श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस जन्म में मेरे कर्म को देखें तो वह केवल निन्दनीय हैं। पिछले जन्म का कुछ पुण्य था जिससे पुरुषोत्तम
मुझ पर प्रसन्न हुआ। लेकिन पूर्व जन्म में मैंने ऐसा क्या किया था? तो जिसका नाम 'पतित पावन' है उस कृपालु
जनार्दन की कृपा से ही यह सम्भव हुआ है। नीच, दुर्वासनायुक्त, व्यभिचारी, शरीर बेचकर उदरनिर्वाह करने वाली
मुझ जैसी स्त्री में वैराग्य का विचार आने का अर्थ यही है कि भगवान विष्णु मुझ पर प्रसन्न हुए हैं। अगर पूर्वजन्म
का कुछ सुकृत होता तो मैंने नीच श्रेणी में जन्म ही नहीं लिया होता। योनिद्वार कर्माचरण करने वाली मैं पूर्ण रूप से
पापी हूँ। इस प्रकार मैं पूर्णपतित और वह जगन्नाथ 'पतित पावन' जिसने कृपा करके मुझे विवेकयुक्त वैरागी
बनाया। वैराग्य विचार से ही मेरा दुर्वासना का दुःख समाप्त हुआ और मुझे परमसुख प्राप्त होकर आत्मसुख का
लाभ हुआ। जिस पर दुःख बरसता है उसमें यदि वैराग्य नहीं उत्पन्न होता तो वह भाग्यहीन है। लेकिन भगवान की
कृपा कैसी न्यारी है। दुःख के द्वार से उसने निजसुख ही मेरे पास भेज दिया।
मैवं स्युर्मन्दभाग्यायाः क्लेशा निर्वेदहेतवः।
येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुषः शममृच्छति॥३८॥
शरीर पर जब दुःखरूपी द्वंद्व बरसता है तो अभाग्य, क्रुद्ध हो उठता है। जिनका विवेक अन्धा हो जाता है
उसे मंदभाग्य समझना चाहिये। दुःख पर दृष्टि पड़ते ही जिसे विवेकयुक्त वैराग्य प्राप्त होता है वह हृदयस्य
मोहमाया के बन्धन तोड़कर तत्काल आत्मसुख प्राप्त करता है। पुरुषों के लिये 'विवेकयुक्त वैराग्य' ही परम
निधान है। उसके कारण वे सुखी होकर परम संतोष प्राप्त करते हैं। पहले मैं अत्यन्त अभागी थी। किन्तु भगवान
ने महापुरुषों का वैराग्य मुझे प्रदान किया और मैं त्रैलोक्य में धन्य हो गयी।
तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगताः।
त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम्॥३९॥
भगवान ने कृपा करके मुझे निजवैराग्य प्राप्त करा दिया, मेरी दुर्वासना समाप्त की और ग्याम्य विषय नष्ट
कर दिये। उसके वे उपकार धारण कर मैं अब उसकी शरण में जा रही हूँ। जो सर्वाधीश और सर्वनियंता है उस
श्रीकृष्णनाथ की मैं शरण में हूँ।
सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद् यथालाभेन जीवती।
विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै॥४०॥
शरण में जाने के बाद मैं निश्चय ही इस लोक में सुखी हो जाऊँगी। मन में स्वभावतः सात्विक श्रद्धा है।
शरीर निर्वाह की चिन्ता अदृश्य पर सौंप दूँगी। महान ऋषिगण जिस निजात्मा का भोग करते हैं उसी आत्माराम
का मैं भोग करूँगी। निष्कामों को जो काम से तृप्त करता है वही परमात्मा मेरा पति है। जब ब्रह्मादिक देवतागण
समर्थ हैं तो उन्हें छोड़कर प्रेमपूर्वक भगवद्भजन ही क्यों करें तो इसका उत्तर यह है कि जो मुझ जैसी दुराचारी
जीव का उद्धार करता है, वही कृपालु स्वामी श्रीहरि संसार सागर को पार कराने वाला है।
संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम्।
ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वरः॥४१॥
संसाररूपी गहरे अँधेरे कुएँ में, विषय में अन्धे हुए लोग पड़े हुए हैं। ऊपर आने के लिए उनकी बुद्धि काम
ही नहीं करती। कोई कल्पना के जल में डूबे, वासना की लहरों में फँसे, दंभरूपी जलचर उन्हें नोच-नोचकर खा