श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
संकल्प विकल्प का विनाश कर देता है। जो सत्यसंकल्पी होते हैं वही उसके शब्दों के स्वरूप को पहचानते हैं।
जो अकेला और उदासीन है, जिसका मन परमार्थ की ही ओर लगा हुआ है उसे घरबार करने की इच्छा कर
व्यर्थ का परिश्रम नहीं करना चाहिये।
गृहारम्भोऽतिदुःखाय विफलश्चध्रुवात्मनः।
सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥ १५ ॥
घरबार करना यही मूलतः दुःख का कारण है। जी जान से परिश्रम कर तथा कष्ट सह कर तीन मंजिल का
मकान बनाइये लेकिन वह सर्वथा अशाश्वत ही रहता है। जहाँ संसार ही नाशवान है, शरीर का प्रत्यक्ष आकार ही
मिथ्या है वहाँ केवल घर ही किस तरह शाश्वत हो सकता है ? लेकिन मूर्ख लोग इसी को सत्य मान कर चलते
हैं जो गर्भ में ही मृत हो गया उसका जन्म से ही जातक करते और मृत के ही जन्म पर उसका नामकरण करते
हैं, उसी प्रकार अशाश्वत घर की स्थापना करना है। ऐसे गृह का प्रारम्भ भी मिथ्या है क्योंकि उसमें मिट्टी के
लिये झगड़ा होता है, पत्थर और लकड़ी के लिये भी सम्बन्धी को दूर रखकर टंटा होता है। दीपक बड़े प्रयास से
घर बनाती है और उसमें घुस कर सर्प बड़े मजे में रहता है। बिना किसी प्रकार का कष्ट किये दूसरे के घर में
मौज करता है। उसी प्रकार योगी भी घर या देह का अभिमान नहीं करता। बिना, किसी अभिमान के, दूसरे के
घर में रहकर आनन्द करता है। मैंने घर न बनाने का निश्चय किया। किन्तु ईश्वर ने जब इतनी बड़ी सृष्टि
बनायी है उससे उसे बाधा क्यों नहीं होती ? तो सृष्टि की रचना किस प्रकार हुई ? वह किससे उत्पन्न हुई ? यही
जानने के लिये मैंने मकड़ी को अपना गुरु बनाया।
एको नारायणो देवः पूर्वसृष्टं स्वमायया।
संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वरः ॥ १६ ॥
नर का आश्रयस्थल है इसलिये उसे 'नारायण' कहते हैं। समस्त जीवों का जो जीवन है वही नारायण
सबका स्वामी है। ऐसा जो नारायण है उसने इस संसार को पहले उत्पन्न किया। कोई भी बाह्य सामग्री लिये बिना
उसने इस विश्व की उत्पत्ति की। अकेले और वह भी बिना किसी सामग्री के यह कैसे सम्भव हुआ ? तो उसने
अपनी ही माया का क्षोभन कर यह संसार बनाया। उस निज माया के उदर में जीवसमुदाय असंख्य भरा हुआ है।
उस माया का उसने दृष्टि से अवलोकन किया। इसी को निजकाल कहते हैं। इस प्रकार उसने अपनी माया की
ओर देखा और उसे अपने शरीर पर खेलने दिया लेकिन अपने शरीर का स्पर्श नहीं होने दिया। ऐसी अलिप्तता
का खेल वही जानता है। आकाश में धुआँ फैलता है लेकिन आकाश धुएँ को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार वह
अपने शरीर पर माया का पोषण करता है लेकिन उससे अलिप्त रहता है। जल से ही कमलिनी का पोषण होता
है लेकिन उसी जल को वह अपने पत्ते में ढँक देती है। उसी प्रकार माया सत्-चित्-आनन्द में से आनन्द पर
'आवरण' डालती है, किन्तु सत-अंश के साथ चित् स्वतंत्र ही रहती है। स्वमाया का जो अधिष्ठान है वही माया
का निवास स्थान है। उसी प्रकार वास्तव में माया का नियंता नारायण ही है। रजोगुण सृष्टि को उत्पन्न करता है,
सत्वगुण उसका पालन करता है और तमोगुण कल्पांत के समय क्षुब्ध होकर काल के रूप में उसका संहार करता
है। किन्तु माया की यह क्षोभक शक्ति नारायण के हाथ में रहती है, इसी दृष्टि से अन्त में संहार करने वाला
ईश्वर ही रहता है।