सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

२०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
बेचारी मक्खियाँ तो शहद खाती नहीं, जो शहद निकालते हैं उनके हाथ शहद से सने रहते हैं और जिन पर
लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं वे उसका स्वाद लूटते हैं। उसी प्रकार कंजूस का धन यक्ष की तरह होता है, न दान न धर्म
का संरक्षण, चोर मार कर उठा कर ले जाते हैं और चोर को सजा देकर राजा उसे उठा कर ले जाता है। जो कष्ट
करके धन संग्रह करते हैं उसका वे उपभोग नहीं कर पाते, वह कोई तीसरा ही ले जाता है। भाग्य की लीला
विचित्र है। गृहस्थ आदमी बड़े प्रयत्न से भोजन तैयार करता है और संन्यासी बिना परिश्रम किये उसे खा जाता
है। इसलिये भाग्य ही प्रमुख चीज है। इसलिये जो भाग्य के भरोसे रहता है वह संग्रह की लालसा नहीं रखता।
आखिर भाग्य का ही सहारा रहता है लेकिन लोग व्यर्थ ही कंजूसी करते हैं।
सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिषः।
मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्॥ १६॥
परिश्रमपूर्वक द्रव्य एकत्र कर पुरुष गृहस्थी का सामान तथा नाना प्रकार की चीजें अपने भोग के लिये
एकत्र करता है, उसके पकवान तैयार करता है, तभी ऐन वक्त पर कोई अन्नार्थी ब्रह्मचारी अथवा संन्यासी अतिथि
बनकर आता है और उस गृहस्थ के पहले ही खाना खाकर चला जाता है। गृहस्थाश्रमी उसकी ओर देखता रह
जाता है। जिस प्रकार शहद की मक्खियों को भगा कर शहद पीने वाला शहद पीता है, वैसी ही स्थिति उस
गृहस्थ की होती है। तैयार किया हुआ भोजन संन्यासी खा जाते हैं। यदि संन्यासी विन्मुख चला जाय तो सारे
पुण्य व्यर्थ चले जाते हैं। यथा समय अतिथि के आ जाने से धर्म की रक्षा होती है। अर्थ संग्रह में क्या दोष है
उसका तत्त्व मैंने तुम्हें बताया। अब मैंने 'मृग' को गुरु क्यों बनाया उसका वृत्तांत सुनो।
ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्वचित्।
शिक्षेत हरिणाद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात् ॥ १७॥
जो दुर्व्यसनियों की वार्ता या वेश्याओं द्वारा गाये गीत चाव से सुनते हैं उसे निश्चय ही बन्धन होता है।
एकटक दीपक की ओर देखने वाला मृग घंटानाद सुनकर पागल-सा हो जाता है और उसे सामने कुछ भी नहीं
दिखाई देता। अन्त में वह जाल में फँस जाता है। वेश्याओं का गाना सुनकर कौन नहीं मोहित होता ? प्रायः सभी
मृग की तरह स्वार्थ से मोहित होकर गिर पड़ते हैं। जिसे तपस्वियों का मुकुटमणि कहते हैं तथा जिसकी पहले
कभी स्त्री से भेंट नहीं हुई थी वह ऋष्यश्रृंग एकाएक स्त्री गीत के भुलावे में आ गया।
नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम्।
आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यशृङ्गो मृगीसुतः॥ १८॥
वीणा की तार से निकली हुई मधुर झंकार, वेश्या का गायन तथा नृत्य आदि देखकर पुरुष गले में रस्सी से
बँधे हुए बन्दर की तरह स्त्री के वश में हो जाते हैं। हिरनी के गर्भ में जन्म लेने वाला वह जो तपस्वियों में श्रेष्ठ
था, जिसने स्त्री का दर्शन या भाषण नहीं सुना था वह ऋष्यश्रृंग स्त्री दर्शन के साथ ही उनके वश में हो गया,
स्त्रियों के पीछे दौड़ पड़ा और उनके वचनों पर चलने लगा। जिस प्रकार मदारी का बन्दर नाचता है, उसी प्रकार
वह स्त्रियों के साथ नाचने लगा, युवतियों के दर्शन से पागल हो गया, उसके मन में विवेक नाम की कोई चीज
ही नहीं रह गयी। वह तप का श्रम भूल गया, पिता विभांडक को भी भूल गया, ब्रह्मचर्य का संकल्प भी भूल
गया और स्त्रियों के अनुरोध पर नाचने लगा। संसार में स्त्रियों के जैसा उपसर्ग और कोई नहीं है। स्त्रियों के साथ

अष्टम अध्याय २०१
विनोद भी ठीक नहीं है। स्त्री संग सभी के लिये दुःखदायी है। वेश्याओं का गीत नहीं सुनना चाहिये, उन्हें
बिलकुल वर्जित रखना चाहिये। सच तो यह है कि जहाँ हरिकीर्तन हो रहा हो वहाँ केवल परमार्थ की दृष्टि से
भक्तिगीत सुनना चाहिये। जिसमें रामनाम का वर्णन नहीं है ऐसे ग्राम्यगीत कभी नहीं सुनिये चाहिये। कौतूहल के
लिए भी उधर नहीं झाँकना चाहिये। अब 'मछली' को गुरु बनाने के भी लक्षण सुनो। वह केवल रसना की
लोलुपता से अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है।
जिह्वयाऽतिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा ॥ १९॥
अर्थसंग्रह से जीवन का नाश, स्त्रियों की संगत से अधःपतन तथा रसना की लोलुपता से मृत्यु, इस प्रकार
जीव को तीन प्रकार के आघात होते हैं। जिसका जिह्वालौल्य प्रबल है, उसके हिस्से में अनर्थ ही आता है। रसना
अनेक दुःखों का भोग कराती है। रसना की लालसा अर्थात भक्ष्य का माधुर्य जबर्दस्त है, उसके लालच में मछली
बंसी में लगाया हुआ भोजन खाती है लेकिन तभी गले में काँटा धँसता है और प्राणपखेरू उड़ जाते हैं। वैसे
देखने पर विषयरस उत्तम मालूम होता है लेकिन उसमें गुप्त रोग की फाँस छिपी रहती है। जो आसक्ति से उस
रस का सेवन करते हैं वे भवरोग से छटपटाते रहते हैं। काँटे में फँसी हुई मछली जिस प्रकार जीवन और मृत्यु के
बीच छटपटाती रहती है उसी प्रकार रोग से ग्रस्त मनुष्य दुःख भोगता रहता है। जिसमें रसना लोलुपता का दोष है
उसे सुबुद्धि कहाँ से आयेगी? केवल विषयों के संसर्ग के कारण वह अनन्त जन्म-मरण का दुःख भोगता रहता
है। केवल विषय रस का सेवन करने के कारण उसे करोड़ों जन्म भोगने पड़ते हैं। अगर ऐसा भोग न भोगना पड़े
तो हे राजा! एक उदाहरण सुनाता हूँ। इन्द्रियों की सजीवता सर्वथा रसना पर निर्भर रहती है। रसना के द्वारा
रसग्रहण करने से इन्द्रियों में उन्मत्तता आती है। जब इन्द्रियों की शक्ति प्रबल हो जाती है तो वह अधःपतन
कराती है। यदि रसना पर विजय नहीं प्राप्त की तो भवव्यथा से कभी छुटकारा नहीं मिल पाएगा। आहार के बिना
शरीर नहीं चलता, लेकिन उसका सेवन करने से इन्द्रिय प्रबल हो जाते हैं, इसलिये रसना को जीतने का मूल
कारण मालूम होने से सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं।
इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः।
वर्जयित्वा तु रसनं तन्निरन्नस्य वर्धते॥२०॥
देखो! साधक आहार वर्ज्य कर इन्द्रियों को जीतने की ज्यों-ज्यों कोशिश करता है, त्यों-त्यों रसना और भी
बढ़ जाती है। वह कम नहीं होती। इन्द्रियों में आहार से ही बल आता है। निराहार से जैसे-जैसे वे इन्द्रिय
व्याकुल हो जाते हैं वैसे-वैसे रसना और भी अधिक बलवती हो जाती है। रसना का जोर निराहार से घटता नहीं,
अपितु बढ़ जाता है।
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रियः पुमान्।
न जयेद्रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे॥२१॥
कहते हैं कि उपवास से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है, किन्तु यह बात मिथ्या है क्योंकि अन्नग्रहण करने
पर वे पुनः बलशाली हो जाती हैं और अपने-अपने कर्मस्थल पर जागृत हो जाती हैं। जब तक रसना को नहीं
जीता तब तक 'जितेन्द्रिय' कहना मिथ्या है। जब विषयचैतन्य और इन्द्रियचैतन्य में ऐक्य हो जाता है, तभी रसना

२०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर विजय प्राप्त हुई ऐसा समझना चाहिये। समस्त मधुर पदार्थों में जो मधुर है उस पर जिसने विजय प्राप्त कर
ली उसी के वश में रसना रहती है। उसे रस-अपचन की बाधा नहीं होती। रसना विजयी का अभियान
ब्रह्मसायुज्यता में स्थान पाता है। वही परमानन्द का सुख भोगता है।
पिङ्गला नाम वेश्याऽऽसीद् विदेहनगरे पुरा।
तस्या मे शिक्षितं किंचिन्निबोध नृपनन्दन ॥ २२॥
अवधूत कहते हैं—हे राजा! देखो, मैंने एक वेश्या को गुरु बनाया। हे चतुर! उससे मैंने जो बातें सीखीं,
उन्हें सुन लो। किसी समय जनक राजा की नगरी में 'पिंगला' नाम की वेश्या रहती थी। उसकी आशा निराशा में
बदलने पर उसमें तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ।
सा स्वैरिण्येकदा कान्तं संकेत उपनेष्यती।
अभूत् काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ २३॥
वह स्वच्छन्द विचरण करती थी। शाम को नाना प्रकार के शृंगारों से अलंकृत होकर वह दरवाजे पर खड़ी
रहती थी। रूप तो उत्तम था ही, तिस पर मनोरम शृंगार किया हुआ। इस प्रकार वह सज-धज कर उत्तम पुरुष
की बाट जोह रही थी।
मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ।
ताञ्छुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका ॥ २४ ॥
गुणी, रूपवान तथा धनवान होने के साथ-साथ कामशास्त्र में भी निपुण तथा धन से सम्पन्न करने वाले
पुरुष की वह प्रतीक्षा कर रही थी। हे पुरुषश्रेष्ठ, सुनो! राह में किसी पुरुष को आते देख वह अपने नेत्रकटाक्ष
तथा शृंगाराभिनय से उसे इशारा करती थी।
आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी।
अप्यन्यो वित्तवान् कोऽपि मामुपैष्यति भूरिदः ॥ २५॥
किसी के ऊपर कंकड़ फेंकती, तो किसी को कहती, “महाराज! पान तो खाकर जाइये। राह चलने वालों
को आँख मारती तो किसी को देखकर व्यर्थ ही लज्जा का अभिनय करती। मन की योजना को पूरा करने के
लिये वह उपर्युक्त अनेक प्रकार के संकेत किया करती थी। लेकिन उधर से जाने वाले कामकाजी लोग उसकी
ओर नहीं देखते थे। ऐसे लोगों को वह 'दरिद्री, दुर्बल' कहकर निन्दा करती थी, अब कोई तो धन देने वाला
नौजवान आये और मुझे स्वीकार करेगा कह कर अपने मन को सांत्वना देने लगी। "
एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती।
निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत ॥ २६॥
इस प्रकार निराशा से भरी, उद्वेग के कारण नींद से भी वंचित हुई, दरवाजे के पास खड़ी पुरुषभोग की
इच्छा से व्याकुल। घर के अन्दर जाती, दो चार कदम चलकर पुनः वापस चली आती। इस प्रकार भीतर-बाहर
करते-करते आधी रात बीत गयी। पुरुष के आने का समय बीत चला, रात समाप्त हो चली। लोग निद्रा में लीन।
लेकिन उस समय पिंगला व्यथित होकर पड़ी थी।

अष्टम अध्याय | २०३

तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतसः।
निर्वेदः परमो जज्ञे चिन्ताहेतुः सुखावहः॥ २७॥
आखिर आशा की आर्द्रता समाप्त हुई, होंठ सूखने लगे, गला सूख गया तथा मुखकमल निस्तेज होने लगा।
चिन्ता बढ़ने लगी। हाथ में द्रव्य नहीं आया इसलिये भीतर हालत से दीन हीन हो गयी। वैराग्य से चिन्ता बढ़ी
और वही उसके सुख स्वार्थ का कारण बनी।
तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं शृणु यथा मम।
निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः॥ २८॥
न ह्यङ्गाजातनिर्वेद देहबन्धं जिहासति।
यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप॥ २९॥
जरा देखो, उसमें वैराग्य किस तरह आया। जो विषय का चिन्तन कर रही थी वही उससे ऊब गयी।
सारांश यह कि वैराग्य आशा को तोड़ता है। उस वैराग्य के कारण पिंगला ने विवेकपूर्ण गीत गाया, हे राजा!
विवेक सागर! जिसकी बुद्धि में वैराग्य नहीं है उसे जन्म-मरण की व्याधि पग-पग पर बाधक होती है। जिसे
अनुताप नहीं होता, जिसके अंतःकरण में विवेक उत्पन्न नहीं होता, वह संसार का क्रीतदास है, वह आशा की
डोर से बँधा रहता है। उसके पैर में मोह ममता से कसी हुई देहबुद्धि की बेड़ी पड़ी रहती है। वह रात-दिन
विषय का अनाज पीसता रहता है। क्षणभर का भी विश्राम नहीं रहता। जीर्णशीर्ण कथरी में लिपटा हुआ खाट पर
पड़ा रहता है। उसके विवेक की आँखें फूटी रहती हैं। उसे विधियुक्त मार्ग नहीं दिखाई देता। ऐसे लोग इधर-
उधर भटकते रहते हैं और घबराकर अन्धे कुएँ में गिर पड़ते हैं। वहाँ से ऊपर आने के लिये उन्हें रास्ता नहीं
दिखाई देता। सच तो यह है कि काया, वाचा तथा मन से उन्हें बाहर निकलने की इच्छा ही नहीं होती। इतने में
घने बालों वाला बिच्छू डंक मारता है। उसका विष शरीर में जोर मारने लगता है। फिर अन्दर से निंदारूपी कराह
उठने लगती है। द्रव्यनाश की आग तथा द्वेष की गुर्राहट शुरू होती है। वह अहंकार की अंगड़ाई लेने लगता है
और मोह की उबासियाँ आने लगती हैं। फिर भी यह विषय का अनाज तीव्रता से पीसता रहता है और गृहस्थी
की सेज पर लोटता रहता है। इस प्रकार बेचारा अवैराग्य के कारण देह के कैदखाने में फँसकर अनन्त दुःख
भोगता हुआ रसातल तक पहुँच जाता है। जरा देखो, सभी वर्णों में नीच, निकृष्ट तथा अत्यन्त निन्दनीय कर्म
करने वाली उस वेश्या के हृदय में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने देह बन्धन तोड़ दिया। जिससे देहबन्धन टूट
सके ऐसी ही बातें उस वेश्या ने कही। हे चक्रवर्ती राजा! उस पिंगला में किस प्रकार विरक्ति हुई उसे सुनो।
पिंगलोवाच
अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मनः।
या कान्तादसतः कामं कामये येन बालिशा॥ ३०॥
पिंगला ने कहा—सचमुच, मैंने व्यर्थ ही माया का विस्तार किया था। मेरी मूर्खता का अवलोकन करने से
विचार कुंठित हो जाता है। मेरे मन की कोई मर्यादा ही नहीं थी। नीच पुरुष के साथ रत होकर उसमें आनन्द
मानने में मैंने अपने भ्रम को शिखर पर चढ़ा दिया। स्त्री को यदि पुरुष चाहिये लेकिन मैं निरन्तर नीच पुरुष के
साथ रत रही, यही मेरी पहली मूर्खता थी।

२०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।
अकामदं दुःखभयादिशोकमोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा ॥ ३१ ॥
संत अर्थात शाश्वत पुरुष का लाभ अत्यन्त निकट होते हुए भी, मुझे विषयासक्ति के कारण मालूम नहीं
हुआ। उसके साथ रत होने पर तत्काल कामनिवृत्ति होती है। काम की निवृत्ति कर जो अपार शाश्वत सुख प्रदान
करता है, वही वित्तदाता भी होता है। उसका दान अलौकिक होता है। प्रेमरति से सन्तुष्ट होकर वह निजात्मपद
के साथ सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करता है और वह पुरुष तथा स्त्री दोनों को ही रममाण कर सकता है। वही एक
सबका रमण अर्थात पति है। ऐसे कांत को त्याग कर मैंने कितनी बड़ी भूल की। निरन्तर कामप्राप्ति के लिये ऐसे
पुरुष को भज रही थी जो काम पूर्ण नहीं कर सकता। जो स्वयं अपना ही काम पूर्ण नहीं कर सकता वह मुझे
कैसे निष्काम करेगा ? ऐसों की संगति से मैंने मिथ्या मोह तथा अत्यन्त दुःख अवश्य प्राप्त किया। वे मुझे सुख
तो नहीं ही दे सकते थे, उल्टे उन्होंने मुझे दुःख ही दिया।
अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा सांकेत्यवृत्त्याऽतिविगर्ह्यवार्तया।
स्त्रैणान्नराद् यार्थतृषोऽनुशोच्यात् क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती ॥ ३२ ॥
जार पुरुष के साथ मैं जिस सुख की इच्छा करती थी वह मेरी मूर्खता के कारण ही। व्यर्थ ही मैंने संताप
कर लिया। मैंने स्वयं ही अपने को दुःखी कर लिया। स्त्री के अधीन रहने वाले पुरुष नराधम होते हैं। वेश्यागामी
पुरुष तो उनसे भी अधम होते हैं। ऐसे ही लोगों की संगत मैं चाह रही थी। अत्यन्त निंदनीय जो वृत्तियाँ हैं वे
सब मुझे टालना चाहती होंगी। (हरहर!) भोगेन्द्रिय पर उदरनिर्वाह करना। व्यभिचार व्यवसाय की जाति तो
निकृष्ट है ही। जो कोई थोड़ा-सा भी धन देता है उसकी जाति भी नहीं देखी जाती। इससे अधिक लज्जास्पद
स्थिति क्या होगी ? मेरे जीने को धिःकार है। जिस पुरुष को देह बेचा वह भी अत्यन्त दीन, हीन। उस पुरुष के
लक्षणों का क्या वर्णन किया जाय? सभी गुणों में शून्य। कंजूसी के कारण पूरा पैसा नहीं दे सकता। काम भी पूरा
नहीं करता, प्रेम का तो नामोनिशान भी नहीं। इतना ही नहीं बल्कि वह बाद में मुँह भी नहीं दिखाता। ऐसे लोगों
से सुख की आशा करने से दुःख अवश्य ही बढ़ जाता है। उसे आग लगे। उसका मुँह भी नहीं देखना चाहिये।
देखने से कै होने लगती है। सारांश, उस पुरुष की स्थिति का स्मरण होते ही मन को घिन होने लगती है। बस हो
गयी वह संगत। मन उससे पूरी तरह ऊब गया।
यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्यस्थूणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम्।
क्षरन्नवद्वारमगारमेतद् विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या ॥ ३३ ॥
यह मनुष्य देहरूपी घर बड़ा कठिन है। इसकी आड़ी-टेढ़ी लकड़ियाँ केवल हड्डियाँ हैं, दोनों ओर हड्डियों
की बनी मेढ़ है और उस पर गीली चमड़ी चढ़ी हुई है। उस पर रोमावलियों की कीलें लगी हुई हैं। अग्र भाग पर
नखों की कोंपल से झरी बन्द कर दी गयी है। अस्थि, मांस, चमड़ी आदि की चौखट बना कर स्वाद लेने के
लिये लाल चमड़े की जीभ आगे ही तैयार करके रखी हुई है। वायु भीतर-बाहर आ जा सके इसलिये प्राण,
अपान के झरोखे तैयार किये गये हैं तथा ऊपर हिलने-डुलने वाले शिखर पर केशरूप कोंपल लगा दिये गये हैं।
भीतर की खाली जगह को भर कर उसे नौ नाड़ियों से कसकर बाँध दिया है। इसमें नित्य नये मलमूत्र का ढेर
एकत्र होता रहता है। अन्दर की खाली जगह में कितनी दुर्गन्ध भरी हुई है। नवद्वारों से दिन रात उसी का प्रवाह
चलता रहता है। नालियाँ निरन्तर गन्दगी से बहती देख मनुष्य ऊब जाता है। रात-दिन उन्हें पानी से धोने पर भी

अष्टम अध्याय २०५
वे साफ नहीं होतीं। इसकी बात करते ही पेट में जाने कैसी खलबली मच जाती है और उल्टी हो जाती है और मैं
अभागन ऐसे शरीर के भुलावे में आ गयी थी। मैंने अपना विवेक खो दिया था। ऐसे इस हाड़ मांस के लोथड़े का
तथा विष्ठा मूत्र के खजाने का मैं आलिंगन कर रही थी। आग लगे ऐसे शरीर को। पता नहीं क्यों मैं उससे ऊबती
भी नहीं थी।
विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्नहमेकैव मूढधीः।
यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात् ॥ ३४ ॥
इस जनक नगरी में जन्म लेने वाली मैं अकेली मूर्ख थी। हृदयस्थ श्रीहरि को छोड़कर नीच पुरुष के साथ
व्यभिचार किया। रात दिन मैंने ऐसे कितने पुरुषों का उपभोग किया उनकी कोई गिनती नहीं है। जब तक ईश्वर
के प्रति प्रेम नहीं उत्पन्न होता तब तक वास्तविक सुख मिल ही नहीं सकता। जो निकट हृदयस्थ है जो पुरुषों में
पुरुषोत्तम तथा अच्युत है, जो वीर्य का स्खलन किये बिना रति करता है और सन्तोष से निजात्मपद देता है, उस
अच्युत ने जिसे निजसुख प्रदान किया, उस सुख की अधःपतन नहीं है। ऐसे नारायण को भूल गयी और जिनसे
कामप्राप्ति नहीं हो सकती ऐसे लोगों के भुलावे में आ गयी। अकामदायी पुरुष नाशवान होते हैं। ऐसों की संगति
से वे दुःख ही देंगे। लेकिन जरा मेरा मन तो देखिये। कितना मूर्ख है। वे उस पर आसक्त थे। अब उस आसक्ति
से छुटकारा मिला और अच्युत सुख की, अक्षय हरिसुख की लगन लग गयी। उसका सुख भोगने से हर क्षण
उसकी वृद्धि ही होती है।
सुहृत् प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्।
तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३५ ॥
जो मेरा हृदयस्थ है, जो मेरा सुख, जो मेरी प्रीति, मेरा प्रियतम अच्युत वही मेरी अंतरात्मा में भरा हुआ है।
वही मेरा स्वामी, वही मेरा पति है। उसे ही मैं स्वयं के बदले में खरीद लूँगी और अन्य अश्लील बातों को त्याग
कर मैं उसे ही परमानन्द से आलिंगन दूँगी। लक्ष्मी पैरों की दासी हो गयी है। लेकिन मैं उसे हर क्षण, सर्वत्र,
सभी रूपों में अकेले ही भोगूँगी।
कियत् प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नराः।
आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुताः ॥ ३६ ॥
हृदयस्थ अच्युत को छोड़ अन्य कर्मदरिद्रों को पति बनाया। जो स्वयं ही भयाक्रांत हैं वे स्त्री को कैसे सुख
दे पायेंगे ? सभी काल के जबड़े में फँसे हुए हैं। इस लोक में सुख देने वाला कोई भी नहीं दिखायी देता। अस्तु!
यह तो मनुष्यों की स्थिति है। अब अगर देवाधिदेव इन्द्र का वरण किया जाय तो एक कल्प में चौदह इन्द्र होते
हैं, अर्थात् देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र को पदभ्रष्ट होना पड़ता है। इस प्रकार लोकों में चाहे वह देवता हो या मनुष्य
हो सब अपने ही मरण से दुःखी रहते हैं। वे अपनी स्त्री को किस प्रकार सुखी करेंगे ? वहाँ मूर्ख ही रममाण होते
हैं। मेरा अहोभाग्य कि इसी रात, इसी क्षण मुझे विवेक और वैराग्य इन दोनों की मुझे प्राप्ति हुई मुझ पर
लक्ष्मीपति प्रसन्न हो गये।
नूनं मे भगवान् प्रीतो विष्णुः केनापि कर्मणा।
निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जातः सुखावहः ॥ ३७ ॥

२०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस जन्म में मेरे कर्म को देखें तो वह केवल निन्दनीय हैं। पिछले जन्म का कुछ पुण्य था जिससे पुरुषोत्तम
मुझ पर प्रसन्न हुआ। लेकिन पूर्व जन्म में मैंने ऐसा क्या किया था? तो जिसका नाम 'पतित पावन' है उस कृपालु
जनार्दन की कृपा से ही यह सम्भव हुआ है। नीच, दुर्वासनायुक्त, व्यभिचारी, शरीर बेचकर उदरनिर्वाह करने वाली
मुझ जैसी स्त्री में वैराग्य का विचार आने का अर्थ यही है कि भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न हुए हैं। अगर पूर्वजन्म
का कुछ सुकृत होता तो मैंने नीच श्रेणी में जन्म ही नहीं लिया होता। योनिद्वार कर्माचरण करने वाली मैं पूर्ण रूप से
पापी हूँ। इस प्रकार मैं पूर्णपतित और वह जगन्नाथ 'पतित पावन' जिसने कृपा करके मुझे विवेकयुक्त वैरागी
बनाया। वैराग्य विचार से ही मेरा दुर्वासना का दुःख समाप्त हुआ और मुझे परमसुख प्राप्त होकर आत्मसुख का
लाभ हुआ। जिस पर दुःख बरसता है उसमें यदि वैराग्य नहीं उत्पन्न होता तो वह भाग्यहीन है। लेकिन भगवान की
कृपा कैसी न्यारी है। दुःख के द्वार से उसने निजसुख ही मेरे पास भेज दिया।
मैवं स्युर्मन्दभाग्यायाः क्लेशा निर्वेदहेतवः।
येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति॥३८॥
शरीर पर जब दुःखरूपी द्वंद्व बरसता है तो अभाग्य, क्रुद्ध हो उठता है। जिनका विवेक अन्धा हो जाता है
उसे मंदभाग्य समझना चाहिये। दुःख पर दृष्टि पड़ते ही जिसे विवेकयुक्त वैराग्य प्राप्त होता है वह हृदयस्य
मोहमाया के बन्धन तोड़कर तत्काल आत्मसुख प्राप्त करता है। पुरुषों के लिये 'विवेकयुक्त वैराग्य' ही परम
निधान है। उसके कारण वे सुखी होकर परम संतोष प्राप्त करते हैं। पहले मैं अत्यन्त अभागी थी। किन्तु भगवान
ने महापुरुषों का वैराग्य मुझे प्रदान किया और मैं त्रैलोक्य में धन्य हो गयी।
तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगताः।
त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम्॥३९॥
भगवान ने कृपा करके मुझे निजवैराग्य प्राप्त करा दिया, मेरी दुर्वासना समाप्त की और ग्याम्य विषय नष्ट
कर दिये। उसके वे उपकार धारण कर मैं अब उसकी शरण में जा रही हूँ। जो सर्वाधीश और सर्वनियंता है उस
श्रीकृष्णनाथ की मैं शरण में हूँ।
सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद् यथालाभेन जीवती।
विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै॥४०॥
शरण में जाने के बाद मैं निश्चय ही इस लोक में सुखी हो जाऊँगी। मन में स्वभावतः सात्विक श्रद्धा है।
शरीर निर्वाह की चिन्ता अदृश्य पर सौंप दूँगी। महान ऋषिगण जिस निजात्मा का भोग करते हैं उसी आत्माराम
का मैं भोग करूँगी। निष्कामों को जो काम से तृप्त करता है वही परमात्मा मेरा पति है। जब ब्रह्मादिक देवतागण
समर्थ हैं तो उन्हें छोड़कर प्रेमपूर्वक भगवद्भजन ही क्यों करें तो इसका उत्तर यह है कि जो मुझ जैसी दुराचारी
जीव का उद्धार करता है, वही कृपालु स्वामी श्रीहरि संसार सागर को पार कराने वाला है।
संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम्।
ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वरः॥४१॥
संसाररूपी गहरे अँधेरे कुएँ में, विषय में अन्धे हुए लोग पड़े हुए हैं। ऊपर आने के लिए उनकी बुद्धि काम
ही नहीं करती। कोई कल्पना के जल में डूबे, वासना की लहरों में फँसे, दंभरूपी जलचर उन्हें नोच-नोचकर खा

अष्टम अध्याय २०७
गये तो कोई तृष्णा की दलदल में धँस गये। कोई दुःख की चट्टान पर टकरा गये और स्वर्ग की सीढ़ी पर रुक
गये, कोई वहाँ से भी नीचे गिरे और संसाररूपी जल से दम घुट कर मर गये। जो नास्तिक थे उन्हें सम्पूर्ण
जलसमाधि प्राप्त हुई, जो कर्मठ थे उन्होंने कर्मरूपी चट्टान पकड़ ली और जो बेचारे वेदबाह्य थे वह ड्योढ़ी के
तल में जाकर गिर पड़े। वहाँ निन्दा के काँटे चुभकर खरोंच लग गयी, उसी प्रकार द्वेष के बड़े-बड़े पत्थरों की
टक्कर से शरीर पर प्रहार हुए और हृदय के टुकड़े-टुकड़े हो गये। काम का उफान प्रचण्ड रहता है। भीतर से
उफन कर आता है। उसके कारण वह पानी मटमैला हो जाता है और जीव घबरा उठता है। वहाँ क्रोध रूपी
पत्थर टूटते हैं, वे मस्तक पर गिरते ही कुछ भी शेष नहीं रहता और स्त्रीरूपी मगर खींच कर अन्दर ले जाते हैं।
वहाँ कालरूपी सर्प एक ही साथ सबको निगल लेता है। भयानक विष से वे घिर जाते हैं और ज्ञान से बिछुड़
जाते हैं। जिस पर सर्प का विष चढ़ जाता है वह जिस प्रकार कडुई नीम भी मीठा गुड़ समझ कर खाने लगता है
उसी प्रकार गृहस्थों को विषय विष की तरह कड़ुआ होते हुए भी मीठा मालूम होता है और परमार्थ अमृत की
तरह मीठा होते हुए भी विषयजनों को वह कड़ुआ मालूम होता है। जो इस कूप के बाहर हैं वे भीतर वालों को
नहीं देख पाते और जो कूप के अन्दर हैं वे बाहर वालों को नहीं देख पाते। ऐसे पीड़ित प्राणियों का उद्धार करने
का धैर्य हे हृषीकेश, तुम्हारे सिवा अन्य किसी में नहीं है। तो हे कृपालु, मुझसे शीघ्र आ मिलो। इस प्रकार
दुःखरूपी कुएँ में गिरे हुए प्राणियों का तारनहार तुम हृदयस्थ नारायण ही हो। तो हे कृष्णनाथ, दौड़कर आओ,
दर्शन दो और मेरे संसार दुःख से मुझे उबार लो। यह तत्त्व जानकर मैं अब उसकी शरण में जा रहा हूँ। इससे
मेरा संसार दुःख सहज ही दूर हो जायेगा ऐसा मुझे विश्वास है।
आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्।
अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत्॥ ४२॥
मुझे तत्त्वतः यह ज्ञात हो चुका है कि समस्त पदार्थों के प्रति वैराग्य उत्पन्न होने पर मनुष्य स्वयं ही अपना
उद्धारकर्ता बन जाता है। दृढ़ वैराग्य वह है कि गहरी नींद में सोये प्राणी के पास यदि रंभा भी आ जाय तो वह
जिस प्रकार निर्विकार रहता है, उसी प्रकार विषय शरीर से भिड़ने पर भी उसके इन्द्रियों को विकार नहीं होता।
जिस प्रकार कै किये हुए अन्न पर रसना की इच्छा नहीं होती, उसी प्रकार विषय देखकर मन आसक्त नहीं होता।
ऐसा वैराग्य कैसे प्राप्त होगा? यदि विवेक दृष्टि से देखें तो मालूम होगा कि सारे जगत को काल ने ग्रस लिया
है, उससे कोई बच नहीं पाया है। बाप, दादा आदि को काल ले गया, पुत्र और नाती पोतों को काल ने निगल
लिया। यह प्रत्यक्ष देखकर भी जिसमें वैराग्य उत्पन्न नहीं होता उसका मनुष्य जन्म व्यर्थ गया। इसका नाम ही
मृत्युलोक है। स्वर्ग भी इसी प्रकार नाशवान है। उसकी इच्छा करना भी किस काम का? वैराग्य के सिवा सारे
जीव भाग्यहीन हो गये हैं।
ब्राह्मण उवाच
एवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम्।
छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा॥ ४३॥
अवधूत यदु से कहता है—उस वेश्या का भाग्य महान है कि उसमें उत्तम विवेक के साथ वैराग्य उत्पन्न
हुआ। इस प्रकार स्वात्मबुद्धि से विचार कर, जिन परपुरुषों के प्रति दुर्वासनाएँ उसे अनेक प्रकार के ताप दे रही
थीं उसे उसने पूरी तरह झटक दिया। जिन उपाधियों के कारण जन्म-मरण की बाढ़ आती है और जीव को

२०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रत्यक्ष दुःख भोगना पड़ता है। उस वेश्या ने वैराग्ययुक्त विवेक के सामर्थ्य से दुर्वासना के मूल को ही नष्ट कर
दिया। उसे उससे तत्काल शान्ति प्राप्त हो गयी और वह स्वात्मसुख का आनन्द लेने लगी। नित्यसिद्ध सुख देने
वाले हृदयस्थ कांत का आश्रय लेते ही उसके मन के विकल्प नष्ट हो गये और वह हृदयस्थ आत्माराम के साथ
एक हो गयी। अनुभव दृष्टि से उसे ऐक्यभाव से आलिंगन देते ही उस सुन्दरी को तत्काल निजसुख प्राप्त हुआ।
वाणी से वाणी अवाक हो गयी, लज्जा स्वयं ही लज्जित हो गयी, दृश्य-द्रष्टा यह अवस्था समाप्त हो गयी इससे
विषय का मार्ग ही बन्द हो गया। मन आत्मसुख से सुखी हो गया, वह पूर्ण रूप से सुखस्वरूप हो गया। संकल्प
और विकल्प उजाड़ हो गये, दोनों ही निजप्रेम में निमग्न हो गये। मिश्री पानी में घुलते ही जल मीठा हो गया,
उसी प्रकार वैराग्य के कारण उसकी भगवान से भेंट हो गयी और वह निजानंद में समरस हो गयी। वहाँ हेतु को
स्थान नहीं था, भाव-अभाव ठंडे पड़ गये और दोनों का निजप्रेम सीमातीत हो गया। 'मैं' और 'तू' का भाव
छोड़कर आलिंगन में समरस हो गये और समाधि की सेज पर उस निजपुरुष के साथ उसने शयन किया। कहीं
माया की दृष्टि न लग जाये इसलिये उस सुन्दरी ने असंख्य स्फूर्ति को उस पर न्यौछावर कर दिया। इस प्रकार
पिंगला समाधिरूपी शय्या पर निजसुख से सो गयी। यदु से अवधूत कहते हैं—इस प्रकार वैराग्य से वेश्या को
शान्ति प्राप्त हुई। वैराग्य ने आशा के बन्धन तोड़ दिये और पिंगला निरिच्छ हो गयी। सारांश निरिच्छ को ही
अपार सुख और आनन्द सर्वकाल प्राप्त होता है।
आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
यथा संछिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला ॥ ४४॥
जहाँ आशा है वहाँ आसक्ति है, आशा के पास दीनता और ममता सदा नृत्य करती है। आशा के पास
महाशोक है, आशा ही महान दोष कराती है और आशा के ही पास सम्पूर्ण पापों का संग्रह रहता है। आशा के
पास सभी अधर्म वास करते हैं, आशा किसी से परहेज नहीं करती, आशा के लिये समय का निर्धारण नहीं रहता,
वह सभी कर्मों का नाश कर डालती है। आशा नीच की उपासना कराती है, आशा नीचों की सेवा कराती है,
आशा मृत को भी नहीं छोड़ती वह प्रेत के पास भी जाती है। अनन्त में आशा उत्पन्न होते ही उसे लघु वामनरूप
प्राप्त हुआ। आशा ने देवताओं को भी दीन-हीन कर छोड़ा फिर दूसरों की क्या बात की जाय? जो जगत का
शाश्वत दाता है उसे भी आशा ने भिखारी बना डाला। शत्रु के घर वह याचक बनकर गया तो उसे द्वारपाल बनना
पड़ा। जहाँ आशा है वहाँ सुख नहीं है, आशा के पास परम दुःख है, आशा सबके लिये बाधक ही होती है।
सारांश, आशा यही मुख्य दोष है। जिसकी आशा पूर्णतया नष्ट होती है वही परमसुख प्राप्त करता है। जो आशा
को जीत लेता है, उसी के पास भगवान रहता है। उसकी बात का उल्लंघन भगवान भी नही करता। जो
आशारहित है वही बुद्धिमान है, वही विवेकनिधि है—चारों मुक्तियाँ पग-पग पर उसका वन्दन करती हैं। निराशा
सभी तीर्थों का तीर्थ है, निराशा ही मुमुक्षुओं का अर्थ है और निराशा के ही पास परमार्थ सदा खड़ा रहता है।
नैराश्य के पास वैराग्य सदा दास बनकर रहता है, हृषीकेश दिन-रात आशारहित को देखने की इच्छा करता रहता
है। नैराश्य को देखते ही दुःख भाग जाता है, निराशा के पास नित्य सुख रहता है, और निराशा के पास संतोष
निर्भय होकर खेलता रहता है। नैराश्यवंत से भेंट करने वैकुण्ठ का राणा दौड़ कर आता है। महादेव भी सहज
स्वभाव से नैराश्य की उपासना करता है। निराशा के सन्निकट मनोदुःख नहीं भटकता, जितने भी निहित धर्म हैं वे
सब निराशा के पास आकर बैठते हैं, आशारहित निश्चित रूप से सच्चिदानन्द के पद पर विराजमान होता है।

अष्टम अध्याय २०९
निराशा का नाम लेते ही देवाधिदेव दौड़ कर आता है और उसे आलिंगन देकर नामरूप भी भूल जाता है। उस
निराशा का प्यार मिलने के कारण पिंगला ने जारपुरुष की आशा का मूल ही तोड़ दिया। जो आशा पाश का छेदन
करे उसे ही समाधि का निजस्थान प्राप्त होता है। ऐसी निजसमाधि प्राप्त कर पिंगला ने शयन किया। सभी वर्णों
में नीच और कर्म भी निन्दनीय, लेकिन वह वेश्या इस जगत में पावन हो गयी। इसीलिये उसकी कथा मुझे याद
आयी। इसलिये यहाँ वैराग्य के सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है। इस प्रकार कृष्ण ने उद्धव की पीठ पर थपकी
मारकर कहा। अवधूत ने यदु से कहा—जो वेदों के अनुसार अधिकारी नहीं थी उस वेश्या के चित्त में विरक्ति
आते ही उसे स्वात्मसुख प्राप्त हुआ। इसलिये काया, वाचा तथा मन से नैराश्य की ही उपासना करनी चाहिये,
परमार्थ प्राप्ति के लिये इससे अच्छा कोई साधन नहीं है। अन्य जो भी साधन हैं, वे सब निराशा के ही लिये हैं।
इसलिये जिसने निराशा को साध लिया उसने परमार्थ लूट लिया। अवधूत करुणा से व्याप्त हो गया, उसने यदु को
गले लगा लिया और कहा, “ऐसी जो यह निराशा अर्थात् विरक्ति है उसे अवश्य साध्य करो।” एकनाथ जनार्दन
की शरण में आया है, उसकी पूर्ण कृपा है, वही आशा के पाश तोड़कर समाधान प्राप्त करायेगा।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकदश स्कंधे,
यदु अवधूत संवादे एकाकार टीकायां अष्टमोध्यायः ॥८॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।

नवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरो ! तुम्हें मेरा प्रणाम । तुम स्वयं अमरावती के इन्द्र हो तथा अनुभव यही तुम्हारा ऐरावत
है। वह हाथी स्वानंद में मत्त होकर डोलता रहता है। तुम्हारे हाथ में उपदेशरूपी तीक्ष्ण वज्र है। उससे तुम
जड़जीवरूपी पर्वतों के संकल्प विकल्परूपी पंख तोड़कर उनकी पुनः सम्यक रीति से स्थापना करते हो। विवेक
यही पारिजातक है जो वैराग्यरूपी पुष्पों से अपनी सुगन्ध बिखेर रहा है। मुमुक्षुरूपी भ्रमर उन पुष्पों में घुसकर
चित्तसुखरूपी मकरंद का सेवन करते हैं। उपशम ही बृहस्पति है, जो तुम्हारे विश्वास के कारण तुम्हारे बिलकुल
सन्निकट रहता है। तुम भी प्रेमपूर्वक उसका सम्मान करते हो। वही तुम्हारी सभा का प्रमुख सभासद है। तुम्हारे
पास कृपारूपी कामधेनुओं के वत्स हैं। श्रद्धारूपी वत्सों की गुहार से उनके स्तनों में दूध उतर आया है और वह
बह रहा है जो केवल भगवद्भक्तों के लिये है। तेजस्वी चिन्तामणि के टुकड़े तुम्हारे चारों ओर की भूमि पर बिखरे
पड़े रहते हैं लेकिन भक्त उस ओर ध्यान भी नहीं देते। तुम्हारे चरणों के प्रति भक्ति से ही वे सन्तुष्ट रहते हैं। स्वर्ग
की अप्सरायें अर्थात् अष्टमहासिद्धि तुम्हारे आगे नाना प्रकार से नृत्य करते हैं किन्तु जो यथार्थ में तुम्हारे दास हैं वे
उधर ध्यान भी नहीं देते। जो मन्दबुद्धि पुरुष हैं वे ही उसके भुलावे में आते हैं। सर्वत्र समदृष्टि का तुम्हारा
सिंहासन अटल है। उस पर सच्चिदानन्द की जो गद्दी है, वही तुम्हारा सुखासन रहता है। तुम्हारा वह पद प्राप्त
करने के लिये यज्ञकर्त्ता पुरुष साधन चतुष्टय जुटाकर 'सोऽहं' (मैं ही परब्रह्म हूँ) इस विश्वास से यज्ञ करते हैं।
जो सावधानीपूर्वक मन का होम करते हैं, उन भक्तजनों का भजन देखकर तथा उनके भक्तिभाव से सन्तुष्ट होकर
तुम अपना पद उन्हें प्रदान करते हो। उन्हें निजात्मता अर्पण कर अपने पद पर बैठाते हो। मृत्यु के बिना अमर कर,
जहाँ पतन नहीं है ऐसे स्थान पर उनकी स्थापना करते हो। इन्द्र ने अहिल्या के साथ व्यभिचार किया और तुमने
वृंद के संग व्यभिचार किया। इन्द्र केवल सहस्रनेत्र हुआ और तुम सर्वांग से सब कुछ देखने वाले हो गये। इन्द्र
को दैत्य दीन-हीन कर देते हैं और उसका पद छीन लेते हैं, भक्तजन तुम्हें प्रसन्न कर लेते हैं और तुम्हारा चिद्धन
पद छीन लेते हैं। ककुत्स्थ इन्द्र के कन्धे पर बैठा (सूर्यवंशी इक्ष्वाकु राजा के पौत्र ने इन्द्र को वृषभ बनाकर उसके
कन्धे पर बैठकर युद्ध में दैत्यों पर विजय प्राप्त की।) तुम्हारे कन्धे पर दुर्वासा बैठा। इन्द्र विष्णु की बुद्धि से
चलता है और तुम भक्तों की मर्जी से चलते हो। रावण ने इन्द्र को बंदी बनाया। इन्द्र यज्ञ का हविर्भाग माँगता है
और तुमने बलि से भूमिदान माँगा। इन्द्र अग्नि के मुख से सन्तुष्ट होते हैं और तुम विश्वतोमुख से तृप्त होते हो।
हे गुरुराया! इस प्रकार तुम कृपा की साक्षात मूर्ति हो तथा अमर चक्रवर्ती हो। अब तुम्हारी विनती करने की इच्छा
होती है तो वहाँ वाणी प्रवेश नहीं कर पाती क्योंकि तुम्हारे ही कारण वाणी प्रकट होती है। सचमुच वाणी के रूप
में बोलने वाले तुम ही हो। यह एका (एकनाथ) जनार्दन में एकरूप हो गया। इसलिये वह जनार्दन ही वास्तव में
वक्ता है। वही इस प्रकार मुख में तथा शब्दों में प्रवेश कर ग्रन्थ लिखवाने का कार्य करा रहा है। यहाँ अहंकार
पूर्णरूप से नष्ट हो गया है। अर्थात् 'मैं' नष्ट हो जाने के कारण अब तुम ही कवि-कर्त्ता बन गये हो। तुम ही
अभंगों में अर्थात् कविता में एकनाथ का नाम लिखते हो। एकनाथ का गुरु के चरणों में तादात्म्य भाव हो गया है।
उस गुरुचरण के प्रसाद से ही अवधूत ने यदु को बताये हुए गुरु के लक्षणों का यथातथ्य वर्णन किया। पिछले
अध्याय में, पिंगला किस प्रकार अकेली रहने पर विवेक और विवेक से उसकी प्रवृत्ति बदलती है और वह

नवाँ अध्याय २११
आत्मसुख प्राप्त करती है इस आशय का वर्णन है। सारांश यही है कि जैसे-जैसे पुरुष परिग्रह शून्य होता जाता है,
वैसे-वैसे आत्मसुख प्राप्त होने लगता है। भाषण का यही सार उस ब्राह्मण ने वर्णन किया।
ब्राह्मण उवाच
परिग्रहो हि दुःखाय यद् यत् प्रियतमं नृणाम्।
अनन्तं सुखमाप्नोति तद् विद्वान् यस्त्वकिंचनः ॥ १ ॥
ब्राह्मण ने राजा से कहा, “जिसके पास परिग्रह अर्थात् किसी प्रकार का संग्रह रहता है उसे दिन रात दुःख
भोगना पड़ता है। कुटुम्ब परिग्रह की आसक्ति से ही दुर्बुद्धि कपोतपक्षी का नाश हुआ। अकेले रहते हुए भी जो
परिग्रह के चक्कर में फँसते हैं वे भी दुःख प्राप्त करते हैं। गृह का परिग्रह करने पर पत्थर और मिट्टी से भी
आसक्ति होने लगती है। एक तिनके के लिये भी वे स्नेहसम्बन्ध तोड़ कर कलह के लिये उद्यत हो जाते हैं।
लेकिन आश्चर्य की बात है कि विरक्त पुरुष भी परिग्रह के फेर में पड़ जाते हैं। वे अपने शिष्य सम्प्रदाय के पाश
में फँस जाते हैं। शास्त्र के ग्रन्थों में रुचि जगती है जिससे मठ बनाने की इच्छा होती है और फिर मठ के शिष्यों
को समझाते समझाते बेचारा थक जाता है। फिर वे उस परिवार से ऊब कर सारा परिवार ही छोड़ देते हैं। मठ
की आशा जगने पर, उसके लिये शिष्य सम्प्रदाय जुटाना पड़ता है। शिष्य सम्प्रदाय एकत्र होते ही उनमें परस्पर
कलह उत्पन्न होता है। इस प्रकार परिग्रह के कारण संन्यासी को विरोध अवश्य होता है। पहले पत्नी और बच्चों
का परिग्रह त्याग कर लंगोटी भी त्यागकर निर्वस्त्र हो गया था लेकिन अब खुले बदन ही सिर पर गगरी लेकर
मठ के चारों ओर लगे पेड़ों को सींचने लगता है। यदि कोई उस पेड़ का एक पत्ता भी तोड़ता है तो वह आकाश
पाताल एक कर देता है। इस प्रकार परिग्रह का संकट अत्यन्त कठिन रहता है। वह सभी को दुःखी कर देता है।
शोक से जो भी परिग्रह करो तो वही दुःख और कलह उत्पन्न करता है। यह अनुभव होते हुए भी वैराग्य उत्पन्न
नहीं होता। परिग्रह की स्थिति कुछ ऐसी है। यह सब देखकर ही जो ज्ञाता है वह उसके प्रति आसक्ति सदा के
लिये छोड़कर अकिंचन मार्ग पर चल पड़ता है। प्रपंच स्वयं ही क्षणभंगुर है तो फिर उसका परिग्रह शाश्वत कैसे
होगा? इस प्रकार सारी बातों का विचार कर वे अकिंचन हो जाते हैं। सभी परिग्रहों में देह परिग्रह अत्यन्त कठिन
होता है। उसे मिथ्या समझ कर जो उसे तोड़ देता है वही सच्चा विचारी और ज्ञाता होता है। जिसका देह-परिग्रह
मिथ्या हो जाता है वह अनंत सुख के मन्दिर में प्रविष्ट होता है, जहाँ सुख का अन्त नहीं होता, ऐसा निजसुख
वह प्राप्त करता है। इतना कहने के बाद अवधूत ने विनोदपूर्वक कहा, “परिग्रह कितना दुःखदायी है इसका
वर्णन तुम्हें टिटिहरी को गुरु बनाने के प्रसंग में बताया।” यह सुनते ही राजा को झटका सा लगा। उसने अपने
मन में कहा, मैं भी राज-परिग्रह के पाश में फँस गया हूँ और देह परिग्रह में बन्दी हो गया हूँ। इसलिये मुझे अब
इनका त्याग करना चाहिए। इस प्रकार राजा के मन में वैराग्य उत्पन्न होकर वह अपना सर्वस्व त्याग करने के
लिये तत्पर हो गया। उसे श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होने के कारण वह आत्मज्ञान के लिये सुपात्र बना।
टिटिहरी को गुरु बनाने से परिग्रह का विचार करने के लिये वह ध्यानपूर्वक श्रवण करने लगा।
सामिषं कुररं जघ्नुर्बलिनो ये निरामिषाः।
तदामिषं परित्यज्य, स सुखं समविन्दत ॥ २ ॥
कोई एक नर टिटिहरा पक्षी था। उसे स्वादिष्ट माँस का एक टुकड़ा मिला। उसे तुरन्त खा लेना चाहिये था
लेकिन अपने लोभी स्वभाव के कारण उसने उसे अपने पास जतन करके रख लिया। उस मांस के टुकड़े को

२१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
देखकर अनेक टिटिहरी पक्षी जो उससे बलवान भी थे, वे दौड़ कर उसके पास आये। वे अब जोर जबरदस्ती से
मुझसे वह टुकड़ा छीन लेंगे यह जानकर वह भागने लगा। वह दौड़ रहा है यह देख कर सबने उसे घेर लिया।
माँस के उस टुकड़े की लालच में वहाँ बहुत बड़ा झगड़ा शुरू हो गया। कोई पंख से प्रहार करने लगे तो कोई
नाखून गड़ाने लगे तो कोई मुँह से काटने लगे। इससे उसे अत्यन्त दुःख हुआ। मुँह में माँस का टुकड़ा होने के
कारण वह चिल्ला भी नहीं सकता था। वे लोग कितनी ही धक्का-मुक्की कर रहे थे लेकिन उसका मुँह बन्द
था। वह मन में विचार करने लगा कि ये मेरे सजातीय बाँधव होते हुए मुझे क्यों पीड़ा दे रहे हैं ? उसने कहा कि
मेरे पास का यह माँस का टुकड़ा ही मेरे दुःख का मूल कारण है और यह कहकर उसने तत्काल वह टुकड़ा
फेंक दिया और सुखपूर्वक, शान्त होकर बैठ गया। लेकिन जहाँ माँस का वह टुकड़ा गिरा था वहाँ झगड़े के
कारण विचित्र सा कोलाहल मच गया। लोग एक-दूसरे का सिर फोड़ने लगे और मुँह नोचने लगे। वह टिटिहरी
उस झगड़े को बड़े मजे में देख रही थी। सारांश जहाँ मूल परिग्रह विद्यमान है, वहाँ दुःख रहता है और उसका
त्याग करने पर अपार सुख की प्राप्ति होती है। अट्टालिकायें, गोपुर, बाडे, धन, धान्य, वस्त्रालंकार, रत्न, पत्नी,
बच्चे आदि जो समुदाय है, वही परिग्रह है। इस सारे परिग्रह का मूल यदि खोजा जाय तो केवल देहबुद्धि, अर्थात्
'देह ही मैं हूँ' यह भावना है। वह भी अभिमान में सनी हुई, अर्थात् सबका मूल कारण अभिमान है। उस
अभिमान का ही जब त्याग करेंगे, तभी प्रपंच की जड़ नष्ट होती है। जब जड़ ही टूट जाती है तब वृक्ष भी गिर
पड़ता है। अभिमान देहबुद्धि के लिये जीवन की तरह है और देहबुद्धि भी संग से दृढ़तर होती है। इन दोनों की
संगति का निवास स्थान परिग्रह है। इस प्रकार ये दोनों परस्पर चिपके रहते हैं। इनका त्याग करने से अपार सुख
प्राप्त होता है और उसका संग्रह करने से वह दुःख का कारण बनता है। पहले अभिमान का त्याग करना चाहिये।
अभिमान के साथ सब कुछ छोड़ देने से सुख की बिछावन पड़ेगी। उस सुख का वर्णन करने में शब्द लजाकर
पीछे हट जाते हैं। हे राजा! अब तुम यदि पूछोगे कि अभिमान छोड़ कर कैसे रहा जाय तो उसके लिये बालक
को गुरु बनाने का वृत्तांत सुनाता हूँ।
न मे मानावमानौ स्तो, न चिन्ता गेहपुत्रिणाम्।
आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत् ॥ ३॥
बालक कभी नहीं कहता कि यह मेरा है या यह तेरा है। उसकी समझ में ऊँच-नीच नहीं आता। इसलिये
वह सुखपूर्वक मान-अपमान को सहकर रहता है। तीन महीने के बालक को मान-अपमान की समझ नहीं होती,
वह अपने ही आनन्द में प्रसन्न रहता है। दूजेपन को वह स्पर्श ही नहीं करता, अपनी ही लीला में मस्त होकर
वह खेलता रहता है स्वयं ही अपना मनोरंजन करता है। बच्चे को घरबार की चिन्ता कभी स्पर्श नहीं करती। वह
स्वभाव से ही चिन्तामुक्त रहता है। उसे चिन्ता की बात मालूम ही नहीं रहती इसलिये वह स्वयं से ही प्रेम करता
है। अपने में ही रममाण रहता है। वही स्थिति योगी की है। उसे प्रपंच का भान नहीं रहता इसलिये उसके लिये
मान और अपमान एक समान रहते हैं। चित्र में बने सर्प का दंश किया हुआ जिस प्रकार चित्त के ही अमृत से
बच जाता है, उसी प्रकार योगी जन्म-मरण की झंझट से छूट कर द्वंद्व से मुक्त होकर निश्चल बना रहता है।
घरबार, पत्नी तथा बच्चों की चिन्ता उसके लिये मिथ्या है, क्योंकि जब उसे अपना देह ही सच्चा मालूम नहीं
होता तो पत्नी और बच्चों की चिन्ता क्यों होगी? यदि संसार का मूल खोजा जाय तो वह है कल्पना। वह कल्पना
मन के अधीन रहती है। जब वह मन ही स्वस्वरूप में लीन हो जाता है तो सब कुछ चिद्धन बन जाता है। उस

नवाँ अध्याय २१३
स्वरूप की प्राप्ति के कारण वह चिद्घन स्वरूप में क्रीड़ा करता रहता है। वह क्रीड़ा अभिमान रहित तथा दैवयोग
से चलती रहती है। जब आत्मसुख की प्राप्ति होकर मन के साथ सारे इन्द्रिय शान्त हो जाते हैं, वृत्तियों में जब
अणुमात्र का भी स्फुरण नहीं होता तो उस स्थिति को 'समाधि' कहते हैं। उसी स्वरूप में मन लगाकर जब बाह्य
स्फूर्ति का स्फुरण होता है तो उस स्थिति को साधुजन 'व्युत्थान' कहते हैं। ड्योढ़ी पर दीपक रखने से जिस
प्रकार दोनों ही ओर की चीजें दिखायी पड़ती हैं, उसी प्रकार व्युत्थान दशा को जीवभावना तथा शिवस्वरूप दोनों
का ही ज्ञान रहता है। नमक और पानी जिस प्रकार मिल कर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में जब
मन घुल मिल जाता है तो उसका आत्मस्वरूप से तादात्म्य हो जाता है और वह 'समाधि' तथा 'व्युत्थान' दोनों
को लात से झटक देता है। फिर उसे न किसी का मान ही रहता है और न अपमान ही रहता है। फिर घरबार और
स्त्री, पुत्रों की चिन्ता कौन करेगा? मन स्वस्वरूप में खो जाने के कारण वह उसे आत्मसंतोष प्राप्त होता है। मन
विरहित शरीर व्यापार किसी बच्चे की तरह होते हैं। दैवयोग से ही जो हलचल हो जाय वही पर्याप्त है अर्थात्
सदा शून्यवृत्ति से व्यवहार करना।
द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द अप्लुतौ।
योविमुग्धा जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः ॥४॥
चिन्ता की भँवर बहुत बलवान है। उसमें ब्रह्मदेव सरीखे देवतागण भी डूब जाते हैं। लेकिन हे यदुवीर!
उसमें से केवल दो ही बच पाते हैं, योगी और बालक ! उन दोनों को ही द्वैत का भान नहीं होता, दोनों को ही
मान अपमान का ज्ञान नहीं होता, दोनों ही सुख में सुखी रहते हैं और दोनों ही मन विरहित व्यवहार करते हैं।
लेकिन एक को बाद में दुःख प्राप्त होता है और दूसरा सुख और दुःख पर विजय प्राप्त कर चुका होता है। एक
को मुग्धता का अर्थात् अज्ञान का सुख रहता है तो दूसरा आत्मज्ञान के कारण सुखी रहता है। बालक के मन में
सुप्त वासना रहती है, उसी में बाद में अंकुर फूटते हैं जो उसे चक्कर में डाल देते हैं लेकिन योगी की यह बात
नहीं होती। वह गुणातीत रहता है। संसार में उसका सुख-दुःख के साथ कोई सम्पर्क नहीं होता। जब देह में जीव
विद्यमान रहता है तो वह गुणातीत कैसे रहता है? तो उसका रहस्य भी बताता हूँ। साधक साधुजनों की सेवा
करके अपना सत्त्वगुण बढ़ाता रहता है। इस प्रकार सत्त्वगुण बढ़ जाने पर ज्ञान का साधन सिद्ध हो जाता है। उस
सिद्ध ज्ञानसाधना के योग से वे मृत्युलोक में मोह ममता का भोग भोगने की समस्या को नष्ट कर देते हैं। सारांश
यही कि शुद्ध सत्त्व की वृद्धि से रज और तम का संहार हाता है और सत्त्व एकमेव रह जाता है जो धीरे-धीरे
स्वयं ही शान्त हो जाता है। जब तक लकड़ी के बोझ आग में पड़ते रहते हैं तब तक वह बड़े उल्लास से उसे
जलाती रहती है लेकिन जब लकड़ी का एक भी टुकड़ा शेष नहीं रहता तब वही अग्नि अपने मूल तेज में
विलीन हो जाता है। इसी प्रकार गुणावस्था को जीत कर योगी गुणातीत अवस्था तक पहुँच जाता है। इसलिये
कल्पांत होने पर भी उसे संसार की व्यथा नहीं सताती। जो सुख अनन्त है, उसकी प्राप्ति उन्हें आत्मस्वरूप के
रूप में ही प्राप्त हुई रहती है। देह में विचरण करते हुए भी वे देहातीत रहते हैं इसलिये चिन्ता का भँवर उनके
लिये नहीं है। सचमुच, एक हुए बिना यह अवस्था नहीं प्राप्त होती। इसीलिये, हे राजेश्वर ! मैंने कुमारी को गुरु
बनाया था, उसकी कथा सुनाता हूँ।
क्वचित् कुमारी त्वात्मानं वृणानान् गृहमागतान्।
स्वयं तानर्हयामास क्वापि यातेषु बन्धुषु ॥ ५ ॥

२१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एक कुमारिका थी। उसे घर में छोड़कर उसके माँ-बाप अपने इष्ट मित्रों के साथ कुलस्वामी की यात्रा पर
गये। उन्होंने उस कन्या के विवाह का विचार पहले से ही कर रखा था। वही सम्बन्ध निश्चित करने के लिये
वरपक्ष की ओर से श्रेष्ठ ब्राह्मण उनके घर आये। उन्होंने पूछा, "घर में कौन है?" लेकिन भावी वधू ने लज्जा
के कारण मौन रखा लेकिन उनके स्वागत की पूरी तैयारी की। खिड़की में से ही सबको बैठने के लिये आसन
दिये। गंधाक्षत, फूल, पान आदि सामग्री बिना माँगे ही लाकर धर दी। पूजा की सारी सामग्री सामने देखकर
ब्राह्मण समझ गये कि वधू घर में अकेली है और उसकी ही यह चातुरी है। उसे उनके मेहमाननवाजी की चिन्ता
पड़ गयी। वह मन ही मन बोली, "मेरी माँ को आने में विलम्ब होगा और घर में तो चावल भी कूटे हुए नहीं
हैं। चावल कूटने में तो भोजन में विलम्ब हो जायेगा।"
तेषामभ्यवहारार्थं, शालीन रहसि पार्थिव।
अवघ्नन्त्याः प्रकोष्ठस्थाश्चक्रुः शङ्खाः स्वनं महत्॥ ६॥
ऐसा विचार मन में करते हुए वह चावल कूटने लगी

नवाँ अध्याय २१५
तक मैंने 'अरिमर्दन' किया यह कहना उचित नहीं होगा। काम आदि जो षड्रिपु हैं उन्हें इस उपदेशरूपी शस्त्र से
जब तक हतवीर्य नहीं कर देते तब तक संसार में मेरा कोई शत्रु नहीं है यह नहीं कह सकते। अस्तु ! अब तुम
यदि पूछोगे कि तुम अवधूत लोकविरहित होकर रहते हो और वह कन्या तो घर के भीतर रहने वाली, तो तुम्हें
उसका एकान्त का वृत्तांत कैसे मालूम हुआ ? तो सुनो, मैंने निर्जन अरण्य में रहकर, गुरुवचन पर विश्वास कर,
आसन पर अटल बैठ कर ध्यान से निजत्त्व का आकलन किया है। उस तत्व निश्चय के लिये मैं इस पृथ्वी पर
विचरण करता फिरता हूँ और भले ही मैं जन में रहूँ या वन में, लेकिन मैं निजात्मभाव दृढ़ करके ही देखता रहता
हूँ। भले ही दृश्य पदार्थ से भेंट हो जाय लेकिन दृश्य दृश्यत्व से नहीं दिखायी देता। इतना ही नहीं, अपितु
द्रष्टापन भी नष्ट हो जाता है। ऐसी दृष्टि से मैं भटकता रहता हूँ। इस प्रकार गुरुत्व के गुण स्वीकार कर जब मैं
संसार की ओर देख रहा था, तभी मुझमें चैतन्य भाव का स्मरण हुआ। इस आत्मदृष्टि से चराचर सृष्टि में
विचरण करते समय मैं एकाएक उसी समय उस लड़की के घर पहुँच गया। हे चतुरा ! अपना हेतु सिद्ध करने के
लिये उस लड़की ने कंगन की युक्ति का कैसे विचार किया, उसका विचार कर मैंने उससे किस प्रकार का बोध
लिया उसे श्रवण करो।
वासे बहूनां कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि ।
एक एव चरेत् तस्मात् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १० ॥
जिस स्थान पर अनेक लोग निवास करते हैं, वहाँ सदा कोलाहल मचा रहता है। इतना ही नहीं, केवल
दो ही व्यक्ति जब एकान्त में बैठते हैं तो भी वे अनेक प्रकार की बातें करने लगते हैं। जहाँ बातें करने में ही
समय व्यतीत हो जाता है वहाँ अपना कोई स्वार्थ नहीं सध पाता। इसीलिये मैं अकेला ही घूमता रहता हूँ।
अकेले होते हुए एकाग्रता सधी तो बहुत बड़ा लाभ होता है और इसीलिये मैंने सचमुच ही बाण बनाने वाले
को अपना गुरु बनाया।
मन एकत्र संयुञ्ज्याज्जितश्वासो जितासनः ।
बैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रितः ॥ ११ ॥
वैराग्य के बिना अभ्यास शुरू करने से विषयरूपी चोर उठ खड़े होते हैं, काम डाका डालता है और
मूलधनरूपी आत्मज्ञान ही नष्ट हो जाता है। इसलिये सबसे पहले विवेकरूपी दीपक से अज्ञानरूपी अन्धकार को
पहले नष्ट करना चाहिये और महामुद्रा (भूचरी, खेचरी, अगोचरी तथा अलक्ष्य) के योग से वैराग्य की भी पूरी
सहायता लेनी चाहिये। प्राण और अपान की बहुत दिनों से भेंट नहीं हुई थी वह अभ्यास के योग से हो गयी। वह
भेंट होते ही पुराने परिचय के चिह्न स्मरण हो आये। तब उन दोनों ने एक-दूसरे को आलिंगन दिया और समसाम्य
से दोनों का समाधान हुआ। इस प्रकार आसन पर स्थिर बैठकर प्राण और अपान में ऐक्य उत्पन्न किया और
ब्रह्मस्थान में प्रवेश करने के लिये बाँहें सरकायीं। ब्रह्म-गिरी के किले को शमदम से घेर कर इन्द्रियों के अंतर्मुख
से प्रहार किया। प्राणापान की सुरंग में पूर्व परिचय होते हुए भी मन को एकाग्र रखकर उनमें ऐक्य स्थापित किया।
एकाग्रता के हमले से आगे बढ़ने वाले प्राण और आगे बढ़े और उन्होंने कुण्डलिनी शक्ति के द्वारा षट्चक्रों का
भेदन किया। उन वीरों ने वैराग्य का कवच पहन लिया और पूरी एकाग्रता से उनके हाथ में ध्यानरूपी खड्ग
चमकने लगे। उन खड्गों के चमत्कार का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? उन्होंने छोटे-बड़े सभी को साफ कर
दिया। उसके सामने कोई सन्देह भी आ जाता तो उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाते। उसने आलस को रसातल में भेज

२१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
दिया और निद्रा को अपने वश में कर लिया। इस प्रकार दिन-रात सावधान रहकर योगरूपी किले को जीतने के
लिये वे तत्पर रहते हैं। समरांगण के वीर बड़े रणधुरंधर थे। वे अपने ही बल पर आगे कूच करने लगे और
सत्रहवीं जीवन कला अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र के अमृत संग्रह (तालाब) को उन्होंने हस्तगत कर लिया। वहाँ प्रचण्ड युद्ध
हुआ। युद्ध में कामादिक छह शत्रुओं का संहार हुआ और वह अमोघ तथा दिव्य खड्ग चमकता रहा। इस प्रकार
रणांगण में शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सत्रहवीं का जल अर्थात् अमृत प्राशन किया। तभी उस किले में से
एकाएक अनुहत का ध्वनि सुनायी देने लगा। यहाँ सोहंवीरों की एकाग्रता होते ही भीतर का सारा भेद हाथ में आ
गया। किले की रक्षा करने वाली अहंता मरने-मरने को हो आयी।
यस्मिन् मनो लब्धपदं यदेतच्छनैः शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून्।
सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम्॥ १२॥
कामक्रोधादि वीर पुत्र युद्ध में मारे गये इस दुःख से विह्वल होकर अहंता और ममता मृत्यु की प्रतीक्षा
करने लगे। किले की यह वार्त्ता सुनकर उन शमदमादि वीरों में और भी अधिक स्फूर्ति का संचार हुआ और
उन्होंने पुनः उस किले को जीतने के लिये आह्वान किया। उन वीरों का धैर्य विलक्षण था। पराक्रम करने में तो
वे प्रसिद्ध थे ही। उन्होंने आगे का मार्ग देखा तो उन्हें उसमें विकट संकट दिखायी दिया। वहाँ वासनाओं के
दुर्धर घाट थे जिसमें चलना अत्यन्त कठिन था। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे उस घाट पर चढ़कर उसे समतल बना
दिया। उसके आगे रजतम की भीषण खाई दिखायी दी। वह अपार गहरी खाई थी लेकिन उसमें निवृत्ति के
पत्थर डालकर उसे बन्द कर दिया। फिर किसी को भी आहट न लगने देकर 'मनकर्णिका वोवरी' नामक
आज्ञाचक्र हस्तगत कर ब्रह्मगिरी पर चढ़ने के लिये रस्सी की बनी सीढ़ी लगायी और ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश किया।
तब चारों ओर दिग्विजय की जयजयकार सुनायी देने लगी। देखा तो वहाँ कोई भी शत्रु नहीं था, चारों ओर
अपना ही राज्य था। तब रजतम की राहें अपने आप समतल होकर वहाँ रामराज्य की मुनादी की गयी। वहाँ
कोई भी पराया नहीं दिखा। तब ध्यानरूप खड्ग को मुट्ठी में पकड़ लिया, समदृष्टि से वैराग्य कवच की गाँठ
भी कुछ ढीली की। देखने पर ध्येय, ध्यान और ध्याता ही दिखायी नहीं दिये इसलिये ध्यान खड्ग की
आवश्यकता ही नहीं रही। सत्त्व ने युद्ध की प्रचण्ड सामग्री एकत्र की थी लेकिन सामने कोई शत्रु नहीं दीख
रहा था इसलिए उसे दूर फेंक दिया। तब तन्मयतारूपी छत्र धारण कर वह योगी जीवभाव को त्याग कर सहज
समाधान से समसाम्य के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ। फिर शुद्ध सत्त्वगुण बढ़ा और उसने सर्वस्व को त्याग कर
तथा प्रणाम कर वह स्वयं आत्मस्वरूप में लीन हो गया। जिस प्रकार मंथन कर उत्पन्न किया हुआ अग्नि उन
काष्ठों की होली जलाता है और स्वयं शान्त होता जाता है उसी प्रकार रजतम रहित सत्त्व निकाल लेने पर रज
और तम का अपने आप ही विनाश हो जाता है और फिर सत्त्व के संभ्रम का अपने आप विलय हो जाता है।
तब जीव का जीवत्व नष्ट हो जाता है, ज्ञातृत्व के साथ ज्ञान का लय हो जाता है, प्रपंच का भी ध्यान नहीं
रहता और पूरी तरह चिन्मात्र स्वरूप भर जाता है।
तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किंचिद् बहिरन्तरं वा।
यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्तमिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे॥ १३॥
इस प्रकार परिपूर्ण भरे हुए चिन्मात्र स्वरूप में चित्त को संयत कर लाने से हे राजेन्द्र ! उस चित्त को भी
वहाँ चैतन्यस्वरूप ही प्राप्त होता है, इसे ध्यान में रखो। तब हृदय में भी चैतन्य धन और बाहर भी परिपूर्ण शुद्ध

नवाँ अध्याय २१७
चैतन्य भर जाता है, वहाँ दूसरा कुछ भी नहीं दिखायी देता। वृत्ति पूर्णतयः समर्पित रहती है। ध्येय, ध्याता और
ध्यान इन तीनों को एक साथ देखकर मन उल्हास से भर जाता है। इसी को 'सविकल्प समाधि' कहते हैं।
उसका निर्गुण रूप में ही उपभोग करते हैं। वहाँ मन पूरी तरह समरस होकर रहता है और वह सुखरूप
चिद्घनस्वरूप होकर ही रहता है। ज्ञानीजन ऐसी समाधि को अत्यन्त श्रेष्ठ मानते हैं। ब्रह्म इन्द्रियों के लिये गोचर
नहीं है, गुण नष्ट होने पर ही वह आँखों को दिखाई देता है। जो अनुभव लेता है उसी को वह प्रतीत होता है।
उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उस पर विवाद करते-करते शास्त्र भी एक दूसरे के विरुद्ध हो गये हैं। वेदों
में तो उसे 'नेति', 'नेति' कहा गया है। योगियों के समुदाय तो हाथ टेक कर शान्त बैठ जाते हैं। अनुभवी लोग
उसे आत्मज्ञान से जानते हैं। वहाँ हेतु-मात्र दृष्टांत समूल डूब जाते हैं और अद्वैतवाद ने भी मात कर दी।
अंतर्बाह्य समदृष्टि होना यही अनुभव का निश्चित लक्षण है। इसी बात को ध्यान में रख कर मैंने शरकर्ता को गुरु
बनाया। बाण की नोक को तपा कर उसे सीधा करते समय उसकी दृष्टि एकाग्र होकर वहीं लग गयी थी। केवल
उतने से ही उसका बाह्य प्रपंच की ओर से ध्यान हट गया। फिर राजा की सवारी पूरी शान शौकत के साथ उसके
द्वार पर से गयी लेकिन सारा ध्यान.शर तैयार करने में लगा होने के कारण उसे उसका भान ही नहीं रहा। इतने
में, पीछे से राजा का नौकर आया और उसने पूछा, "क्या राजा की सवारी इधर से गयी है?'' लेकिन उसने उत्तर
दिया, "देखा तो नहीं।" (अवधूत कहते हैं) उस शरकर्ता को मैंने अपनी आँखों से देखा और उसकी बात
सुनकर मैंने यह बोध ग्रहण किया कि संसार में एकाग्रता ही श्रेष्ठ वस्तु है। वह प्रपंच को आँखों के सामने नहीं
आने देती। यही सिद्ध करने के लिए मैंने सर्प से यही शिक्षा ली कि घरबार किये बिना अकेले ही रहना उचित है
और मैंने सर्प को गुरु बना लिया।
एकचार्यनिकेतः स्यादप्रमत्तो गुहाशयः।
अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरेकोऽपभाषणः ॥ १४॥
सर्प को किसी का भी संग अच्छा नहीं लगता। वह अकेला ही सुखपूर्वक विचरण करता रहता है। वह
निरन्तर सावधान रहता है और एक भी साँस व्यर्थ नहीं जाने देता। योगी की स्थिति भी ऐसी ही रहती है। उसे भी
दूसरे का उपसर्ग अच्छा नहीं लगता। जहाँ लोगों की दृष्टि न पड़े ऐसे एकान्त स्थल में वह रहता है। वह खराब
आदमी की संगत नहीं करता लेकिन अच्छे का भी साथ नहीं निभाता। जिस प्रकार साँप अपनी केंचुल उतार
फेंकता है, उसी प्रकार योगी भी अपने देहसंग से बाहर निकल पड़ता है। निरन्तर सावधान रहकर वह एक भी
क्षण व्यर्थ नहीं जाने देता। सचमुच वह अपना स्वरूपानुसंधान टूटने नहीं देता। सर्प स्वयमेव बिल में घुस जाता है
क्योंकि जिस मार्ग से वह गया है उसे सब लोग देखते हैं। लेकिन उसने खाया है या नहीं इसे कोई नहीं देखता।
उसी प्रकार योगी भी योगसामर्थ्य से लोगों के सम्पर्क में न रहकर गुफा में पड़ा रहता है और स्वयं से ही क्रीड़ा
करता रहता है। योगी का आचार छोटे-बड़े सभी देखते हैं लेकिन वह वास्तव में सविकल्प है या निर्विकल्प है
यह किसी की समझ में नहीं आता। कोई कहता है कि वह कर्मनिष्ठ है तो कोई उसे कर्मभ्रष्ट कहता है। लेकिन
उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से किसी को कुछ भी मालूम नहीं होता। सर्प को तो बोलना नहीं आता वह केवल
किसी शब्द का उच्चार मात्र करता है। उसी प्रकार योगी भी किसी प्रकार के वाद-विवाद में नहीं फँसता।
अंतःकरण की कृपा के बल से थोड़ा सा ही किन्तु मृदु, मंजुल और कोमल कुछ तो बोलता है। इसलिये उसे एक
ही बार सुन लेने पर भी कान तृप्त हो जाते हैं देखा जाय तो उसका बोलना अत्यन्त संक्षिप्त होता है, लेकिन वह

२१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
संकल्प विकल्प का विनाश कर देता है। जो सत्यसंकल्पी होते हैं वही उसके शब्दों के स्वरूप को पहचानते हैं।
जो अकेला और उदासीन है, जिसका मन परमार्थ की ही ओर लगा हुआ है उसे घरबार करने की इच्छा कर
व्यर्थ का परिश्रम नहीं करना चाहिये।
गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलश्चध्रुवात्मनः।
सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥ १५ ॥
घरबार करना यही मूलतः दुःख का कारण है। जी जान से परिश्रम कर तथा कष्ट सह कर तीन मंजिल का
मकान बनाइये लेकिन वह सर्वथा अशाश्वत ही रहता है। जहाँ संसार ही नाशवान है, शरीर का प्रत्यक्ष आकार ही
मिथ्या है वहाँ केवल घर ही किस तरह शाश्वत हो सकता है ? लेकिन मूर्ख लोग इसी को सत्य मान कर चलते
हैं जो गर्भ में ही मृत हो गया उसका जन्म से ही जातक करते और मृत के ही जन्म पर उसका नामकरण करते
हैं, उसी प्रकार अशाश्वत घर की स्थापना करना है। ऐसे गृह का प्रारम्भ भी मिथ्या है क्योंकि उसमें मिट्टी के
लिये झगड़ा होता है, पत्थर और लकड़ी के लिये भी सम्बन्धी को दूर रखकर टंटा होता है। दीपक बड़े प्रयास से
घर बनाती है और उसमें घुस कर सर्प बड़े मजे में रहता है। बिना किसी प्रकार का कष्ट किये दूसरे के घर में
मौज करता है। उसी प्रकार योगी भी घर या देह का अभिमान नहीं करता। बिना, किसी अभिमान के, दूसरे के
घर में रहकर आनन्द करता है। मैंने घर न बनाने का निश्चय किया। किन्तु ईश्वर ने जब इतनी बड़ी सृष्टि
बनायी है उससे उसे बाधा क्यों नहीं होती ? तो सृष्टि की रचना किस प्रकार हुई ? वह किससे उत्पन्न हुई ? यही
जानने के लिये मैंने मकड़ी को अपना गुरु बनाया।
एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया।
संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥
नर का आश्रयस्थल है इसलिये उसे 'नारायण' कहते हैं। समस्त जीवों का जो जीवन है वही नारायण
सबका स्वामी है। ऐसा जो नारायण है उसने इस संसार को पहले उत्पन्न किया। कोई भी बाह्य सामग्री लिये बिना
उसने इस विश्व की उत्पत्ति की। अकेले और वह भी बिना किसी सामग्री के यह कैसे सम्भव हुआ ? तो उसने
अपनी ही माया का क्षोभन कर यह संसार बनाया। उस निज माया के उदर में जीवसमुदाय असंख्य भरा हुआ है।
उस माया का उसने दृष्टि से अवलोकन किया। इसी को निजकाल कहते हैं। इस प्रकार उसने अपनी माया की
ओर देखा और उसे अपने शरीर पर खेलने दिया लेकिन अपने शरीर का स्पर्श नहीं होने दिया। ऐसी अलिप्तता
का खेल वही जानता है। आकाश में धुआँ फैलता है लेकिन आकाश धुएँ को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार वह
अपने शरीर पर माया का पोषण करता है लेकिन उससे अलिप्त रहता है। जल से ही कमलिनी का पोषण होता
है लेकिन उसी जल को वह अपने पत्ते में ढँक देती है। उसी प्रकार माया सत्-चित्-आनन्द में से आनन्द पर
'आवरण' डालती है, किन्तु सत-अंश के साथ चित् स्वतंत्र ही रहती है। स्वमाया का जो अधिष्ठान है वही माया
का निवास स्थान है। उसी प्रकार वास्तव में माया का नियंता नारायण ही है। रजोगुण सृष्टि को उत्पन्न करता है,
सत्वगुण उसका पालन करता है और तमोगुण कल्पांत के समय क्षुब्ध होकर काल के रूप में उसका संहार करता
है। किन्तु माया की यह क्षोभक शक्ति नारायण के हाथ में रहती है, इसी दृष्टि से अन्त में संहार करने वाला
ईश्वर ही रहता है।

नवाँ अध्याय २१९
एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रयः।
कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु।
सत्त्वादिष्वादिपुरुषः प्रधानपूरुषेश्वरः॥ १७॥
परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञितः।
केवलानुभवानन्दसंदोहो निरुपाधिकः॥ १८॥
इस प्रकार कार्यकारण नष्ट करने के बाद एक अकेला परिपूर्ण नारायण ही शेष रहता है। लेकिन यहाँ पर
अकेला नारायण रहता है यह कहने वाला भी कौन है? यह लक्षण तो अद्वितीय है, इसी को भेद शून्य अवस्था
कहते हैं। वहाँ न 'सजातीय भेद' है, न 'विजातीय' भेद है और 'स्वगत' भेद भी वहाँ नहीं है। इस प्रकार वह
भेदरहित ही रहता है। ऐसा जो भेदरहित है वही प्रकृति पुरुषों का ईश्वर है। वही सबका श्रेष्ठ नियंता तथा 'पर'
और 'अवर' है। उसके सम्बन्ध में भी निर्णय सुन लो। मनरहित संकल्प से जिसने प्रकृति और पुरुष को उत्पन्न
किया वही वास्तव में ईश्वर है। उसी के सामर्थ्य से वे व्यवहार करते हैं। प्रकृति को चेताती सत्ता ही उसका
पुरुषत्त्व है। इसीलिये प्रकृति का पति सभी दृष्टि से यही है। ब्रह्मदेवादि देवता 'पर' है तथा मनु से लेकर स्थावर
तक सभी जीव 'अवर' हैं। इनका नियंता और चालक वही है। उसकी आज्ञा के बिना वायु भी नहीं हिलता, समुद्र
अपनी मर्यादा में रहता है और सूर्य दिनमान नियंत्रित करता है। जिसकी आज्ञा को नमन कर प्राण भी (नाक में)
बारह अंगुल तक ही घूमता रहता है। आज्ञा के भय से उसके आगे नहीं जा सकता। कठोर आज्ञा को ध्यान में
रखकर मेरु भी अपना स्थान नहीं छोड़ता। चेतनशक्ति को आज्ञा मिलते ही वह अचेतन देह को सचेतन कर
डालती है। वह स्वयं निराधार होते हुए भी सारे विश्व के लिये आधार बन गया है उसी प्रकार जैसे सर्पाभास के
लिये रस्सी का ही आश्रय रहता है। सत्त्व आदि जो गुणशक्ति है वह आत्मकाल गति को नियंत्रित कर उसे
समस्थिति में ला कर रखती है। वही प्रकृति अदृश्य रूप में निर्गुण स्थान में रहती है। जिस प्रकार वटवृक्ष अपने
बीज में समा कर रहता है उसी प्रकार समस्त उपाधियों को निगल कर ब्रह्म केवल निरुपाधिक स्वरूप में रहता है।
जिस प्रकार मंदराचल न होने पर क्षीरसागर निश्चल रहता है, अथवा विभिन्न आकार के अलंकारों को भट्टी में
डालने पर वह मूल सुवर्ण की तरह हो जाता है अथवा जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से आकाश के समस्त नक्षत्रों
को तेजहीन कर देता है उसी प्रकार माया के कारण आकार लेने वाली सारी सृष्टि लुप्त होकर केवल निरुपाधिक
परमात्मा ही शेष रह जाता है अथवा ग्रीष्म ऋतु के अन्त में जिस प्रकार सभी प्रकार के बीज पृथ्वी में लीन हो
जाते हैं उसी प्रकार प्रकृति उसमें लीन होकर वह केवल सुखस्वरूप में शेष रहता है। ऐसा केवल निरुपाधिक,
सुखस्वरूपानंद का कल्लोल, चिन्मात्र तेज से तेजयुक्त तथा सद्-अंश के कारण निरन्तर निर्मल उस ज्ञानस्वरूप
अनन्त ने उत्पत्ति काल में सृष्टि की रचना कैसे की उसे भी ध्यानपूर्वक श्रवण करो।
केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम्।
संक्षोभयान् सृजत्यादौ तय सूत्रमरिंदम॥ १९॥
तामाहुस्त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम्।
यस्मिन् प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पुमान्॥ २०॥
उसने अपनी कालसत्ता से अपनी माया की ओर देखा तो वह क्षुब्ध हो गयी और उसने निजसूत्र अर्थात्