नहीं है। इसके लिये वे चार कारण बताते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। वे कहते हैं
यदि अनित्य अर्थात् अशाश्वत जैसी कोई बात होती तो उसमें वैराग्य तो होता ही नहीं है। इसके लिये वे चार
कारण बताते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो। वे कहते हैं कि यदि अनित्य अर्थात् अशाश्वत जैसी कोई बात होती तो उसमें
वैराग्य हो सकता था लेकिन यहाँ जब अनित्य जैसी कोई बात है ही नहीं तो बैरागी किस चीज का त्याग करेगा?
मीमांसकों का मत है कि वैराग्य चार कारणों से होता है। वे चार बातों को नित्य मानते हैं। नित्यत्व के कारण
चारों बातें सच हैं इस मत पर उन्हें गर्व है। कर्म-प्रकाशक वेद नित्य और अटल है ऐसा वे मानते हैं जीव नित्य
हैं उसी प्रकार भोग और काल भी नित्य हैं ऐसा उनका कथन है। वेदों ने भी स्वर्ग को भोग भोगने का स्थान
बताया है। वह बात तो झूठ नहीं हो सकती। इससे यह सिद्ध है कि ये चारों नित्य हैं। हे उद्धव! देखो, इस प्रकार
यहाँ अनित्य जैसी कोई बात नहीं है तो यहाँ वैराग्य का क्या काम है? तात्पर्य यह है कि बैरागी लोग मिथ्या होते
हैं। भोगने की चीजें यदि नश्वर होतीं अथवा मायावी होतीं तो वैराग्य सम्भव था। ऐसी तो कोई बात यहाँ नहीं है,
(ऐसा उनका मत है) उसी प्रकार
मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी यथा।
तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धीः ॥ १५॥
जीव के भोग्य पदार्थ हैं गंध, पुष्प, स्त्री आदि। प्रवाहरूप में वे नित्य हैं ऐसा वे अपने मतानुसार कहते हैं।
आत्मा है और संसार नहीं है ऐसा तो कभी नहीं हो सकता क्योंकि जल के बिना समुद्र हो ही नहीं सकता। सृष्टि
यह सदा शुरु ही है अर्थात् नित्य है। पिता पुत्र के रूप में वह अखण्ड चल रही है। यह सारी यातायात कर्म के
कारण है। यह कभी नहीं हो सकता कि सृष्टि अनित्य हो। फिर जो नित्य है उसे ईश्वर नाम का एक कर्त्ता होना
सम्भव नहीं है। नित्य का कर्त्ता कोई नहीं होता इसलिये वहाँ कोई ईश्वर नहीं है। वेदांती लोग स्वरूपभूत आत्मा
को ज्ञानस्वरूप कहते हैं। वह भी यहाँ नहीं होता ऐसा मत वे प्रतिपादित करते हैं। घट पट आदि आकार देखते
समय ज्ञान की क्षणभंगुर अवस्था दिखाई देती है ऐसा होते हुए उन्हें आत्मा को ज्ञानस्वरूप कहने में लज्जा क्यों
नहीं आती? कुल मिलाकर वेदांत में भी आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में पक्का निश्चय नहीं है, फिर जिसे मोक्ष
कहते हैं वह भी मिथ्या ही है। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सुख के अतिरिक्त मोक्षसुख को कुछ अलग बताया
गया है, लेकिन वह भी अविचार ही है क्योंकि इन्द्रियों के द्वारा ही जीवों को प्रत्यक्ष सुख प्राप्त होते हुए भी, ये
मूर्ख लोग उसे स्वीकार नहीं करते। देह के सिवा विदेह अवस्था में क्या कोई सुख भोगता है? अद्वैतवादी व्यर्थ