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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 869 में से

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पृष्ठ 263

दसवाँ अध्याय २४७
पायेगी ? रस्सी की जगह साँप का जो भ्रम हुआ था उसकी सत्यता मालूम होने पर साँप का आकार समाप्त हुआ
और वह डोर के रूप में ही शेष रहा। विवेक के निर्णय के अनुसार जब साँप का भास उड़ जाता है, उसी प्रकार
ब्रह्म के सत्य के सामने देह का सत्यत्व शेष नहीं रह जाता। नरदेह का आश्रय लेकर ब्रह्मविद्या का विकास होता
है। उसका जन्मस्थान देह है, उसी का निर्मूलन वह कैसे करेगा ? उद्धव ! इस प्रकार की शंका शायद तुम्हारे मन
में आयेगी तो उसके समाधान के लिये तुम्हें अग्नि की उत्पत्ति का दृष्टांत सुनाता हूँ।
आचार्योऽरणिराद्यः स्यादन्तेवास्युत्तरारणि।
तत्संधानं प्रवचनं विद्यासंधिः सुखावहः ॥ १२ ॥
दो लकड़ियों को एक-दूसरे पर रगड़ने से उस घर्षण से अग्नि उत्पन्न किया जाय तो वह उन लकड़ियों को
ही जला देता है और अग्नि के रूप में प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार ब्रह्मविद्या गुरुशिष्य के संवादरूपी मंथन
से उत्पन्न होती है। उस मंथन का निरूपण ध्यान देकर सुनो। उसमें गुरु 'आद्य अरणि' अर्थात् अग्नि उत्पन्न करने
वाली नीचे की लकड़ी है और शिष्य 'उत्तरारणि' अर्थात् ऊपर का काष्ठ है, उपदेश 'मंथा' अथवा मथनी है। गुरु
शिष्य का संवाद मंथन क्रिया है। इस प्रकार मंथन करना चाहिये। इस मंथन में अर्थात् संवाद में शिथिलता आयी
तो ज्ञानाग्नि उत्पन्न नहीं होगा। स्वयं से ही विडम्बना होकर किये कराये पर पानी फिर जायेगा। आलस का मार्ग
स्वीकार करने पर इतना बड़ा अनर्थ हो जाता है। इस योग को साध्य करने के लिये योगी आठों पहर कष्ट करते
रहते हैं। अपने हित के लिये जागृत रह कर गुरुवचन पर विश्वास रख कर लगातार मंथन करते रहना चाहिये,
तभी ब्रह्मज्ञान प्रकट होता है। एक बार वह ब्रह्मज्ञान प्रकट हो जाने पर देह का भान ही नहीं रहता। दृश्य, द्रष्टा
और दर्शन तत्काल विलुप्त हो जाता है। आत्मज्ञान से आत्मसुख सिद्ध होते ही कार्य-कर्म-कर्ता अथवा ज्ञान-
ज्ञेय-ज्ञाता आदि का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। आत्मज्ञान से संसार दुःख का विलय होकर आत्मसुख का लाभ
होता है और आत्मसुख में माया के गुणदोषों का झट विनाश हो जाता है।
वैशारदी सातिविशुद्धबुद्धिर्धुनोति मायां गुणसम्पसूताम्।
गुणांश्च संदह्य यदात्ममेतत् स्वयं च शाम्यत्यसमिद् यथाग्निः ॥ १३ ॥
आत्ममाया के गुण का निराकरण करने के लिये शिष्य चतुर, बुद्धिमान एवं दैवी सम्पत्ति का आश्रय कर
सदा सद्गुण सम्पन्न होना चाहिये। ऐसे प्रकार के अधिकारी मुमुक्षु के मस्तक पर शास्त्र पारंगत तथा
स्वानुभवसम्पन्न गुरु का वरदहस्त होने पर उसे तत्काल निजबोध प्राप्त होता है। उस निजबोध में दृष्टि स्थिर होते
ही गुणों का कार्य गुणों के पेट में ही समा जाते हैं। गुण ही गुणों का प्राशन करते हैं। तम का प्राशन रजोगुण
करता है। तम को खाकर जब रजोगुण उन्मत्त हो जाता है तो उसे देखकर सत्त्वगुण भी खौलने लगता है।
सत्त्वगुण जब उबलने लगता है तो उसे द्वैतभाव सहन नहीं होता और वह तत्काल रजोगुण को निगल लेता है।
शुद्धसत्त्व का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उससे आत्मसुख का अनुभव होता है। वह अनुभव भी कैसा
आश्चर्यजनक है। वह सदा चिर नूतन ही मालूम होता है और एक बात यह भी है कि सुखानुभव से सृष्टि उत्पन्न
करने में सहायक होने वाले जिस रजतम के बीजों के अवशेष शेष रह जाते हैं वे भी नष्ट हो जाते हैं। अर्थात्
गुणों को उत्पन्न करने वाली माया भी उस शुद्ध सत्त्व में विलीन हो जाती है और वह सत्त्वृत्ति अकेली अद्वैतरूप
से बची रह जाती है। फिर 'ब्रह्माहमस्मि' — अर्थात् में ही ब्रह्म हूँ यह भावना भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है
और तभी 'सोहंहंसा' की भी छुट्टी हो जाती है। उस समय देह का देहत्व ही समाप्त हो जाता है और जन्म-