श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लोग भी सुखी दिखायी देते हैं। जो यज्ञपुरुष अच्युत हैं वे उसे छोड़ अग्निहोत्री यज्ञ करते हैं, उनका वह
स्वकर्म ही उन्हें विपरीत फल देता है। अग्नि तो मेरा ही स्वरूप है और श्रुतिमंत्र तो सारे मेरे ही बीज हैं।
होमद्रव्य के रूप में जो है वह भी मेरा ही स्वरूप है। इस मेरे जैसे सर्वव्यापी को अपने मन से नास्तिक समझ
अनीश्वरवादी लोग यज्ञ करते हैं। वही उन्हें बाधक होता है। स्त्रुक, स्त्रुवा, प्रणीतापात्र आदि सामग्री से कर्मतंत्र
अच्छी तरह करना जानते हैं किन्तु मुझ आत्माराम का सूत्र चुकने से यह याग अपवित्र हो जाता है। वास्तव में
वह सब मैं विश्वतोमुखी होने के कारण मुझ यज्ञपुरुष को ही अर्पण होता रहता है लेकिन याज्ञिक लोग इसे
स्वीकार नहीं करते। उनकी बुद्धि क्षुद्र और सकाम होती है। मुझे अर्पण किये बिना जो पुण्य प्राप्त करते हैं वह
दुःख होता है। जैसे विष को अमृत कहा जाय उसी प्रकार सकाम का पुण्य रहता है। मुझे छोड़ कर जो स्वर्ग
है उसे पीड़ा ही समझो और उससे मिलने वाले भोग को बड़ा रोग समझो। ऐसे याज्ञिकों का प्रयास मूर्खतापूर्ण
होता है। कर्म करते समय यदि उसमें कोई न्यूनता हो तो मैं अर्थात् श्रीकृष्ण का स्मरण करो ताकि उस नाम से
ही उसमें का न्यून कम हो जाय। मेरे नाम का इतना सामर्थ्य है। वही मैं जब याज्ञिकों के पास अन्न माँगने गया
तो उन्होंने मुझे वह नहीं दिया। यही उस कर्म की कर्मठता है। वे मुझ इन्द्रपुरुष को छोड़कर इंद्रादि देवताओं
का भजन करते हैं। लेकिन वे इंद्रादि देव मेरे ही अधीन हैं, इसे वे नहीं जानते। यही उस कर्म की कमी है।
जो अपना कर्म कृष्णार्पण नहीं करता उसका भाग्य फूटा समझो। ऐसा करने से इस लोक में भी दारिद्र्य में
रहना पड़ता है और परलोक में भी विघ्न आता है। अपना मुँह छोड़कर यदि पूरे शरीर को खीर चटायी जाय
तो उससे भूख तो शान्त नहीं होती उलटे दुःख होता है। उसी प्रकार मुझ यज्ञपति को छोड़कर यज्ञयाग करते
हैं, उस यज्ञ को बालविधवा के गर्भ प्राप्ति की तरह फल आते हैं। मैं यज्ञ करने जा रहा हूँ इसके लिये दूसरे
से धन माँगने पर उस यज्ञ का लाभ धन देने वाला हो जाता है। यज्ञ करने वाला सूखा ही रह जाता है।
अवश्य ही कर्त्ता होने का अभिमान सिर पर सवार रहता है। खीर के चम्मच से लोगों को खीर परोसी जाती
है। वह चम्मच जब गन्दा हो जाता है तो उसे एक ओर रख देते हैं। लेकिन खीर खाने वाले खीर खाकर चले
जाते हैं। गन्ना घानी में डालने पर घानी उसका रस निकाल कर बर्तन भर देती है और स्वयं नीरस चीथड़े
लेकर कटकटाती रहती है। वही दशा याज्ञिकों की होती है। याज्ञिक भी उसी प्रकार यज्ञ करते हैं और उसका
फल धन देने वाले को प्राप्त होता है। यज्ञ में पशु हिंसा करनी पड़ती है वह दोष अवश्य ही कर्तृत्वाभिमान के
कारण याज्ञिक के पल्ले पड़ता है। सारांश कर्म में निष्णात याज्ञिक इस प्रकार का दुःख भोगते हैं। लेकिन जिन
मूर्खों को कर्म का ज्ञान भी नहीं होता वे परमसुख प्राप्त करते हैं। उन्हें कर्म का खटराग मालूम नहीं रहता
लेकिन उनके मन में मेरे प्रति असीम श्रद्धा का भाव रहता है। इसलिये वे अगणित दुःखों को पार कर
आत्मसुख का स्वाद चखते हैं। वे कर्म के प्रति आदर रखना नहीं जानते लेकिन मेरे प्रति उनके मन में श्रद्धा
रहती है। ऐसे सीधे-सादे भक्त अत्यन्त सुख प्राप्त करते हैं। जो गोपाल गोकुल में निरन्तर मेरे साथ थे उन्होंने
कौन सा कर्म किया था? लेकिन उन्होंने कर्म की होली जला कर नित्य नये आत्मसुख का अनुभव आखिर ले
ही लिया। कर्ममार्ग के अनुसार यदि गोपियों के कर्म का विचार किया जाय तो उनका धर्म निन्दनीय था
लेकिन उन्हें पुरुषोत्तम की आसक्ति होने के कारण वे भी परमधाम पहुँच गयीं। इतना ही नहीं बल्कि गोकुल
के पशु, पक्षी, गौएँ और सर्प आदि सभी प्राणी मेरे पद पर पहुँच गये। लेकिन याज्ञिक लोगों को कर्माभिमान
का अत्यन्त गर्व होने के कारण वे अपने ही कर्म में दुःख भोगने लगे। जो केवल कर्मठ होते हैं वे कर्म के
कारण जड़बुद्धि होकर स्वयं सर्वज्ञ होने की मूर्खता के अभिमान में असहनीय दुःख भोगते हैं। दीपक के